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संगीतः ट्रैजडी क्वीन का म्युजिकल अफसाना

 महजबीं, एक औरत की दास्तान एक औरत ही गाए और औरत ही नैरेट करे, इस सोच का नतीजा है महजबीं.

अलामी फोटो अलामी फोटो

चलो कहीं चलें, घूमती हुई सड़क के किनारे, किसी मोड़ पर, रोशनी के किसी खंभे के नीचे...अपने-अपने माजी के नुचे-घुटे घरौंदों से दूर, किसी सूखे हुए नाले की पुलिया पर...'' साठ-सत्तर के दशक की चिंतनशील अभिनेत्री मीना कुमारी ने, जाहिर है, रोजमर्रा का सबब बन चुकी उदासियों से ऊबकर ही अपनी एक नज्म में यह कहा होगा.

उनकी जिंदगी जमाने के लिए एक पहेली-सी रही है. अभिनय की दुनिया में करिश्माई मुकाम, अदब में गहरा दखल. फिर भी भीतर गहरी प्यास, निराशा और उदासी.

उनकी अदायगी ने सिनेमा और अदब के जिन करोड़ों प्रेमियों पर जादू किया, शास्त्रीय, सूफी गायिका रश्मि अग्रवाल भी उन्हीं में से हैं. यह जादू उन पर इस कदर तारी हुआ कि कुछ साल पहले उन्होंने मीना की कुछ गजलों/नज्मों की धुन बनाकर उन्हें पेश किया.

लेकिन उन्हीं के शब्दों में, "लगता था कि कुछ अधूरा-सा है.'' मीना की दुनिया में डूबते-उतराते अंत में उन्हें सूझा कि क्यों न इस "ट्रैजडी क्वीन'' के दुनिया में कदम रखने से उनके रुखसत होने तक के सफर को पूरे एक किस्से में पेश किया जाए, उन्हीं की गजलों-नज्मों और उनकी फिल्मों के गानों के जरिए.

मीना की 85वीं बरसी पर 1 अगस्त को दिल्ली के हैबिटाट सेंटर में महजबीं नाम से वे जो पेश करने जा रही हैं, उसमें यही सारे पहलू हैं. डेढ़ घंटे की इस म्युजिकल प्रस्तुति के लिए डॉ. दानिश इकबाल की लिखी स्क्रिप्ट को किस्से के अंदाज में कनुप्रिया सुना रही हैं, जो आरजे का करियर छोड़कर थिएटर की दुनिया में उतरी हैं.

अभिनय, नृत्य, शायरी, बैठकबाजी, ऊपर से एक गहरी खला. रश्मि दरअसल मीना के आईने में एक औरत की जिंदगी के चढ़ाव-उतार को ही पकडऩे की कोशिश करेंगी.

"निपट गरीबी में बचपन से ही शुरू हुआ उनका स्ट्रगल आखिर तक जारी ही रहा. प्यार की उनकी तलाश कभी पूरी नहीं हुई. वे कहती हैः आगाज तो होता है, अंजाम नहीं होता, जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता.'' रश्मि इस किस्से के आगे के कुछ सूत्र पकड़ाते हुए कहती हैं. पाकीजा के तीन गानों "ठाढ़े रहियो'', "चलते-चलते'' और "आज हम अपनी दुआओं का असर्य को उन्होंने एक ही टुकड़े में पिरोया है क्योंकि तीनों ही राग खमाज के वैरिएशन वाले'' हैं.

इस प्रस्तुति में बाकी किरदारों के सीधे नाम लेने से बचा गया है, जिससे कि कोई बखेड़ा न खड़ा हो. इसमें साजों में सारंगी, हारमोनियम, तबला और परकशन का प्रयोग है. रश्मि अपने "कंफर्ट जोन'' से बाहर निकलकर यह प्रयोग कर रही हैं. अगर यह कामयाब रहा तो फिर इसमें जोड़-घटाव करते हुए दूसरे शहरों में भी पेश किया जाएगा, इस "अजीब दास्तां'' को.

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