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समाजवादी पार्टीः कुनबा सहेजने की कोशिश

यूपी की सत्ता छिनने और फिर लगातार किए जा रहे सियासी प्रयोगों के नाकाम होने के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पार्टी का आधार मानी गईं जातियों के वोटबैंक को फिर से एकजुट करने उतरे.

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सैफई में 14 नवंबर को अपने घर पर पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को संबोधि‍त करते सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव सैफई में 14 नवंबर को अपने घर पर पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को संबोधि‍त करते सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव

होली से दीवाली के बीच के खासे ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने चाचा और भतीजे के बीच की दूरियां कुछ कम कर दी हैं. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 14 नवंबर को दीवाली मनाने के लिए पत्नी डिंपल यादव और बच्चों के साथ इटावा जिले में अपने पैतृक गांव सैफई के सिविल लाइंस स्थित अपने आवास पहुंचे थे.

इस दौरान अखिलेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, बसपा से गठबंधन करने की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि सपा छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी. अपने चाचा शिवपाल सिंह की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी—लोहिया (प्रसपा) से समझौते के बारे में उन्होंने कहा कि वे प्रसपा को जसवंतनगर सीट देने को तैयार हैं.

ये वही अखिलेश यादव हैं जो इसी वर्ष सैफई में होली त्योहार के दौरान चाचा-भतीजे के नारे लगने से नाराज हो गए थे और कभी सैफई में होली न मनाने की बात कही थी. दीवाली के मौके पर चाचा-भतीजे के बीच की खाई पटती नजर आई. अखिलेश ने घोषणा की, ''सपा की सरकार बनेगी तो प्रसपा नेता को कैबिनेट मंत्री भी बना देंगे. गठबंधन में प्रसपा को भी एडजेस्ट करेंगे.’’

प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव कहते हैं, ''भतीजे पर चाचा का आशीर्वाद हमेशा रहता है. यूपी के विधानसभा चुनाव में अगर हमें सम्मानजनक सीटें मिलीं तो हम समाजवादी पार्टी से गठबंधन करेंगे.’’

राजनैतिक विश्लेषक और लखनऊ के कान्यकुब्ज कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर बृजेश कुमार मिश्र बताते हैं, ''वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुलायम सिंह यादव परिवार में विघटन से समाजवादी पार्टी को खासा नुक्सान उठाना पड़ा था. यादव वोटों में बिखराव के चलते 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा 47 सीटों पर सिमट गई थी.

इसी वजह से 2019 के लोकसभा चुनाव में भी अखि‍लेश के सियासी प्रयोग कामयाब नहीं हो पाए थे.’’ 2019 के लोकसभा चुनाव में फि‍रोजाबाद सीट से चुनाव लड़ रहे शि‍वपाल सिंह यादव खुद तो मुख्य मुकाबले से बाहर रहे थे लेकिन 90,000 से ज्यादा वोट पाकर सपा का गणि‍त बिगाड़ दिया था. 

समाजवादी पार्टीः कुनबा सहेजने की कोशिश
समाजवादी पार्टीः कुनबा सहेजने की कोशिश

इस सीट पर सपा उम्मीदवार और पार्टी 
के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव के पुत्र निवर्तमान सांसद अक्षय यादव को भाजपा से हार का सामना करना पड़ा था. इसी तरह कन्नौज और बदायूं लोकसभा सीट पर हालांकि प्रसपा ने उम्मीदवार नहीं खड़े किए थे लेकिन सपा के भीतर पड़ी फूट के चलते दोनों सीटों पर साइकिल को नुक्सान उठाना पड़ा था.

इसी नवंबर में विधानसभा की सात सीटों पर हुए उपचुनाव में सपा केवल जौनपुर की मल्हनी सीट ही जीत सकी. मल्हनी में सपा विधायक रहे दिवंगत नेता पारसनाथ यादव के शि‍वपाल यादव से निजी रिश्ते थे. शि‍वपाल ने पारसनाथ यादव के घर जाकर यादव मतदाताओं को एकता का संदेश दिया था. प्रोफेसर मिश्र बताते हैं, ‘‘शि‍वपाल अब अखि‍लेश के नेतृत्व वाली पार्टी में नहीं रह सकते. अखि‍लेश को भी यह बात समझ में आ गई है. इसलिए उन्होंने यादव वोटों में बिखराव रोकने के लिए प्रसपा से गठबंधन की बात की है, विलय की नहीं.’’

अखि‍लेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती अति पिछड़ा वोटबैंक को भी सहेजने की है जो  2017 के विधानसभा चुनाव में चली भाजपा की आंधी में सपा से उड़ गया था. संगठन में तेजी लाने के लिए अखि‍लेश ने विधान परिषद सदस्य राजपाल कश्यप को सपा के पिछड़ा वर्ग का नया अध्यक्ष बनाया है. समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता कश्यप लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं. युवाओं के साथ यूपी की अति पिछड़ी जातियों में इनकी अच्छी पकड़ है.

यूपी की पिछड़ी जातियों में राजनैतिक प्रतिनिधित्व के रूप में यादव और कुर्मी जातियों की बहुलता है. पिछड़ी जातियों के सामाजिक-राजनैतिक स्वरूप का अध्ययन करने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर आर.के. विश्वकर्मा बताते हैं, ‘‘संख्याबल में सबसे बड़ी होने की वजह से पिछड़ी जातियों में सबसे ज्यादा फायदा यादव जाति को ही हुआ था.

2017 के विधानसभा चुनाव में गैर यादव जातियां पिछड़ेपन को मुद्दा बनाकर भाजपा के पक्ष में लामबंद हुई थीं जिससे पिछड़ा वर्ग की राजनीति में ऊपर से नीचे तक सीधा-सीधा विभाजन साफ दिखने लगा है. सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती गैर यादव पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोडऩे की है.’’

गैर यादव पिछड़ी जातियों को सपा के साथ जोडऩे की रणनीति के तहत अखि‍लेश ने पार्टी के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ की कार्यकारिणी में गैर यादव पिछड़ी जातियों को बड़ी संख्या में प्रतिनिधि‍त्व देने की योजना तैयार की है. इसके लिए सपा सुप्रीमो ने पार्टी के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के अध्यक्ष कश्यप को जरूरी निर्देश भी दिए हैं. इसी फॉर्मूले को जिला, ब्लॉक और विधानसभा स्तर पर बनने वाली पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ की कमेटियों में भी लागू करने का निर्देश दिया गया है.

गैर यादव पिछड़ी जातियों में कुर्मी के अलावा एक जैसी सामाजिक संरचना वाली जातियां हैं, जैसे—सैनी, शाक्य, कुशवाहा और मौर्य. पिछड़ी जातियों में इनकी कुल हिस्सेदारी 14 प्रतिशत से बस थोड़ा-सा ज्यादा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुशवाहा, शाक्य, मौर्य और सैनी जातियों में प्रभाव रखने वाले महान दल के अध्यक्ष केशव देव मौर्य के साथ 24 अगस्त को अखि‍लेश ने लखनऊ में एक विस्तृत बैठक की थी. मौर्य बताते हैं, ‘‘महान दल 2022 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर लड़ेगा.’’

हालांकि सपा की सबसे बड़ी कमजोरी पार्टी के पास यादव जाति के अलावा दूसरी पिछड़ी जाति के किसी प्रभावशाली नेता का न होना है. लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर राजेश्वर कुमार बताते हैं, ‘‘सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के समय पार्टी के पास बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेता थे जो पिछड़ी कुर्मी जाति पर मजबूत पकड़ रखते थे. सपा ने नरेश उत्तम को सपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है लेकिन वे पिछड़ी जाति में प्रभाव रख पाने में कामयाब नहीं हुए हैं.’’

वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव नजदीक आता देख अखिलेश भी अब अपने पिता मुलायम सिंह के सियासी फॉर्मूले को आजमाने की कोशिश में हैं. इसी के मद्देनजर अखिलेश ने 25 जुलाई को पूर्व सांसद फूलन देवी की पुण्यतिथि पर सिर्फ श्रद्धांजलि ही अर्पित नहीं की बल्कि उनके जीवन पर आधारित एक वृत्तचित्र के प्रोमो को साझा कर अति पिछड़ा निषाद समुदाय को राजनैतिक संदेश देने की कोशिश की.

अखिलेश ने ईरानी फिल्ममेकर हुसैन मार्टिन फाजली की फूलन देवी पर बनी डॉक्यूमेंट्री का प्रोमो ट्वीट किया था. प्रोमो में फूलन को ऐसी महिला के तौर पर दिखाया गया है जो अति पिछड़ी जाति में पैदा हुई थी और जिसे बिना किसी अपराध के मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ी. इस डॉक्यूमेंट्री में बेहमई हत्याकांड को फूलन के प्रतिशोध के रूप में सही ठहराया गया है.

यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद अतिपिछड़ी जातियों में राजभर और निषाद जातियां भी अपने स्वतंत्र राजनैतिक अस्तित्व के लिए संघर्ष करती दिखाई दे रही हैं. इसी क्रम में 2018 में गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद ने अपने बेटे प्रवीन निषाद को सपा से चुनाव लड़वाकर सांसद बनवाया. लोकसभा चुनाव के पहले वे सपा छोड़कर भाजपा से जुड़ गए. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा से टिकट पाकर प्रवीन संतकबीर नगर से सांसद बने.

अब फूलन देवी के जरिए सपा निषाद जाति को एक सकारात्मक संदेश देने की कोशि‍श कर रही है. पूर्वांचल की महत्वपूर्ण पिछड़ी जाति राजभर का प्रतिनिधि‍त्व करने वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर सपा के संपर्क में हैं लेकिन उनकी राजनैतिक विश्वसनीयता पर उठ रहे सवाल के कारण अखि‍लेश उनके साथ गठजोड़ पर ज्यादा गंभीर नहीं हैं.

राज्यसभा चुनाव के दौरान 28 अक्तूबर को बसपा के मुस्लि‍म विधायक असलम अली, असलम राइनी और मुज्तबा सिद्दीकी खुलकर सपा के साथ आ गए थे. मुस्लि‍म मतदाताओं को अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने में जुटी सपा ने बसपा के बागी विधायकों से प्रचारित कराया कि मायावती के भाजपा प्रेम से आहत होकर ही उन्होंने यह कदम उठाया है. बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का भाजपा के प्रति नरम रवैया और कांग्रेस के सुस्त पड़े संगठन ने यूपी की मुस्लिम राजनीति में सपा को और मजबूत किया है.

पूर्व कैबिनेट मंत्री और सपा विधायक अहमद हसन कहते हैं, ''दूसरी पार्टियों ने मुसलमानों का सिर्फ इस्तेमाल किया लेकिन इन्हें उचित प्रतिनिधि‍त्व केवल सपा ने ही दिया है. यही वजह है कि अब दूसरे दलों के मुस्लिम नेता भी सपा की ओर देख रहे हैं.’’ पूर्व केंद्रीय मंत्री और बदायूं से पांच बार सांसद रहे सलीम शेरवानी ने 27 अक्तूबर को सपा की सदस्यता ग्रहण की थी. नाम न छापने की शर्त पर सपा के एक बड़े नेता बताते हैं कि आने वाले दिनों में दूसरी पार्टियों के कई बड़े नेता सपा का दामन थामने वाले हैं. इनमें मुस्लिम नेताओं की भी अच्छी-खासी संख्या है.

भाजपा के विरोध में आक्रामक रुख अख्तियार करके अखि‍लेश सत्ताविरोधी मतों को एकजुट करने की कोशि‍श कर रहे हैं. इसके लिए सपा ने अपना पूरे संगठन को मतदाताओं के बीच उतार दिया है. अखि‍लेश ने भाजपा सरकार की गलत नीतियों और सपा की जनोन्मुखी नीतियों का प्रचार करने के लिए एक ‘आह्वान पत्र’ तैयार किया है. सपा कार्यकर्ता इस ‘आह्वान पत्र’ को घर-घर बांट रहे हैं.

गाजीपुर में सपा की नीतियों का प्रचार करने के लिए ‘अगस्त क्रांति यात्रा’ निकाल चुके अभि‍षेक यादव बताते हैं, ''यूपी की जनता के बीच पूर्ववर्ती अखि‍लेश यादव सरकार की विकास नीतियों के प्रति सकारात्मक भाव है. सपा कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों को भाजपा सरकार की गलत नीतियों के बारे में जागरूक कर रहे हैं.’’

डेढ़ साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले अखि‍लेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन मतदाताओं से सपा को दोबारा जोडऩे की है जिन्होंने 2012 में साइकिल को यूपी की सत्ता सौंपी थी. अगर अखि‍लेश ऐसा कर सके तो ‘‘बाइस में बाइसिकल’’ का उनका नारा सबसे तेज गूंजता सुनाई पड़ेगा. 

अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती अति पिछड़ा वोटबैंक को भी सहेजने की है जो 2017 के विधानसभा चुनाव में चली भाजपा की आंधी में सपा से दूर छिटक गया था.

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