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तीन ने छेड़ दी तान

पदकों की जीत का एक नया सिलसिला शुरू कर स्क्वैश खिलाड़ी जोशना चिनप्पा, सौरभ घोषाल और दीपिका पल्लीकल कार्तिक ने साबित कर दिया कि तिकड़ी आखिर क्या नहीं कर सकती

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स्वर्ण के लिए : (बाएं से क्रमश:) जोशना चिनप्पा; सौरभ घोषाल स्वर्ण के लिए : (बाएं से क्रमश:) जोशना चिनप्पा; सौरभ घोषाल

जोशना चिनप्पा और सौरभ घोषाल अप्रैल की शुरुआत में जब डब्ल्यूएसएफ वर्ल्ड डबल्स स्क्वैश चैंपियनशिप के लिए जी-जान से जुटे थे, तो बेशक वे चाहते थे कि टूर्नामेंट में एक-एक कदम आगे बढ़ते जाएं और अपने पिछले प्रदर्शनों में सुधार लाएं. लेकिन उनका एक साझा और साथ ही साथ निजी लक्ष्य भी था. उन्हें उम्मीद थी कि अपनी टीम की एक और खिलाड़ी दीपिका पल्लीकल कार्तिक को फिर खेल के सबसे ऊंचे स्तर पर लाने के लिए तैयार कर पाएंगी. दीपिका ने अपना आखिरी टूर्नामेंट 2018 में यूएस ओपन के रूप में खेला था. अक्तूबर 2021 में जुड़वां बच्चों को जन्म देने के बाद वे भी खेल में वापसी पर नजरें गड़ाए हुए थीं.

घोषाल के शब्दों में, ''हम चाहते थे कि वह फिर से टूर्नामेंट खेलने वाला जोश और रोमांच महसूस करने लगे. वह जीवन में बदलाव के एक दौर से गुजरी और ऐसे समय में आपका आत्मविश्वास हिल-सा जाता है.'' हफ्ता खत्म होते-होते दीपिका की झोली दो स्वर्ण पदकों से भरी थी. पहले उन्होंने घोषाल के साथ जोड़ी बनाकर मिक्स्ड डबल्स का फाइनल जीता और एक घंटे बाद चिनप्पा के साथ जोड़ी में महिला युगल खिताब जीता. यह इस टूर्नामेंट में भारत का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन था. मनोबल बढ़ाने वाला यह प्रदर्शन इसी साल कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों से पहले बिल्कुल सही वक्त पर आया.

घोषाल कहते हैं, ''दीपिका कुछ वक्त से बाहर थी, जाहिरा तौर पर उसे ही निशाना बनाया जाने वाला था. हमें समझना पड़ा कि उसकी कमजोरियां कैसे पता न चलने दें और ताकत को बेहतर ढंग से सामने लाएं. हम टॉप चार में आना चाहते थे ताकि कॉमनवेल्थ खेलों में अच्छी वरीयता मिले. पूरा टूर्नामेंट ही जीत लेना बोनस है, सोने पे सुहागा.'' महामारी के दौरान खेलों के शुरू होने, फिर बंद होते रहने की कवायद के चलते चिनप्पा और घोषाल भी सुस्त-से पड़ गए. दौरे शुरू हुए तो दोनों दीपिका के साथ वक्त गुजारने चैन्नै चले आते. चिनप्पा कहती हैं, ''चार महीने पहले हम जितनी ज्यादा से ज्यादा ट्रेनिंग कर सकते थे, करने लगे. वह दूर थी लेकिन कोर्ट पर हमारी साझेदारी सुकून वाली होती थी.''

ग्लास्गो में चुपचाप जश्न मनाने के बाद इस तिकड़ी की नजर फिर आगे की राह पर थी. बरसों से उन्होंने भारतीय स्क्वैश का झंडा थाम रखा है. 2010 के बाद से इन तीनों ने अकेले अपने दम पर कुल 21 कॉमनवेल्थ और एशियाई पदक जीते. उन्हें पता है कि ढेरों उम्मीदें उन पर टिकी हैं. दीपिका 30 की हैं और इन टूर्नामेंटों से पहले अपना दमखम और जोश हासिल करने के लिए ज्यादा टूर्नामेंट खेलना चाहेंगी. घोषाल और चिनप्पा दोनों 35 के हैं. वे जानते हैं कि खुद को युवा बनाए रखने का और कोई रास्ता नहीं. चिनप्पा कहती हैं, ''मुझे अपनी कमजोरियों और अनुकूलन क्षमता पर बहुत मेहनत करनी     पड़ी, खुराक को लेकर ज्यादा चौंकन्ना होना पड़ा और चोटों से बचने तथा शरीर को वर्कआउट के लिए तैयार रखने की खातिर पक्का करना पड़ा कि प्रशिक्षण सत्रों के बीच भली-चंगी रहूं.''

दो बार के विश्व चैंपियनशिप पदकधारी इंग्लैंड के क्रिस वॉकर को हाल ही में भारतीय टीम का कोच बनाया गया है. वर्ल्ड डबल्स वॉकर के कंधों पर पहली जिम्मेदारी थी और भारतीयों की दोहरी जीत ने सामूहिक उम्मीदें बढ़ा दी हैं. घोषाल कहते हैं, ''वे बहुत जोशीले हैं. अपने साथ अनुभवों की खान लेकर आए हैं. हम ज्यादा से ज्यादा उनकी सलाह लेकर हरसंभव सुधार ला सकते हैं.''

बात सिर्फ कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों की नहीं है. चैंपियनों से हमेशा ही ऊंची उम्मीदें लगाई जाती हैं. उन्हें कितना दबाव महसूस होता है? चिनप्पा इसे खेल का हिस्सा बताती हैं. वे कहती हैं,  ''मुझे अच्छा लगता है और कृतज्ञ महसूस करती हूं कि यह मौका मिला. इसे अनुभव करने के लिए अपने टीम के दूसरे खिलाड़ियों का साथ होना भी बहुत सुखद है.''

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