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उत्तराखंड-आग से आफत

इस फायर सीजन में अब तक वनों में आग की घटनाओं की संख्या 711 पहुंच चुकी है, जिससे 992 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है. पौड़ी, अल्मोड़ा, नैनीताल और चंपावत जिलों में दो दर्जन से अधिक स्थानों पर आग भड़कने की सूचना है.

जलते पहाड़ उत्तराखंड में भड़की आग जलते पहाड़ उत्तराखंड में भड़की आग

उत्तराखंड इन दिनों प्रकृति के विरोधाभास का जीवंत उदाहरण बना हुआ है. एक ओर ऊपरी इलाके में मौके-बेमौके पड़ती बर्फ और बारिश, तो दूसरी ओर जंगलों में विकराल रूप धारण करती आग. सात मई से शुरू हुई चारधाम यात्रा के बाद यहां करीब चार बार बर्फबारी हो चुकी है. इसके अलावा कई इलाकों में अब तक जाड़ों में पड़ी बर्फ के भंडार जमा हैं. वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड के जंगलों में आग धधक रही है. इस फायर सीजन में अब तक वनों में आग की घटनाओं की संख्या 711 पहुंच चुकी है, जिससे 992 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है. पौड़ी, अल्मोड़ा, नैनीताल और चंपावत जिलों में दो दर्जन से अधिक स्थानों पर आग भड़कने की सूचना है. अल्मोड़ा के मानीला जंगल में भड़की आग से वहां रखा लीसे (गोंद) का स्टॉक भी खाक हो गया.

नाकाफी तैयारियां

एक मई से पारे में उछाल के साथ ही जंगल तेजी से धधकने लगे और महक में की नाकाफी तैयारियां सामने आने लगीं. सवाल उठने लगे हैं कि जब अग्निकाल शुरू होने से पहले फायर लाइनों के फुकान समेत अन्य कदम उठाए गए थे तो आग की घटनाओं पर तुरंत नियंत्रण क्यों नहीं हो पा रहा. कई क्षेत्रों में यह बात भी सामने आ चुकी है कि वहां जंगल पांच-छह दिन तक सुलगते रहे. ग्रामीणों के सहयोग से जैसे-तैसे वहां आग पर काबू पाया गया. अल्मोड़ा जिले के सल्ट ब्लॉक के मानीला वन क्षेत्र में लगी आग ने रिहाइशी इलाके के नजदीक जंगल में रखे गए लीसा (वनोपज) स्टॉक को अपनी चपेट में ले लिया.

देखते ही देखते लीसे से भरे 150 टिन ने आग पकड़ ली और इनमें होने वाले विस्फोट से लोग सहमे रहे. इसकी वजह से रतखाल बाजार और आसपास के क्षेत्रों में धुएं का काले गुबार छाया रहा. यही नहीं, पुरियाचैरा में गैस गोदाम के नजदीक भी आग पहुंच गई थी, जिस पर किसी तरह काबू पाया जा सका.

ऐसे समय में जब उत्तराखंड के जंगलों में आग तांडव कर रही है, प्रमुख मुख्य वन संरक्षक अधिकारी जयराज समेत कई आला अधिकारी विदेश दौरे पर हैं. इसके लिए उन्होंने वन मंत्री की इजाजत भी नहीं ली थी. इससे खफा वन मंत्री ने मुख्य सचिव कार्मिक को चिट्ठी लिखी है. उत्तराखंड के वन मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत कहते हैं, ''प्रदेश में जंगल धधक रहे हैं और वनों की जिम्मेदारी संभालने वाले राज्य के प्रमुख मुख्य वन संरक्षक जयराज को बिना उनकी जानकारी के विदेश यात्रा की इजाजत दे दी गई है, जो गलत है.''

अपर्याप्त बजट

दावानल से निपटने के लिए वन महकमे की ओर से 48 करोड़ रुपए के बजट की मांग की गई. लेकिन, इसके सापेक्ष विभाग को अब तक महज 12 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए हैं. राज्य में 37,99,960 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगलों की आग बुझाने को सरकार से मिले 12 करोड़ रुपए की आवंटित राशि पर कई सवाल उठने लगे हैं. इस लिहाज से

प्रति 3.16 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के हिस्से में एक करोड़ की राशि आ रही है. यह राशि सभी वन प्रभागों के साथ ही पार्क व सेंचुरी प्रशासन को आवंटित कर दी गई है. लेकिन, यह ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है. आग बुझाने को विभाग ने चार माह के लिए करीब 6000 श्रमिक तैनात किए हैं. इन्हें प्रतिमाह छह हजार रुपये मानदेय देने को ही 3.60 करोड़ रुपए की जरूरत है. साथ ही संसाधन भी जुटाए जाने हैं. ऐसे में इतने कम बजट में व्यवस्थाएं कैसे हो पाएंगी, यही चिंता विभाग को सता रही है. विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि जंगलों की आग बुझाने के लिए सरकार से और बजट की मांग की गई है.

उत्तराखंड में आग के मामलों का बढऩा जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ रहा है. सिविल और संरक्षित वन क्षेत्रफल में निंरतर कमी बेहद चिंताजनक है. आगामी वर्षों में इस खतरे के और बढऩे के भी संकेत हैं.  साल दर साल लगने वाली वनों की आग इस स्थिति को और अधिक विकट बनाती है.

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