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यह दौर खाकी वालों के नाम

आइएएस लॉबी मध्य प्रदेश में पुलिस आयुक्त प्रणाली के विरोध में थी, लेकिन मुख्यमंत्री इस मसले को हल करने में कामयाब रहे

शासन डीजीपी विवेक जौहरी और मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस के साथ सीएम चौहान शासन डीजीपी विवेक जौहरी और मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस के साथ सीएम चौहान

वर्षों तक 'इस पर विचार करने' के बाद 21 नवंबर को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की कि उनकी सरकार राज्य में पुलिस आयुक्त प्रणाली शुरू करेगी. यह प्रणाली में जिला मजिस्ट्रेट और उनके अधीनस्थ कार्यकारी मजिस्टेरियल कार्यों को अनिवार्य रूप से पुलिस अधिकारियों को हस्तांतरित करना शामिल है. इस व्यवस्था को राज्य में दो बार 2012 और 2018 में लगभग लागू कर दी गई थी, लेकिन आइएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) लॉबी ने इसे विफल कर दिया था. वह लॉबी अब आखिरकार नरम पड़ गई है. चौहान कहते हैं कि शुरू में राज्य की राजधानी भोपाल और व्यावसायिक राजधानी इंदौर को पुलिस आयुक्त मिलेंगे.

तो मुख्यमंत्री ने पुलिस आयुक्त प्रणाली लाने का फैसला क्यों लिया, जबकि इसकी कोई बड़ी मांग नहीं की गई थी या कानून-व्यवस्था की कोई गंभीर समस्या भी नहीं थी? सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल की शुरुआत में हैदराबाद में एसवीपी राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में आइपीएस प्रोबेशनरों (प्रशिक्षुओं) को संबोधित करते हुए सुझाव दिया था कि जिन राज्यों ने अभी तक इस प्रणाली को लागू नहीं किया है, उन्हें दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में ऐसा करने पर विचार करना चाहिए.

यह जानते हुए कि आइएएस लॉबी की ओर से विरोध होगा, चौहान ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि सत्ता का हस्तांतरण क्षेत्राधिकार के विवाद में न बदल जाए. 22 नवंबर को, राज्य के गृह विभाग ने नियुक्तियों के लिए अधिसूचना पर काम करना शुरू किया और कानून विभाग ने इसकी समीक्षा की. बाद के दिनों में, यह तय करते हुए कि नए नियुक्त आयुक्तों को कौन-सी शक्तियां हस्तांतरित की जाएंगी, आइएएस और आइपीएस लॉबी के बीच युद्ध जैसा वातावरण बन गया.

गृह विभाग के शीर्ष आइएएस अधिकारियों ने एक कठिन सौदेबाजी की, इसलिए मध्य प्रदेश में नए पुलिस आयुक्तों को अब भी हथियारों के लाइसेंस जारी करने की शक्ति नहीं होगी (अन्य महानगरों में अपने समकक्षों की तरह) और न ही संपत्ति संलग्न करने की शक्ति प्राप्त होगी. लेकिन सीआरपीसी की अन्य धाराओं पर उन्हें अधिकार प्राप्त होगा, जैसे कि धारा 151 जो निवारक नजरबंदी, शस्त्र अधिनियम, यूएपीए या गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) और मोटर वाहन अधिनियम.

कई मायनों में, मध्य प्रदेश में पुलिस आयुक्त अन्य राज्यों के अपने समकक्षों की तुलना में कमजोर होंगे. हालांकि, उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में सरकार आयुक्तों को और अधिक काम सौंपेगी. एक वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी कहते हैं, ''यह बस कुछ वक्त की बात है. एक बार आयुक्तों की नियुक्ति होने के बाद, सरकार की ओर से और अधिक कार्य हस्तांतरित किए जा सकते हैं.''

आयुक्त कार्यालयों के कर्मचारी की भी समस्या है. प्रस्तावित ढांचे में अतिरिक्त महानिदेशक/महानिरीक्षक (एडीजी/आइजी) के रैंक का एक आयुक्त शामिल है, जिसमें एक संयुक्त आयुक्त और दो अतिरिक्त आयुक्त उसके अधीन होंगे. भोपाल और इंदौर में मौजूद दो पुलिस जिलों को एक डीसीपी (पुलिस उपायुक्त) के प्रभार के तहत चार भागों में विभाजित किया जाएगा. प्रस्तावित कर्मचारी ढांचा आइएएस को ज्यादा सर्वोच्चता का एहसास कराती है, क्योंकि आइएएस अफसर के पास पुलिस आयुक्त की तुलना में लगातार अधिक अधिकार मिलता रहेगा, भले ही पुलिस आयुक्त उस आइएएस अफसर से कई वर्ष वरिष्ठ हो.

हालांकि आइएएस एसोसिएशन ने अपने अध्यक्ष आइ.सी.पी. केसरी के इस बयान पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि वे ''इस मसले को महज आइएएस एवं आइपीएस के बीच के विवाद तक सीमित नहीं करना चाहते.'' कार्यकारी मजिस्ट्रेट, प्रांतीय सिविल सेवा के एसडीएम और तहसीलदारों का प्रतिनिधित्व करने वाले एसोसिएशन काफी अधिक मुखर थे और उन्होंने इस कदम के खिलाफ मुख्यमंत्री को विरोध-पत्र भी सौंपा है.

आखिर, पुलिस आयुक्त नागरिकों के जीवन को कैसे प्रभावित करेंगे? अंग्रेजों ने ही 1856 में चेन्नै और कोलकाता में तथा बाद में 1864 में मुंबई में पुलिस आयुक्तालयों की शुरुआत की थी. वर्तमान में, देश के 28 राज्यों में से 12 राज्यों में 69 पुलिस आयुक्तालय हैं और आठ में से सात केंद्र शासित प्रदेशों में यह व्यवस्था नहीं है.

पुलिस आयुक्त प्रणाली के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि यह कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर 'एकल खिड़की' प्रणाली प्रदान करता है. जिला प्रशासन में डीएम और एसपी, दोनों ही कानून व्यवस्था बनाए रखने में शामिल रहते हैं. एसपी जहां अपराध की जांच करने वाली टीम का नेतृत्व करता है, वहीं डीएम और अन्य राजस्व अधिकारी मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य करते हैं. मेट्रो शहरों में, जहां राजस्व अधिकारी अन्य कार्यों में शामिल रहते हैं, एक पुलिस आयुक्त प्रणाली कानून-व्यवस्था के मामलों में प्रतिक्रिया समय को घटा देती है, क्योंकि कार्यकारी और मजिस्ट्रेट, दोनों कार्य एक निश्चित रैंक से ऊपर के पुलिस अधिकारियों में निहित होते हैं.

उत्तर प्रदेश पुलिस और बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह कहते हैं, ''अधिकार और जिम्मेदारी को लेकर द्वंद्व नहीं होना चाहिए. कानून और व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है और ऐसा करने की शक्ति उसके पास रहनी चाहिए. जिन स्थानों पर पुलिस आयुक्त प्रणाली शुरू नहीं की गई है, वहां पुलिस 'स्थिति से निपटती है', जबकि इसका फैसला मजिस्ट्रेट की ओर से लिया जाता है. अक्सर दोनों के नजरिये में अंतर होता है, जो समस्या पैदा करता है. जब कुछ गलत होता है, तो हमेशा पुलिस को ही दोषी ठहराया जाता है.''

प्रकाश सिंह ने आइएएस अफसरों की ओर से इस प्रणाली के विरोध में दिए जाने वाले इस तर्क का भी खंडन किया कि आयुक्त प्रणाली पुलिस की शक्तियों पर आवश्यक अंकुश को भी दरकिनार करती है. उन्होंने कहा, ''चेक और बैलेंस (जांच और संतुलन) के कई स्तर हैं. जिन शहरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली मौजूद है, वहां ऐसा नहीं है कि पुलिस नियंत्रण से बाहर हो गई है. पुलिस बल पर भरोसा किया जाना चाहिए.'' इतना ही नहीं, प्रकाश सिंह का कहना है कि आइएएस अफसर इस तरह से विरोध कर रहे हैं, मानो उनकी जमींदारी छीन ली गई हो.

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