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स्वच्छता अभियान पर धब्बा

2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान गंगा को 'मां' कहकर पुकारने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गंगा को स्वच्छ करने का वादा करने वाली उनकी सरकार के लिए सानंद की मांग अलहदा भी नहीं थी.

गंगा के लिए आहुति स्वामी सानंद को ले जाते पुलिसकर्मी गंगा के लिए आहुति स्वामी सानंद को ले जाते पुलिसकर्मी

आइआइटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर गुरुदास अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद को बस एक ही फिक्र थी—गंगा की अविरलता और निर्मलता किस तरह बरकरार रहे. 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान गंगा को 'मां' कहकर पुकारने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गंगा को स्वच्छ करने का वादा करने वाली उनकी सरकार के लिए सानंद की मांग अलहदा भी नहीं थी. लेकिन सानंद की न तो प्रधानमंत्री ने सुनी और न ही भाजपा की केंद्र या राज्य सरकार ने. और, आखिरकार गंगा के लिए अनशन पर बैठे सानंद का 11 अक्तूबर को निधन हो गया.

दरअसल, 86 वर्षीय सानंद ने इस साल 24 फरवरी को प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर चार मांगें रखी थीं. ये मांगें थीं—गंगा के लिए प्रस्तावित अधिनियम ड्राफ्ट 2012 पर संसद में चर्चा कराकर पास कराना, उत्तराखंड में नदियों पर बन रही और प्रस्तावित जल विद्युत योजनाओं को निरस्त करना, गंगा महासभा के ड्राफ्ट अधिनियम के अनुसार वन कटान, खनन और खदान पर पूर्ण रोक तथा गंगा भक्त परिषद का गठन करना.

परिषद में 20 लोग प्रधानमंत्री की ओर से नामित हों और वे गंगा तट पर आकर संकल्प लें. लेकिन प्रधानमंत्री या सरकार की ओर से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय के रवैये से निराश सानंद ने हरिद्वार के पास मातृ सदन आश्रम में 22 जून को अन्न त्यागकर अनशन शुरू कर दिया. उन्होंने इसकी भी जानकारी पत्र लिखकर प्रधानमंत्री को देने की बात कही थी. पर किसी ने उनकी सुध नहीं ली. आखिरकार, 112 दिन के आमरण अनशन के बाद उनका निधन हो गया. इसने सरकार के रवैये को बेनकाब कर दिया है.

उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के नेता काशी सिंह ऐरी कहते हैं, ''स्वामी सानंद की मांगों से सहमति या असहमति हो सकती है पर जिस तरह से प्रधानमंत्री ने उनकी अनदेखी कर उन्हें मरने को छोड़ दिया, वह बहुत पीड़ादायक है. वह भी उस नरेंद्र मोदी की चुप्पी जिन्हंस संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में चैंपियन ऑफ अर्थ अवार्ड से नवाजा है. इससे अवार्ड पर भी सवाल खड़ा होता है.''

प्रोफेसर अग्रवाल ने संन्यास की दीक्षा लेकर अपना जीवन गंगा के लिए समर्पित कर दिया था. साल 2012 में उन्होंने गंगा में निर्माणाधीन जल विद्युत योजनाओं और बड़े बांधों का विरोध करते हुए 60 दिन तक अनशन किया था. इसके बाद सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया था और उसके लिए राष्ट्रीय अथॉरिटी भी बनी थी. उनका कहना था कि भाजपा ने अपने चुनाव अभियान के दौरान गंगा नदी की सफाई के नाम पर लोगों की आस्था को भुनाते हुए अपने लिए वोट की अपील की थी, पर उनके सारे दावे और वादे हवाहवाई हो गए.

मातृ सदन ने सानंद के साथ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की मोबाइल फोन पर हुई बातचीत का एक ऑडियो जारी किया है. उसमें सानंद को कुछ देर मनाने की कोशिश करने के बाद केंद्रीय मंत्री का पारा चढ़ गया था. उन्होंने यह फोन काट दिया था, ''ठीक है, जैसा चाहो करो.'' गडकरी का रवैया बेहद निराश करने वाला था. जाहिर है, सानंद के जीवन को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ.  

कांग्रेस का आरोप है कि सानंद की मौत से मोदी सरकार का गंगा प्रेम छलावा साबित हुआ है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इस अनशन के दौरान कई बार हरिद्वार गए पर उन्होंने सानंद की खोज-खबर लेना तक उचित नहीं समझा. वह भी तब जब मुख्यमंत्री बनने से पूर्व पार्टी ने रावत को गंगा स्वच्छता अभियान का संयोजक बना रखा था. वैसे, रावत का कहना है, ''राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर पूरी संवेदनशीलता दिखाई थी. लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी उन्होंने अनशन तोडऩे से इनकार कर दिया. जैसे ही उन्होंने 9 अक्तूबर को जल का त्याग किया, उन्हें फौरन ऋषिकेश एम्स में भर्ती कराया गया था. एम्स के डॉक्टरों ने भी उनकी जान बचाने का भरसक प्रयास किया.''

लेकिन एम्स, ऋषिकेश में सानंद के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे जल पुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा, ''सरकार ने स्वामी सानंद की मांगों को अनसुना किया है, सरकार को इसका दंड भुगतना होगा. वहीं एम्स प्रशासन ने उनके अंतिम दर्शन की अनुमति नहीं दी. सरकार को डर है कि कोई उनके बलिदान से प्रेरणा न पा

सके.'' दरअसल, एम्स प्रशासन ने सानंद के अंतिम दर्शन को आए लोगों को इसकी अनुमति नहीं दी थी. जब राजेंद्र सिंह समेत कुछ लोग एम्स में ही धरने पर बैठ गए, तब जाकर एम्स प्रशासन को उन्हें दर्शन की इजाजत देनी पड़ी.

कुछ लोग सानंद की मौत को हत्या करार दे रहे हैं. हरिद्वार में मां गंगा मिशन ने एक दिवसीय धरना देकर इसकी सीबीआइ जांच की मांग की है. वहीं मातृ सदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद सरस्वती ने सानंद की मौत को सरकार के इशारे पर की गई हत्या करार दिया है. उनका आरोप है कि हरिद्वार जिला प्रशासन, एम्स के डायरेक्टर और केंद्रीय मंत्री गडकरी सानंद की 'हत्या' के लिए जिम्मेदार हैं. मातृ सदन की ओर से ब्रह्मचारी दयानंद ने इन सभी के खिलाफ तहरीर दी है. उनका कहना है, ''जब स्वामी सानंद को मातृ सदन से लाया गया था तो उनकी हालत ठीक थी. पर 11 अक्तूबर को उनकी मृत्यु हो गई, यह उनकी हत्या की साजिश है. वहीं, एम्स निदेशक ने मीडिया को भी झूठा बयान दिया कि स्वामी सानंद पर अनशन नहीं तोडऩे के लिए दबाव दिया जा रहा था.''

सानंद के निधन के बाद मातृ सदन में एक अन्य संत, हरियाणा के गुहाना में रहने वाले गोपालदास अनशन पर बैठ गए. उन्हें देर रात 13 अक्तूबर को जिला प्रशासन ने जबरन एम्स, ऋषिकेश में भर्ती करा दिया. डिस्चार्ज होने के बाद वे फिर अनशन पर बैठ गए हैं. उत्तराखंड के अलग-अलग स्थानों पर गोपालदास के अनशन के 16 अक्तूबर को 116 दिन पूरे हो गए हैं. फिलहाल, सानंद की मौत को लेकर विभिन्न आरोपों को भाजपा सरकार खारिज कर रही है, लेकिन इस संत की मौत के दाग उसके 'स्वच्छता अभियान' से धुलने वाले नहीं हैं.

स्वामी सानंद ने प्रधानमंत्री से गंगा के लिए चार मांगें की थीं. लेकिन उन्हें उसका कोई जवाब नहीं मिला. निराश होकर सानंद अनशन पर बैठ गए थे

और कितने बलिदान?

हरिद्वार के पास कनखल थाना क्षेत्र के जगजीतपुर में 1998 में गंगा के किनारे मातृ सदन आश्रम की स्थापना हुई थी. तब से मानो यह गंगा के लिए बलिदान देने वालों की संस्था बन गई है. स्वामी सानंद से पहले भी इस संस्था के दो ब्रह्मचारी अपना बलिदान दे चुके हैं. इनमें से निगमानंद सरस्वती का बलिदान भी मुख्य रूप से गंगा के लिए था. मातृ सदन के संतों ने जब ध्वनि प्रदूषण और गंगा में अवैध खनन पर रोक लगाने की मांग को लेकर संघर्ष शुरू किया था तो वे स्थानीय निवासियों और फिर खनन माफिया के निशाने पर आ गए थे. कई बार इन संतों पर हमले हुए, पर उन्होंने गंगा की रक्षा का संघर्ष नहीं छोड़ा.

कनखल में 1998 में निगमानंद के साथ स्वामी गोकुलानंद ने क्रशर और खनन माफिया के खिलाफ अनशन शुरू किया था. करीब 78 दिनों तक गंगा में खनन पर रोक लगाने की मांग को लेकर अनशन करते हुए निगमानंद सरस्वती का 13 जून, 2011 को देहरादून स्थित जौलीग्रांट अस्पताल में निधन हो गया था. उसके बाद स्वामी गोकुलानंद ने उस मांग को आगे बढ़ाते हुए अनशन किया. वर्ष 2013 में गोकुलानंद एकांतवास के लिए गए थे, लेकिन नैनीताल के बामनी में उनका शव मिला. उन्हें जहर देकर मार डालने का आरोप भी लगा था. अब सानंद की मौत के बाद संत गोपालदास भी मातृ सदन में ही अनशन पर बैठ गए हैं. मातृ सदन के परमाध्यक्ष शिवानंद सरस्वती कहते हैं, ''मातृसदन गंगा के लिए कोई भी बलिदान देने को तत्पर है.''

स्वामी निगमानंद

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