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उत्तराखंडः दरकने लगा पहाड़-दर-पहाड़

इस साल बरसात में कोई भी जिला ऐसा नहीं बचा, जहां भूस्खलन से तबाही नहीं हुई. विशेषज्ञ इसकी वजह अंधाधुंध असंतुलित विकास को बता रहे हैं

ऋषिकेश गंगोत्री मार्ग में जगह-जगह दरक रहे पहाड़ से बाधित सड़क ऋषिकेश गंगोत्री मार्ग में जगह-जगह दरक रहे पहाड़ से बाधित सड़क

उत्तराखंड में बारिश से भूस्खलन और पहाड़ों के खिसकने का सिलसिला बंद होने का नाम नहीं ले रहा. इस बार उत्तराखंड में भारी बारिश ने कोई ऐसा जिला नहीं छोड़ा है, जहां भूस्खलन ने नुक्सान न पहुंचाया हो. कोरोना के चलते चार धाम यात्रा अब तक शुरू न होने से भले कारोबारी निराश हों लेकिन यह भी गौरतलब है कि यात्रा होती तो इस बार भूस्खलन जिस बड़े पैमाने पर हुआ, उससे तीर्थयात्री भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते थे. बारिश के कारण आम जान जीवन को पटरी पर लाना सरकारी विभागों के लिए भी चुनौती बना हुआ है. कहीं बिखरा टनों मलबा रोड को खोलने की राह में रोड़ा बना है तो कहीं सड़क पूरी तरह बह गई है इसलिए नई सड़क कटान का प्रपोजल स्वीकृत कराकर उसको नए सिरे से काटने की फौरी जिम्मेदारी विभाग पर आन पड़ी है.

इस साल हालांकि आपदा का सिलसिला राज्य में 7 फरवरी को रैणी गांव से ऊपर टूटे ग्लेशियर से शुरू हुआ. उसके बाद बारिश के दिनों में तो पूरा रैणी गांव ही भूस्खलन की चपेट में आता चला गया. हालत यहां तक पहुंच चुकी है कि इस रैणी गांव में चिपको नेत्री गौरा देवी की लगी प्रतिमा सहित उनके संग्रहालय को भी खाली कराना पड़ा. भूस्खलन से सहमे पूरे गांववासियों को तो कई दिनों तक जंगली गुफाओं में शरण लेनी पड़ी.

राज्य की चारधाम यात्रा को सुगम बनाने के लिए बनाई जा रही निर्माणाधीन हर मौसम सड़क के लिए कटाई के चलते खिसकते पहाड़ों ने तो पूरे क्षेत्र में तबाही मचा रखी है. टिहरी जिले में नागनी के पास पूरा पहाड़ दरककर सड़क पर आ गिरा. इससे ऋषिकेश गंगोत्री हाइवे लंबे वक्त तक बाधित रहा. इस भूस्खलन से टनों मलबा और बोल्डर सड़क पर आ गए. एनएच 94 पर बरसात के इस मौसम में कहीं न कहीं भूस्खलन होता ही रहा. यही हाल ऋषिकेश-बदरीनाथ मार्ग का भी रहा. पिथौरागढ़ जिले में थल से मुनस्यारी को जोड़ने वाली सड़क भूस्खलन के चलते बंद है इसलिए लोगों को मदकोट होते हुए 150 किलोमीटर का फेरा लगाकर मुनस्यारी पहुंचना पड़ रहा है.

पिथौरागढ़ जिले कि चीन सीमा से लगे लगभग सौ गांवों का बाकी दुनिया से संपर्क भूस्खलन के चलते सड़कों के बह जाने से कटा हुआ है. इससे क्षेत्र की लगभग तीस हजार से अधिक की आबादी देश और दुनिया से अलग-थलग पड़ी हुई है. इस वजह से सीमा पर स्थापित अग्रिम सैन्य चौकियों तक आवश्यक सामान की आपूर्ति भी प्रभावित हो गई. पिथौरागढ़ जिले से होकर गुजरने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा इस बार भी कोरोना के चलते निरस्त कर दी गई इसलिए सीमांत की सड़कों के बहने से हो सकने वाली अत्यंत परेशानियों से लोग बच गए.

चमोली जिले की नीती घाटी में हेलिकॉप्टर से अग्रिम चौकियों तक सामान की आपूर्ति करनी पड़ी. यही हाल पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी जिलों की चीन सीमा का भी रहा. पिथौरागढ़ में चीन और नेपाल सीमा से लगी सीमांत की तहसील धारचुला के जुम्मा गांव में 30 अगस्त की बारिश ने कोहराम मचा दिया. भारत-नेपाल की सीमा बनाने वाली काली नदी के उस पार नेपाल में भी भारी वर्षा ने एक गांव नेस्तोनाबूद कर दिया. नतीजा यह हुआ कि काली नदी में आए मलबे ने नदी का प्रवाह रोककर धारचुला के लिए भारी खतरा पैदा कर डाला लेकिन किसी तरह इससे पानी डिस्चार्ज होने से ये खतरा टल सका. धारचुला की एनएचपीसी कंपनी के आवास और कंपनी का मुख्यालय भूस्खलन और अतिवृष्टि की चपेट में आने से तबाह हो गए. जुम्मा गांव और उसके दो तोकों में सात लोग लापता हो गए, जिनमें पांच के मृत शरीर मलबे के ढेर से बरामद हुए जबकि दो लोगों का अब भी कोई पता नहीं चल सका. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आपदा के बाद गांव के दौरे में मृतकों के परिजनों से मुलाकात की और उनको पांच लाख रुपए देने का ऐलान किया.

मुख्यमंत्री के दौरे के बाद प्रभावित गांव जुम्मा का भूगर्भ विशेषज्ञों ने भी दौरा किया था. इन विशेषज्ञों ने जिलाधिकारी को जुम्मा और आसपास के गांव के लोगों को वहां से हटाने को कहा है. इसके अलावा भू-वैज्ञानिकों ने यह भी शंका व्यक्त की कि इस आपदाग्रस्त गांव के समीप जोलढूंगा का स्लाइडिंग जोन भी सक्रिय हो सकता है.

पर्यटक नगरी नैनीताल में बलिया नाले के भूस्खलन और नैनापीक में आई दरार से अभी निजात नहीं मिला था कि ठंडी सड़क के किनारे आयारपाटा पहाड़ी में स्थित कुमाऊं विश्वविद्यालय के केपी और एसआर गल्र्स छात्रावास के ठीक तलहटी में हो रहे भूस्खलन ने विस्फोटक रूप ले लिया है. राजभवन रोड कई स्थानों में धंस रहा है. माल रोड अस्थाई तौर पर किसी तरह चालू किया जा सका है.

इसी तरह मसूरी में भी देहरादून से मसूरी को जाने वाले मुख्य मार्ग में निरंतर भूस्खलन सिरदर्द बना रहा. गलोगी पावर हाउस के पास मसूरी-देहरादून मार्ग पर हो रहे भूस्खलन से पर्यटकों की आवाजाही तो प्रभावित रही ही, खुद मुख्यमंत्री भी इस मार्ग पर फंस गए. इस तरह चाहे पर्यटन स्थल नैनीताल हो, या मसूरी या मुनस्यारी सभी भूस्खलन के चलते समस्या से जूझ रहे हैं.

नेपाल से लगे सीमांत जिले चंपावत के मुख्यालय को टनकपुर से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग में स्वाला के पास हुए भूस्खलन से चंपावत और पिथौरागढ़ जिलों का संपर्क भी टूट गया. देहरादून से ऋषिकेश को जोड़ने वाले मार्ग में जाखन नदी पर बना रानीपोखरी पुल टूटकर बिखर गया. यह राजनैतिक विवाद का विषय भी बन गया है. आरोप है कि खनन के लिए हुई बेतरतीब खुदाई से इसके खंभों की जमीन खोखली हो गई तो पुल बैठ गया. पुल का जायजा लेने कांग्रेस के नेता हरीश रावत पहुंचे तो मुख्यमंत्री को भी दौरा करना पड़ा. आप पार्टी के नेता भी सरकार पर हमलावर दिखे. हरीश रावत ने इस पुल के टूटने की घटना को अवैध खनन का परिणाम बताया और कहा कि गौला नदी पर बना पुल भी अवैध खनन का शिकार हुआ था लेकिन सरकार ने कोई सबक नहीं लिया.

भारी बारिश से रानीपोखरी पुल टूटने के बाद अब प्रदेश के बी ग्रेड के सभी पुलों की सुरक्षा की समीक्षा के लिए लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव आर.के. सुधांशु ने एक कमेटी का गठन किया है. प्रदेश में 664 पुल बी ग्रेड के हैं, जिनका निर्माण 1960  से 1970 के बीच हुआ था. तब इन पुलों को 16 टन की भार क्षमता के अनुरूप बनाया गया था. जबकि इन दिनों बन रहे बी ग्रेड के पुलों की अब भार क्षमता 70 टन कर दी गई है.

जाहिर है, हिमालय की दुर्दशा की बड़ी वजह अंधाधुंध विकास भी है. लेकिन सरकार इस ओर ध्यान देने के बदले उन परियोजनाओं को भी मंजूरी देने का फैसला कर चुकी है, जिन पर 2013 की केदरानाथ आपदा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी. अगर संतुलित विकास पर ध्यान नहीं दिया गया तो आपदाएं यकीनन इंतजार कर रही हैं. इस साल के भूस्खलन तो यही संदेश दे रहे हैं.

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