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उत्तर प्रदेशः नदी में उतराते शवों ने दिखाई हकीकत

नदियों में बड़ी संख्या में उतराते शवों से उत्तर प्रदेश की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना के बाद गरीब परिवार में कोरोना पीड़ित की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार के लिए पांच हजार रुपए देने का आदेश पारित किया

विडंबना गंगा में संदिग्ध रूप से कोविड से मरे लोगों के शवों का उन्नाव जिला प्रशासन ने अंतिम संस्कार कराया विडंबना गंगा में संदिग्ध रूप से कोविड से मरे लोगों के शवों का उन्नाव जिला प्रशासन ने अंतिम संस्कार कराया

कोरोना संक्रमण के बढ़ते ही मई के दूसरे हफ्ते से उत्तर प्रदेश से बिहार तक गंगा में लाशें मिलने का सिलसिला शुरू हो गया था. उत्तर प्रदेश और बिहार के सीमा पर मौजूद गाजीपुर और बलिया जिले में 15 से अधि‍क शव दिखने के अगले दिन 13 मई को वाराणसी के रामनगर साइड सुजाबाद घाट के पास आठ अधजले शव उतराते दिखे. एक साथ गंगा में आठ शव देख ग्रामीणों में दहशत फैल गई.

पुलिस ने गोताखोरों के माध्यम से सभी शवों को बाहर निकलवाया. डीसीपी काशी जोन, तहसीलदार, कानूनगो की मौजूदगी में सभी शव को अवधूत भगवान राम समाधि स्थल के पीछे गंगा के किनारे जेसीबी से गहरा गड्ढा खोदकर दफनाया गया. माना जा रहा है कि यह सभी कोरोना संक्रमितों के शव हैं जिन्हें आधा जलाने के बाद गंगा में प्रवाहित कर दिया गया था. एक अनुमान के मुताबिक, पिछले दस दिनों के भीतर उत्तर प्रदेश में 1358 किलोमीटर की लंबाई में बह रही गंगा और उसकी दूसरी सहायक नदियों में 2000 से अधि‍क शव पानी में बहते या फि‍र किनारों पर दफनाए हुए मिल चुके हैं.

कानपुर में शिवराजपुर का खेरेश्वर घाट भी सैकड़ों लाशों से अटा पड़ा है. गुरुवार 13 मई को यहां पर गंगा के किनारे पर कई शव दफनाए गए. दोपहर में हुई बारिश के बाद जब शवों के ऊपर से बालू हटी तो हर तरफ दुर्गंध फैल गई. कानपुर के खेरेश्वर घाट में लंबे समय से दाह संस्कार होता आया है. यहां के स्थानीय निवासियों का कहना है कि पहली बार नदी की धारा के बीचो-बीच सूखी पड़ी गंगा में शवों को दफनाने का मामला सामने आया है. शि‍वराजपुर में अंतिम संस्कार कराने वाले रमेश बताते हैं, ''कोरोना काल में इतनी मौतें हुईं कि घाटों पर जगह कम पड़ गई है.

लंबे इंतजार और अनापशनाप खर्चे से बचने के लिए मजबूर व आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीण चोरी छिपे यहीं पर अपनों के शव दफनाते रहे हैं. कोरोना संक्रमण से मौतों की संख्या बढ़ी तो शव भी बड़ी संख्या में नदी के किनारे दफनाए जाने लगे हैं.'' बारिश के बाद जब बालू बह गई तो ये शव नजर आने लगे. ग्रामीणों ने बताया कि घाट पर अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी आदि की व्यवस्था नहीं है. कुछ दूर पर लकड़ी मिलती है लेकिन लाकडाउन और मांग बढ़ने की वजह से दाम में दो से तीन गुने का इजाफा हो गया है. ऐसे में एक शव के अंतिम संस्कार में पांच से सात हजार रुपये खर्च हो जाते हैं. मजबूर और गरीबों के लिए ये रकम बड़ी है इसलिए लोगों ने शव दफनाने शुरू कर दिए.

यहां से करीब 30 किलोमीटर दूरी पर उन्नाव के शुक्लागंज में ग्राम रौतापुर स्थित गंगातट पर रोक के बावजूद एक माह के अंदर करीब चार सौ शवों को गड्ढा खोद कर दफना दिया गया है. स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रशासन की रोक के बावजूद लोगों ने गुपचुप तरीके से कोरोना संक्रमित शवों को गंगा के किनारे गड्ढों में दफना दिया है. इससे गंगा का जलस्तर बढ़ने पर शव उतराएंगे, साथ ही गंगाजल भी प्रदूषित होगा.

कानपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर रितेश वर्मा बताते हैं, ''कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान 20 अप्रैल से उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में पीड़ितों की मौतें शुरू हो गई थीं. सरकारी आंकड़े भले ही रोज औसतन 200 से अधि‍क मौतों की बात स्वीकार रहे हों लेकिन वास्तवित आंकड़े इससे कहीं ज्यादा थे. गांव में बड़ी संख्या में कोरोना के संदिग्ध मरीजों की मौते पिछले एक महीने के दौरान हुई हैं. अंतिम संस्कार की पर्याप्त व्यवस्था न होने से लोगों ने शवों को नदियों में प्रवाहित करना शुरू कर दिया.''

नदियों के किनारे बसे गांवों में अंत्येष्टि स्थल का निर्माण करने की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की योजना अफसरशाही की सुस्ती की भेंट चढ़ चुकी है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 27 जनवरी, 2020 को बिजनौर से गंगा यात्रा की शुरुआत करने के साथ गंगा नदी के किनारे बसे गावों में बड़े पैमाने पर योजनाओं को हरी झंडी दिखाई थी. योगी आदित्यनाथ ने गंगा के किनारे 1358 किलोमीटर में बसे 27 जिलों, 21 नगर निकाय, 1038 ग्राम पंचायतों के उद्धार का अभियान शुरू किया. इनमें गंगा गंगा के किनारे अनाधिकृत ढंग से शवदाह को रोकने के लिए नगर विकास विभाग और पंचायती राज विभाग को सभी तटवर्ती क्षेत्रों में एक स्थान चिन्हित कर वहां श्मशान घाट या शवदाह गृह का निर्माण कराने की जिम्मेदारी दी गई थी.

एक वर्ष में पूरी होने वाली योजना की वास्तविक स्थिति यह है कि गंगा के किनारे बसे गांवों में पिछले 15 महीनों के दौरान निर्धारित लक्ष्य के 20 फीसदी गांवों में भी अंत्येष्टि‍ स्थल बनकर तैयार नहीं हो पाए हैं. कानपुर के बिठूर में गंगा के किनारे बने आश्रम के संचालक राजेंद्र त्रिपाठी बताते हैं, ''अगर गंगा नदी के किनारे बसे गांवों में अंत्येष्टि स्थल बन जाते और ग्राम पंचायत को इनका जिम्मा मिल जाता तो बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमण से मृत्यु होने के बाद शव का सम्मानजनक अंतिम संस्कार हो जाता. गरीब लोगों के पास अंतिम संस्कार के लिए जरूरी धन नहीं होने के कारण उन्होंने शवों को नदी में प्रवाहित कर दिया है.'' पंचायती राज विभाग की ओर से नदियों के किनारे बनाए गए अंत्येष्टि‍ स्थल देखरेख के अभाव में बदहाल हो चुके हैं.

बहुत सारे अंत्येष्टि‍ स्थलों की निर्माण प्रकिया कागजों से ही बाहर नहीं निकल पाई है. पंचायती राज विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बलिया जिले में बनने वाले 35 अंत्येष्टि‍ स्थलों में 8 पर अभी काम ही नहीं शुरू हुआ है जबकि 12 बदहाल पड़े हैं. इसी प्रकार भदोही और गाजीपुर जिले में 12-12 अंत्येष्टि‍ स्थल अधूरे पड़े हैं. चंदौली में 6, मऊ में 7 अंत्येष्टि‍ स्थलों को अधूरा बनाकर छोड़ दिया गया है. इस वजह से यह निष्प्रयोज्य पड़े हुए हैं.

वर्ष 2014 में पंचायतों में अंत्येष्टि‍ स्थल का निर्माण करने के लिए 100 करोड़ रुपए बजट का प्रावधान किया गया था. साथ ही नदियों के किनारे भी सभी ग्राम पंचायतों में भी इसके निर्माण के निर्देश दिए गए. लक्ष्य का आवंटन वित्तीय वर्ष के मुताबिक किया गया. वर्ष 2014 में 13.23 लाख रुपए प्रति अंत्येष्टि‍ स्थल के निर्माण में खर्च करने का प्रावधान किया गया. महंगाई को देखते हुए अंत्येष्टि‍ स्थलों की निर्माण लागत को बढ़ाकर अब 24 लाख रुपए प्रति कर दिया गया है. वर्तमान में इसी लागत से अंत्येष्टि‍ स्थलों का निर्माण कार्य कराया जा रहा है. नदियों के किनारे बने अंत्येष्टि‍ स्थल सरकारी गड़बड़ियों की दास्तान उजागर कर देते हैं.

मसलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को ही ले लीजिए. यहां पर कुल 30 से अधिक अंत्येष्टि‍ स्थलों के निर्माण का दावा सरकारी महकमा कर रहा है. इनमें से ज्यादातर की हालत बहुत ही खराब है. वाराणसी के भदवां और नियारडीह ग्राम पंचायत में बने अंत्येष्टि स्थल में केवल प्लेटफार्म ही बना है. ऐसे में नदी में बाढ़ आने की वजह से मजबूरी में लोग यहां पर दाह संस्कार करते हैं. वाराणसी में ब्लाक चिरईगांव का मुस्तफाबाद शवदाह स्थल गंदगी से पटा पड़ा है. बड़ागांव ब्लाक के गजापुर, बलुआ और सरावां में बने अंत्येष्टि स्थल में कोई भी जरूरी व्यवस्था मौजूद नहीं है.

नदियों में बड़ी संख्या में उतराते शवों की वजह से उत्तर प्रदेश की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई आलोचना के बाद पंचायती राज विभाग ने गांवों में गरीब परिवार में कोरोना पीड़ित की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार के लिए पांच हजार रुपए देने का आदेश पारित किया है. मई के अंतिम सप्ताह में उत्तर प्रदेश के गांवों में नवनिर्वाचित प्रधानों को शपथ दिलाने के साथ उन्हें वित्तीय अधिकार भी सौंपे गए. इन ग्राम प्रधानों के माध्यम से गांवों में अंत्येष्टि स्थलों के निर्माण की अधूरी पड़ी योजना को पूरा कराना प्रदेश सरकार के लिए एक बेहद कठिन चुनौती है. लेकिन ऐसी विडंबनाओं से निपटने का पुख्ता इंतजाम करना होगा.

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