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बिहारः सिर्फ 'ऑक्सीजन’ के भरोसे कोविड की तीसरी लहर से जंग

कोविड की दूसरी लहर में किरकिरी के बावजूद बिहार के अस्पतालों के नहीं बदले हालात नए ऑक्सीजन प्लांट लग गए पर डॉक्टरों तथा अन्य इंतजामात की भारी कमी बरकरार है.

नहीं बदले हालात कॉन्फ्रेंस के दौरान मुख्यमंत्री के साथ आइएमए के पदाधिकारी बगैर मास्क के  नहीं बदले हालात कॉन्फ्रेंस के दौरान मुख्यमंत्री के साथ आइएमए के पदाधिकारी बगैर मास्क के 

बिहार/ओमिक्रॉन

पुष्यमित्र

पटना के बापू सभागार में 28 दिसंबर, 2021 को देश भर से आए चार से पांच हजार डॉक्टरों की भीड़ जुटी थी. मौका इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय सम्मेलन का था. उस सम्मेलन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, ''बिहार में कोरोना की तीसरे लहर की शुरुआत हो चुकी है. इसके लिए राज्य सरकार ने अस्पतालों के संचालन से लेकर लोगों की मदद करने के लिए हर तरह की तैयारी की है. लोगों को जागरूक करने का प्रयास भी चल रहा है और इन सबकी जिम्मेदारी आप डॉक्टरों पर है.’’

मगर दुर्भाग्यवश उनके संबोधन के वक्त मंच पर मौजूद ज्यादातर डॉक्टरों ने मास्क तक नहीं पहने थे. ऑडिटोरियम खचाखच भरा था, सोशल डिस्टेंसिंग का कोई ख्याल नहीं रखा गया था. इस लापरवाही ने आखिरकार अपना असर दिखाया. एक हफ्ते बाद जब यह खबर लिखी जा रही है, पटना के तीन सौ से अधिक डॉक्टर संक्रमण का शिकार हो चुके हैं. इनमें सबसे अधिक संख्या नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (एनएमसीएच) के डॉक्टरों की है. वहां कुल 239 डॉक्टर संक्रमित हैं.

हालांकि एनएमसीएच के अधीक्षक डॉ. विनोद कुमार सिंह, जो खुद संक्रमित हो चुके हैं, नहीं मानते कि उनके यहां के डॉक्टर आइएमए सम्मेलन की वजह से संक्रमित हुए हैं. उन्होंने बताया कि कॉन्फ्रेंस में सिर्फ रजिस्टर्ड डॉक्टर ही शामिल हुए थे. ऐसे संक्रमित डॉक्टरों की संख्या 20-25 ही है. ज्यादातर संक्रमित मेडिकल स्टूडेंट हैं.

आइएमए, पटना के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार भी कहते हैं, ''जितने डॉक्टर संक्रमित हैं, उनमें से बीस फीसदी भी हमारे कॉन्फ्रेंस में नहीं आए थे. हम लोग आयोजक थे, हमें कोई इंफैक्शन नहीं हुआ.’’ मगर एनएमसीएच के हॉस्टल में मौजूद एक इंटर्न ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जितने भी छात्र संक्रमित हुए हैं, उनमें ज्यादातर उस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए थे.

बिहारः सिर्फ 'ऑक्सीजन’ के भरोसे कोविड की तीसरी लहर से जंग
बिहारः सिर्फ 'ऑक्सीजन’ के भरोसे कोविड की तीसरी लहर से जंग

मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और देश भर से आए आइएमए पदाधिकारियों की मौजूदगी में पटना में हुई यह लापरवाही बताती है कि बिहार कोविड की तीसरी लहर का मुकाबला करने के लिए कितना सजग है. दुखद तथ्य यह है कि इस आयोजन से 13 दिन पहले कर्नाटक हाइकोर्ट ने वहां हो रहे डॉक्टरों के कॉन्फ्रेंस निओकॉन पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए थे. भाग लेने वालों की संख्या तीन हजार से घटाकर 305 कर दी और सभी का आरटी-पीसीआर टेस्ट और वैक्सीनेशन अनिवार्य कर दिया. मगर बिहार में चार-पांच हजार लोगों की भीड़ बिना किसी ऐहतियात के जुट गई.

राज्य में अचानक कोविड के मामले तेजी से बढ़े हैं. सक्रिय मरीजों की संख्या चार हजार के करीब पहुंच गई है. इसमें ओमिक्रॉन के एक ही मरीज की पुष्टि हुई है, मगर इसके लिए बहुत कम सैंपल (पांच सौ से भी कम) जांचे भी गए हैं. स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत के मुताबिक राज्य में फिलहाल एक ही जगह आइजीआइएमएस में ओमिक्रॉन की जांच हो रही है. हर सैंपल की ओमिक्रॉन जांच मुमकिन नहीं है. हालांकि राज्य सरकार सभी तरह की तैयारियों का दावा कर रही है और ऐसा जता रही है कि इस बार उसकी तैयारी पुख्ता है. पर्याप्त ऑक्सीजन बेड और वेंटिलेटर उपलब्ध हैं. (देखें बॉक्स) 

नहीं सुधरे हालात
पटना से सिर्फ 50 किमी दूर सदर अस्पताल, आरा में पहुंचते ही पता चल जाता है कि तैयारी कैसी है. अस्पताल में ज्यादातर लोगों के चेहरे पर मास्क नहीं थे. इनमें रोगी और परिजन ही नहीं, अस्पताल के कर्मी और अधिकारी भी शामिल थे. अस्पताल प्रबंधक बिना मास्क लगाए 12 बजे अस्पताल पहुंचे थे, वह भी फोन से बुलाए जाने पर.

जबकि सुबह दस बजे से उनके दफ्तर के आगे मुलाकातियों की भीड़ थी. सिविल सर्जन रामप्रीत सिंह भी छुट्टी पर थे. चार्ज एडीशनल सीएमओ केएन सिंह के पास थे, मगर वे भी कहीं गए हैं. डीपीएमओ भी गैर-हाजिर थे. भोजपुर जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में कोरोना की तीसरी लहर का मुकाबला बिना किसी सेनापति के चल रहा था.

बिहारः सिर्फ 'ऑक्सीजन’ के भरोसे कोविड की तीसरी लहर से जंग
बिहारः सिर्फ 'ऑक्सीजन’ के भरोसे कोविड की तीसरी लहर से जंग

12 बजे पहुंचे अस्पताल प्रबंधक कौशल कुमार दुबे ने अस्पताल का कोविड वार्ड दिखाया. वह चार अलग-अलग कमरों में 15-15-15 और 20 बेड का था. हालांकि पहले दो कमरे में इमरजेंसी वार्ड के मरीज भर्ती थे, तीसरे में नशामुक्ति केंद्र चल रहा था और चौथे में तीन बेड अस्त-व्यस्त तरीके से पड़े थे, जैसे स्टोर रूम हो. प्रबंधक बोले, इमरजेंसी वार्ड को दस जनवरी को कहीं और शिफ्ट किया जाएगा.

नशामुक्ति वार्ड आज खाली हो जाएगा और चौथे कमरे को जल्द तैयार कर लिया जाएगा. उन्होंने कहा कि अस्पताल में तीन वेंटिलेटर भी हैं, मगर उनके हिसाब से वे एक कमरे में बंद थे, जिसकी चाबी उनके पास नहीं थी. अस्पताल में एक ही चीज सकारात्मक दिखी, वह एक हजार लीटर प्रति मिनट का ऑक्सीजन प्लांट था, जिसकी पाइप लाइन हर जगह बिछी थी.

कोविड की दूसरी लहर में इसी अस्पताल की अव्यवस्था की तसवीरें और वीडियो वायरल हुए थे. खासकर स्थानीय विधायक मनोज मंजिल की वह तसवीर वायरल, जिसमें वे लगातार अस्पताल परिसर में बैठकर मरीजों की मदद कर रहे थे. फोन पर उन्होंने बताया कि यहां आज तक आइसीयू चालू नहीं हो पाया है.

न 24 घंटे ईसीजी की सुविधा है, न ब्लड बैंक की. कोविड को लेकर सिर्फ ऑक्सीजन प्लांट बिठा दिया गया है, दूसरी चीजें जस की तस हैं. दिलचस्प है कि इस अस्पताल को लगभग दस साल पहले आइएसओ सर्टिफिकेट मिला था. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय इसी जिले के प्रभारी मंत्री हैं, भोजपुर के सांसद केंद्र में मंत्री हैं. तब इस सदर अस्पताल का ऐसा हाल है.

फर्श पर मरीजों का इलाज
मुजफ्फरपुर के सदर अस्पताल के पुरुष वार्ड में एक 25 वर्षीय महिला रोगी अनिष्का शाह एडमिट थीं, जो दरअसल आइसोलेशन वार्ड की मरीज थीं. कोविड संदिग्ध होने की वजह से उन्हें दूसरे मरीजों से अलग रखा जाना चाहिए था. ड्यूटी पर मौजूद इकलौती स्टाफ नर्स ने कहा, ''हम क्या करें. उसे यहां भेज दिया गया तो हमें रखना ही पड़ेगा.’’ गनीमत ये थी कि उन्हें कोविड नहीं, कोल्ड डायरिया हुआ था.

उस अस्पताल में चार बेड का एक आइसीयू था, उसमें वेंटीलेटर तो दिखा, मगर उस वक्त तक उसके ऊपर से पोलिथीन पैकेज को हटाया नहीं गया था. अस्पताल प्रबंधक विपिन ने बताया कहने को अस्पताल में 30 डॉक्टर हैं, मगर हमें नियमित 17-18 डॉक्टरों की ही सेवा मिल पाती है, नर्स भी सिर्फ 40 हैं. ज्यादातर मरीज प्रसव के लिए आते हैं, मगर महिला रोग विशेषज्ञ एक ही है, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ एक भी नहीं है, बाहर से कॉल पर बुलाना पड़ता है. ड्रेसर के भी सभी पद खाली हैं.

मुजफ्फरपुर शहर में एक मेडिकल कॉलेज भी है, श्रीकृष्ण मेमोरियल मेडिकल कॉलेज अस्पताल. चमकी बुखार की वजह से यह अस्पताल हमेशा चर्चा में रहता है. वहां मरीजों की जबरदस्त भीड़ थी मगर मास्क लगाये लोग कम ही दिखे. ओपीडी में लंबी कतारें थीं, इमरजेंसी वार्ड के मरीज खुले गलियारों में बेड और फर्श पर लेटे इलाज कराते नजर आये. इनमें गंभीर मरीज भी थे. मेडिकल सुप्रिंटेंडेंट बाबूसाहेब झा ने बताया, हमारी मजबूरी है. यहां सिर्फ 907 बेड हैं, मगर हमेशा 1100 से 1200 मरीज भर्ती रहते हैं. लिहाजा गलियारे में भी जहां-जहां जगह होती है, हमें बेड लगाना पड़ता है.
 
गया में सबसे ज्यादा केस
कोविड की इस लहर में पटना के बाद सबसे अधिक मरीज गया जिले से मिल रहे हैं. मंगलवार तक वहां 565 सक्रिय मरीज थे. गया शहर में 53 माइक्रो कंटोनमेंट जोन बने हैं, हालांकि ये जोन कहने को हैं. रामधनपुर मोहल्ले में तीन कंटोनमेंट जोन बने और अखबारों में तसवीरें भी छपी थीं. मगर वहां बैरिकेडिंग कहीं नजर नहीं आ रही थी. एक मरीज के घर छोटा सा पोस्टर चिपका था. पड़ोसियों ने कहा कि लोगों ने खुद बैरिकेट हटा लिए हैं. वे सारा काम खुद ही बाहर निकल कर रहे हैं.

पूरे जिले में एक ही मरीज शहर के अनुग्रह नारायण मेडिकल कॉलेज के 130 बेड के कोविड वार्ड की तीसरी मंजिल पर भर्ती था. इसी कोविड वार्ड में पिछले साल एक महिला मरीज के साथ रेप की घटना हुई थी.

वहां मेडिकल सुप्रिंटेंडेंट प्रदीप कुमार अग्रवाल ने तीन ऑक्सीजन प्लांट और 700 से अधिक ऑक्सीजन बेड को दिखाकर कहा कि तैयारी पुख्ता है. उन्होंने अस्पताल में 76 वेंटिलेटर और 264 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर होने की भी जानकारी दी. मगर यह स्वीकार किया कि मैनपावर की कमी है.

डॉक्टरों की संख्या 30 फीसद कम है, टेक्नीशियनों की भी कमी है. गया के सिविल सर्जन के.के. राय ने भी मैनपावर के कमी की बात स्वीकार की. उनके मुताबिक जिले में 50 से 60 फीसद डॉक्टरों से ही काम चल रहा है. मुजफ्फरपुर के सिविल सर्जन ऑफिस से मिली सूची के मुताबिक, डॉक्टरों के 601 स्वीकृत पदों में से 391 डॉक्टर ही हैं. वहां तीन सरकारी अस्पतालों में कोई नियमित चिकित्सक नहीं है.

डॉक्टरों का संकट बरकार
यह सच है कि राज्य सरकार ने ऑक्सीजन की उपलब्धता को लेकर काफी काम किया है. मेडिकल कॉलेजों, सदर अस्पतालों और अनुमंडल स्तरीय अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट बने हैं और दिसंबर महीने में उनका मॉक ड्रिल भी कराया गया है. कई जिलों में कोविड वार्ड बने हैं. बुधवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने बताया कि राज्य में 12 हजार ऑक्सीजन बेड तैयार हैं.

वेंटिलेटर की उपलब्धता पर भी काम किया गया है. मगर जमीनी हकीकत यही है कि राज्य के अस्पतालों में मैनपावर का जबरदस्त संकट है. जो तीसरी लहर तेज होने पर बड़ी मुसीबत बन सकता है. 

यहां डाक्टरों की संख्या कितनी कम है, इसका अंदाजा बिहार सरकार के उप सचिव शैलेष कुमार की 24 मई, 2021 को महालेखाकार को लिखी चिट्ठी से पता चलता है. वे लिखते हैं, ''डब्लूएचओ के मुताबिक हर एक हजार की आबादी पर एक चिकित्सक होना चाहिए, राष्ट्रीय स्तर औसत 1456 मरीज पर एक डॉक्टर का है, जबकि बिहार में एक डॉक्टर पर 28,391 लोगों का बोझ है.’’

अप्रैल, 2021 में जब बिहार में कोविड की की वजह से स्थितियां बेलगाम हो गई थीं, तब पटना हाइकोर्ट इस मसले पर रोजाना सुनवाई कर रहा था. उसी दौरान स्वास्थ्य विभाग ने हाइकोर्ट को बताया था कि राज्य में सामान्य चिकित्सक के लगभग साठ फीसदी पद खाली हैं. बाद में जब इस मुद्दे पर सरकार की खूब फजीहत हुई तो डॉक्टरों के खाली पड़े पदों को भरने के लिए 6338 स्थायी और 1000 अस्थायी पदों की नियुक्तियां निकाली गईं. उन नियुक्तियों के जरिए अब तक कितने डॉक्टर बिहार के सरकारी अस्पतालों को मिले, यह आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. 

इंडिया टुडे ने यह आंकड़ा जानने के लिए स्वास्थ्य विभाग में एक मेल और उसके दो रिमाइंडर भेजे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. स्वास्थ्य मंत्री से बात करने की भी लगातार कोशिश की गई, मगर उनसे वक्त नहीं मिला. हालांकि बुधवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस संवाददाता ने अपर मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत से यह सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि मैनपावर बड़ा मसला नहीं है. हमारा फोकस ऑक्सीजन बेड पर है. हालांकि पिछली लहर के मुकाबले इस बार डॉक्टर और नर्स बढ़े हैं. मगर उन्होंने सटीक संख्या नहीं बताई.
 
न पर्याप्त नर्स हैं, न स्टाफ
स्वास्थ्य विभाग ने पटना हाइकोर्ट को यह भी बताया था कि स्वास्थ्य कर्मियों के भी आधे से अधिक पद खाली हैं. उन पदों को भी भरने की बात हुई, मगर कितने लोग बहाल हो पाए, यह बताने के लिए कोई तैयार नहीं. इस संबध में भी मुजफ्फरपुर जिले के आंकड़े हमारी समझ बढ़ाते हैं. जिले में नर्सिंग स्टाफ के 398 पदों के बदले सिर्फ 176 कार्यरत हैं. सपोर्टिंग स्टाफ के 1178 पद हैं, जिनमें फिलहाल 481 कार्यरत हैं. ऐसी स्थिति लगभग हर जिले की है. इसलिए कोविड से मुकाबले की तैयारी के संदर्भ में सरकार बेड, ऑक्सीजन और वेंटीलेटर की बात ही करती है, मैनपावर के मसले को गायब कर जाती है.

राज्य सरकार इस बात को भले न समझे मगर नीति आयोग ने पिछले दिनों देश के जिला अस्पतालों की स्थिति पर जारी रिपोर्ट में लिखा है कि जब तक अस्पतालों में पर्याप्त स्टाफ नहीं होंगे, कर्मियों की ड्यूटी शिफ्टवार तरीके से ठीक से नहीं लगेगी, सभी 14 तरह की जांचों की सुविधा नहीं होगी, सपोर्ट सेवाएं नहीं होंगी और मेडिकल उपकरणों की नियमित देखभाल नहीं होगी तब तक अस्पतालों की हालत नहीं सुधरेगी. मगर बिहार सरकार का स्वास्थ्य महकमा मानता है कि बेड पर ऑक्सीजन पहुंचा देने से उसकी तैयारी पूरी हो गई है. बाकी सब राम के भरोसे है. 

बिहार का हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर

तीसरी लहर के लिए सरकारी तैयारी

ऑक्सीजन युक्त बेड                                  12000
जिला अस्पतालों में आइसीयू बेड                    455
अनुमंडल अस्पतालों में आइसीयू बेड              266
निजी अस्पताल कोविड के इलाज के लिए        550
ओमिक्रॉन की जांच के लिए जीनोम लैब-            01     (आइजीआइएमएस, पटना)
(बुधवार, 5 जनवरी 2022 को स्वास्थ्य विभाग ने मीडिया को बताया)

सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी
डाक्टर
स्वीकृत पद-                                11645
पद रिक्त (सामान्य चिकित्सक)       3206 
पद रिक्त विशेषज्ञ चिकित्सक          4149 
कुल खाली पद                               7355
स्वास्थ्य कर्मी
पद सृजित                                   91921
पद खाली                                    46256
(अप्रैल, 2021 में बिहार सरकार ने पटना हाइकोर्ट को)
जानकारी दी. उसके बाद के आंकड़े उपलब्ध नहीं)

—पुष्यमित्र

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