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आरबीआइः रिजर्व बैंक की नई पेशबंदी

उद्योग जगत के पर्यवेक्षकों के मुताबिक, संशोधित पीसीए फ्रेमवर्क के तहत दी जाने वाली ढील इस बात का संकेत है कि सरकार बैंकिंग क्षेत्र के निजीकरण की तैयारी कर रही है

आरबीआइ: तुरत सुधार कार्रवाई आरबीआइ: तुरत सुधार कार्रवाई

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने 2 नवंबर को भारत के सभी अनुसूचित बैंकों के लिए तुरत सुधार कार्रवाई (पीसीए) की संशोधित रूपरेखा जारी की. यह नया फ्रेमवर्क बीते चार सालों में बैंकिंग माहौल में आए बदलावों पर विचार करते हुए 2017 में घोषित पीसीए के नियमों में फेरबदल करता है. नए नियम 1 जनवरी, 2022 से लागू होंगे. किसी बैंक की वित्तीय हालत अगर बिगड़कर केंद्रीय बैंक के तयशुदा मानकों के नीचे जाती दिखाई देती है, तो यह पीसीए की रूपरेखा ही है जिसके जरिए रिजर्व बैंक समय से हस्तक्षेप और सुधार का कदम उठाता है. पीसीए की रूपरेखा के अनुसार वह व्यावसायिक बैंकों का मूल्यांकन करता है और उधार देने के मामले में उन पर पाबंदियां लगाता है. गवर्नेंस से जुड़ी कार्रवाइयों में शीर्ष बैंक बैंकिंग विनियमन कानून, 1949 की धारा 36एसीए के तहत बैंक के निदेशक मंडल को हटाकर उसकी जगह ले सकता है.

ताजा दिशानिर्देशों के अनुसार, बैंकों की सेहत का आकलन तीन मुख्य मानदंडों पर किया जाएगा—पूंजी, एसेट क्वालिटी और रुतबा. हरेक मानदंड के तहत रिजर्व बैंक ने तीन किस्म की जोखिम सीमाएं बताई हैं, जिनके आधार पर मानदंडों के तहत बैंकों की बिगड़ती हालत को नापा-जोखा जाएगा. 'पूंजी' मानदंड के तहत रिजर्व बैंक ने सीआरएआर (पूंजी और जोखिम परिसंपत्तियों का अनुपात) के मामले में न्यूनतम नियामकीय उपाय सुझाए हैं.

सीआरएआर को पूंजी पर्याप्तता अनुपात भी कहा जाता है और यह बैंक के कर्ज जोखिमों यानी कर्जदार के कर्ज चुकाने से चूकने की स्थिति में बैंक को होने वाले संभावित नुक्सानों के प्रतिशत के तौर पर बैंक के पास उपलब्ध पूंजी का पैमाना है. 'एसेट क्वालिटी' के तहत विशुद्ध गैर-निष्पादित संपत्ति अनुपात की जांच की जाएगी. 'रुतबा' के तहत बैंक की सेहत की थाह लेने के लिए रुतबे के अनुपात का आकलन किया जाएगा. यह अनुपात बैंक के कर्ज और उसकी पूंजी या परिसंपत्तियों के लिहाज से बैंक की वित्तीय स्थिति बताता है.

पिछले दिशानिर्देशों की तुलना में दो बड़े फर्क ये हैं कि भुगतान बैंकों और छोटे वित्त बैंकों को सूची से बाहर कर दिया गया है और 'रिटर्न ऑन एसेट' (आरओए) या बैंक की लाभप्रदता से जुड़ी धारा हटा दी गई है. पहले बैंकों की प्रोफिटेबिलिटी या लाभप्रदता की कड़ाई से निगरानी की जाती थी. लगातार दो साल निगेटिव आरओए आने पर बैंक को पीसीए रूपरेखा के तहत रख दिया जाता था.

केयर रेटिंग्स लिमिटेड के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस कहते हैं, ''पीसीए के नियमों में सुधार के जरिए रिजर्व बैंक ने पहले की शर्तों को कम सख्त बनाने की कोशिश की है, ताकि कर्ज देने का काम प्रभावित न हो.'' वे यह भी कहते हैं कि रिजर्व बैंक को बैंकिंग प्रणाली में कर्ज देने को अंतत: प्रोत्साहित करना ही होगा. अलबत्ता पीसीए रूपरेखा से किसी बैंक का बाहर होना अब भी रिजर्व बैंक की निरीक्षण की सहूलत और लाभप्रदता बनाए रखने की बैंक की योग्यता पर निर्भर करता है.

उद्योग जगत के पर्यवेक्षकों को भी लगता है कि नियमों में ढील संकेत है कि सरकार बैंकिंग क्षेत्र के निजीकरण की तैयारी कर रही है. उनका कहना है कि अगर सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए संभावित खरीदारों को आकर्षित करना है, तो मुनाफे से जुड़ा सख्त मानदंड हतोत्साहित कर सकता था. रिजर्व बैंक ने 2017 में भी इसी तरह पीसीए रूपरेखा की समीक्षा की थी, जिसमें बैंकों की बैलेंस शीट की साफ-सफाई के लिए उससे दो साल पहले लाई गई परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा को ध्यान में रखा गया था.

फिलहाल रिजर्व बैंक ने केवल एक बैंक को पीसीए रूपरेखा के तहत रखा है. वह है सार्वजनिक क्षेत्र का सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया. इसे परिसंपत्तियों पर नकारात्मक प्रतिफल और खोटे कर्जों के बड़े अनुपात के कारण जून 2017 में पीसीए रूपरेखा के तहत रखा गया था. नए दिशानिर्देशों के लागू होने पर उम्मीद है कि यह बैंक भी संशोधित पीसीए रूपरेखा के तहत आ जाएगा. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर तक सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का पूंजी पर्याप्तता अनुपात एक साल पहले के 12.34 फीसद से सुधरकर 15.38 फीसद पर आ गया था. इस साल मार्च में रिजर्व बैंक ने आइडीबीआइ को पीसीए रूपरेखा से हटा दिया. उसके बाद सितंबर में कामकाज में सुधार आने के बाद इंडियन ओवरसीज बैंक और यूको बैंक को भी इस रूपरेखा से हटा लिया गया था.

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