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टीकाकरणः चलना है जरा संभल-संभल के

''महामारी के चलते कई बच्चे घरों में बंद हैं. यह उनकी सेहत या भविष्य के लिए अच्छा नहीं. जिंदगी को फिर सामान्य बनाने के लिए टीके लगवाना जरूरी है''

एक नमूना और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर स्वास्थ्य कार्यकर्ता कोविड-19 की जांच के लिए एक बच्चे का नमूना लेते हुए एक नमूना और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर स्वास्थ्य कार्यकर्ता कोविड-19 की जांच के लिए एक बच्चे का नमूना लेते हुए

गुरुग्राम की श्रेया नांगिया दो बच्चों की मां हैं. उन्होंने मार्च 2020 में कोविड महामारी की शुरुआत के बाद से ही बच्चों को अपने चार बेडरूम के घर से बाहर नहीं निकलने दिया. उनकी 12 और 14 साल की दोनों बेटियों को करीब 20 महीने से घर में बंद होने की हताशा और आक्रोश से उबरने के लिए ऑनलाइन काउंसलिंग की शरण लेनी पड़ी. पर 48 वर्षीया नांगिया कहती हैं कि वे उनके सामाजिक मेलजोल का जोखिम नहीं उठा सकतीं क्योंकि परिवार में उनके 86 वर्षीय पिता भी रहते हैं जो डायबिटिक और दिल के मरीज हैं. वे कहती हैं, ''मेरे पति घर से ही अपना कारोबार चलाते हैं और मैं गृहिणी हूं. हमने अपने बच्चों को टीके लगने तक घर पर ही पढ़ने देने की विशेष अनुमति ली है. अपने बच्चों को तकलीफ उठाते देखना बहुत कष्टदायक है, पर जिंदगी का जोखिम इस कष्ट से कहीं ज्यादा है.''

जब 20 अगस्त, 2021 को 12 से 18 साल के बच्चों को टीके लगाने का ऐलान हुआ और भारतीय कंपनी जायडस कैडिला की सूई-मुक्त डीएनए वैक्सीन जायकोव-डी को आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी मिली, तो नांगिया परिवार खुशी से चहक उठा. मगर दो महीने बाद भी जब टीके लगने के बारे में कुछ पता नहीं चला, तो उत्साह ठंडा पड़ गया. नांगिया कहती हैं कि दो महीने पहले उनकी बेटियां वैक्सीन लगवाने वालों की कतार में शायद सबसे आगे होतीं, पर अब वे दावे से ऐसा नहीं कह सकतीं. वे सवाल करती हैं, ''क्या यह सुरक्षित है? हम ऑनलाइन खबरें पढ़ते रहते हैं कि बच्चों की इस वैक्सीन के लिए और परीक्षणों की जरूरत है जिसमें वक्त लगेगा. और साइड इफेक्ट? उसका भी पता नहीं.''

नांगिया अकेली नहीं हैं. चंडीगढ़ की पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन ऐंड रिसर्च और पुदुच्चेरी की जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन ऐंड रिसर्च के शोधकर्ताओं ने 770 मरीजों पर ऑनलाइन सर्वे किया. इसके अनुसार, करीब 77 फीसद मरीजों ने कहा कि वे अपने बच्चों को टीके नहीं लगवाना चाहते. क्यों भला? इसके कारण हैं—सुरक्षा और प्रभाव के बारे में चिंता (86.4 फीसद), साइड इफेक्ट (78.2 फीसद) और यह विचार कि बच्चों को हल्की-फुल्की बीमारी होते रहने के रुझान के कारण उन्हें टीके लगवाने की जरूरत नहीं (52.8 फीसद).

टीकाकरणः चलना है जरा संभल-संभल के
टीकाकरणः चलना है जरा संभल-संभल के

डॉक्टर बार-बार प्रामाणिक जानकारी देकर टीके लगाने की झिझक को दूर कर रहे हैं. बेंगलूरू के बनेरघट्टा रोड स्थित फोर्टिस अस्पताल की पीडियाट्रिक इनटेंसिव केयर यूनिट के प्रमुख डॉ. योगेश कुमार गुप्ता कहते हैं, ''डीएनए वैक्सीन को परीक्षण के बाद ही मंजूरी दी गई है. यह सुरक्षित है. कुछ साइड इफेक्ट तो हर वैक्सीन में होते हैं. ज्यादातर लोग ऑनलाइन झूठी खबरों से चक्कर में पड़ जाते हैं. माता-पिता को डॉक्टर से मिलकर स्पष्ट पता करना चाहिए.'' अहमदाबाद स्थित जायडस ने जुलाई में तीसरे चरण के परीक्षण के नतीजों का ऐलान किया. परीक्षण 28,000 से ज्यादा वॉलंटियर पर किए गए. जायडस की तीन खुराक 28-28 दिनों के फासले से दी जानी हैं.

इसे लक्षणों वाले संक्रमण के खिलाफ 67 फीसद असरदार पाया गया है. परीक्षण के लिए वैक्सीन लेने वाले मरीजों में दूसरी खुराक के बाद गंभीर मामला या कोविड से जुड़ी मौत सामने नहीं आई और तीसरी खुराक के बाद हल्के संक्रमण का मामला भी सामने नहीं आया. कंपनी ने बताया कि तीसरे चरण के परीक्षण के लिए नामांकित वयस्कों और करीब 1,000 किशोरों, दोनों में वैक्सीन के प्रति सहन क्षमता एक समान थी. यही नहीं, जायकोव-डी के लिए जिस डीएनए प्लाज्मिड प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया गया है, वह कोविड के नए रूपांतरणों के हिसाब से खुद को आसानी से ढाल लेता है. दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अनिल सचदेवा कहते हैं, ''महामारी के चलते कई बच्चे घरों में बंद हैं. यह उनकी सेहत या भविष्य के लिए अच्छा नहीं. जिंदगी को सामान्य बनाने के लिए टीके लगवाना जरूरी है.''

गुरुग्राम के मणिपाल अस्पताल की पीडियाट्रिशियन डॉ. बरखा पांडेय कहती हैं कि उनके मरीज अपने बच्चों को टीके लगवाने को लेकर उत्सुक हैं, पर मन में कहीं डर भी है. वे कहती हैं, ''बच्चे कमजोर आयु समूह में हैं. बच्चों की वैक्सीन के लिए लंबे वक्त की सुरक्षा और असर का डेटा होना जरूरी है. इसीलिए हमें कोविड वैक्सीनों के बारे में पढ़ते रहना होता है क्योंकि कुछ साइड इफेक्ट ज्यादा लंबे वक्त के दौरान भी हो सकते हैं.''

टीकाकरणः चलना है जरा संभल-संभल के
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बच्चों को टीके लगवाने को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुक वही माता-पिता हैं जिनके बच्चों को डायबिटीज, लीवर या किडनी की परेशानियां, अस्थमा या दूसरी सांस की बीमारियों जैसी सह-रुग्णताएं हैं. डॉ. पांडेय कहती हैं, ''पिछली दो देशव्यापी लहरों में हमने जो देखा, उसके मुताबिक बच्चों में कोविड उतना खतरनाक नहीं है. मगर जिन बच्चों को दूसरी बीमारियां हैं, उनमें जोखिम ज्यादा है. इन बच्चों में कोविड के बाद भीतरी सूजन और जटिलताएं होने का जोखिम भी ज्यादा है. इसलिए वयस्कों के साथ उन्हें भी टीके लगवा लेने में ही समझदारी है.''

नेशनल एक्सपर्ट ग्रुप ऑन वैक्सीन एडमिनिस्ट्रेशन के सदस्यों के मुताबिक, बच्चों के लिए टीका अभियान 2022 की शुरुआत में चरणबद्ध तरीके से शुरू होगा. कोविड के तेज लक्षणों के सबसे ज्यादा अंदेशे वाले बच्चों को प्राथमिकता दी जाएगी.

सरकार ने जायकोव-डी की अंतिम कीमत का ऐलान किया है और 265 रुपए प्रति खुराक (नीडल-फ्री एप्लिकेटर के लिए 93 रुपए और) के हिसाब से 1 करोड़ खुराक का ऑर्डर भी दे दिया है. सरकार ने कहा है कि वह बच्चों के टीकाकरण में सतर्कता बरतेगी. स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने पिछले हक्रते कहा, ''विशेषज्ञों की राय के आधार पर हम फैसला करेंगे.''

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टीकाकरणः चलना है जरा संभल-संभल के

भारत की करीब 40 फीसद आबादी 18 से कम उम्र की है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस आयु समूह को टीके नहीं लगाने का मतलब है कोविड वायरस को बार-बार पैदा होने, रूप बदलने और संक्रमण फैलाने देना. डॉ. सचदेवा कहते हैं, ''कोविड के खिलाफ बच्चों की रोग प्रतिरोधक प्रतिक्रिया अमूमन मजबूत पाई गई है, पर कइयों को भले-चंगे होने के बाद बहुत-से अंगों में सूजन आई.'' इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आइएपी) के इन्टेंसिव केयर चैप्टर के आंकड़े बताते हैं कि देश भर में बच्चों में मल्टीसिस्टम इन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम (एमआइएस-सी) के 2,000 से ज्यादा मामले आए.

हालांकि कुल मिलाकर ये बिरले मामले ही हैं. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 22 अगस्त, 2021 तक कोविड से हुई कुल मौतों में 20 साल से कम के भारतीय महज 1.2 फीसद हैं. डॉ. गुप्ता कहते हैं, ''ढेरों दूसरी बीमारियां हैं जिनसे बच्चों को कोविड से कहीं ज्यादा खतरा है. माता-पिता को इन बीमारियों से बच्चों की रक्षा करने से कोई समझौता नहीं करना चाहिए, महज इस डर से कि क्लिनिक में कोविड हो जाएगा. बच्चों को पहले से मंजूर टीके लगवाने के लिए कोविड वैक्सीन का इंतजार मत कीजिए.''

हालांकि डॉक्टर मानते हैं कि फिलहाल वयस्क टीकाकरण अव्वल प्राथमिकता होनी चाहिए और उसके बाद सह-रुग्णता से ग्रस्त बच्चों को टीके लगाएं. खासकर इसलिए कि अभी तक 18 साल से ऊपर के कुल करीब 94 करोड़ भारतीय में से केवल 37 करोड़ का ही पूर्ण टीकाकरण हुआ है. ऐसी योजना से हरेक के लिए जिंदगी सामान्य होने में लंबा वक्त लगेगा पर इससे मौत का जोखिम और कोविड के बाद की जटिलताएं तो कम हो ही जाएंगी.

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