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भाजपाः यानी बज गई घंटी!

विधानसभा चुनावों में निराशाजनक नतीजों ने ब्रांड मोदी पर भाजपा की निर्भरता को लेकर सवाल खड़े किए

गलत पड़ गए दांव जेपी नड्डा और अमित शाह के साथ नरेंद्र मोदी गलत पड़ गए दांव जेपी नड्डा और अमित शाह के साथ नरेंद्र मोदी

भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के झटके से कराह रही है, जहां उसके पास अपनी छलांग भरती महत्वाकांक्षाओं के बावजूद 294 सदस्यों के सदन में महज 77 विधायक हैं. भाजपा ने राज्य के चुनाव को नाक का सवाल बनाकर चुनाव प्रबंधन में माहिर देश भर के अपने तीरअंदाजों को तैनात किया था और चीजों को झकझोरने के लिए अमित शाह की 'स्तब्ध और अवाक' करने की रणनीति अपनाई थी. पार्टी और खासकर खुद शाह 200 से ज्यादा सीटें जीतने का नगाड़ा पीटते घूम रहे थे. अब उसके पास 2019 के अपनी 40.7 फीसद वोट हिस्सेदारी बनाए नहीं रख पाने की समीक्षा करना भर बाकी रह गया है.

उत्तरपूर्व में भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने असम में दूसरा कार्यकाल हासिल कर लिया है, पर बिल्कुल पड़ोस के घटनाक्रम ने इस जीत को फीका कर दिया. बंगाल में भाजपा का राज्यारोहण पार्टी के मंसूबों के लिए बेहद अहम था, लेकिन इसने पार्टी की कमजोरियों को और खासकर इस बात को उजागर कर दिया कि उसके बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को गोलबंद करने के लिए बीच के स्तर के कार्यकर्ताओं का अभाव है. इस कमी को पूरा करने के लिए पार्टी दूसरी राज्य इकाइयों से पार्टी नेताओं को लेकर आई, पर पीछे मुड़कर देखने पर यह रणनीति गलत दिखाई देती है. लगता है 'बंगाल के गौरव' का कार्ड खेलना ममता के हक में काम कर गया.

प्रवासी कार्यकर्ताओं को लेकर उनके तंज ने भाजपा को आखिर बैकफुट पर ला ही दिया था. असम में जहां पार्टी के पास सर्वानंद सोनोवाल और हेमंत बिस्व सरमा सरीखे स्थानीय नेता हैं, वहीं बंगाल में चुनाव में उतारे गए कई उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और वाम दलों से 'आयातित' थे. भाजपा की 'वैचारिक मातृ संस्था' राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का कहना है कि उसे ''भूल (नेताओं को आयात करने की) और चूक (अपनी ही पार्टी के लोगों के दावों)'' की कीमत चुकानी पड़ी.

आरएसएस के नेताओं का कहना है कि अगर उनके अपने कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ने का मौका दिया गया होता, तो पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया होता. हालांकि पुदुच्चेरी में ठीक यही रणनीति कारगर रही मालूम देती है. यहां कांग्रेस से पाला बदलकर आए दलबदलू भाजपा के टिकट पर जीत गए, जबकि केरल में पार्टी और आरएसएस के कार्यकर्ताओं की एकजुट कोशिशें भी नेमोम की वह सीट भी बचाने में नाकाम रहीं जो उसने पिछले चुनाव में जीती थी.

भाजपाः उतर गई कलई
भाजपाः उतर गई कलई

बंगाल के नतीजों का असर भाजपा कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा जब वे फरवरी 2022 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में चुनावी युद्धक्षेत्र में लौटेंगे. पंजाब के एक अपवाद को छोड़ दें तो भाजपा इन सभी राज्यों में सत्ता में है. अगर पार्टी को भारतीय राजनीति के केंद्र में रहना है तो उसके लिए इन राज्यों में सत्ता बनाए रखना बेहद जरूरी है.

इन राज्यों के कार्यकर्ता नए सिरे से नाप-तौल कर रहे होंगे कि ध्रुवीकरण कितना कारगर रहेगा और मोदी-(जे.पी.) नड्डा-शाह की तिकड़ी के पूरक के तौर पर स्थानीय नेतृत्व को कितनी प्रमुखता मिलनी चाहिए. स्थानीय नेतृत्व की कमजोरियों की वजह से भाजपा पर ज्यादा दबाव आ जाता है कि वह प्रधानमंत्री मोदी के ब्रांड पर निर्भर करे. पार्टी इसके साथ बिहार में कामयाब रही थी, दिल्ली में वह इसका असरदार इस्तेमाल नहीं कर पाई और अब बंगाल में इसका पूरी ताकत से इस्तेमाल करने के बावजूद उसे हार का स्वाद चखना पड़ा. पर इसमें शक नहीं कि बीते सात सालों में भाजपा ने लोगों के साथ रिश्ता कायम करने की मोदी की काबिलियत का फायदा उठाया है और कई विधानसभा चुनावों में नतीजों का रुख अपने पक्ष में मोड़ा है, खासकर बिहार और हरियाणा में, जहां सत्ता-विरोधी भावना भी एक कारक थी. देश भर में कोविड के मामलों में उछाल की वजह से बंगाल में मोदी को चुनाव के छठे दौर से प्रचार अभियान को तिलांजलि देनी पड़ी. लेकिन प्रधानमंत्री ने जब प्रचार किया भी, तब वे कितने असरदार थे? पहले छह दौरों में जब मोदी-शाह का चुनाव अभियान पूरे जोर पर था, तृणमूल ने 158 सीटें जीतीं जबकि भाजपा को महज 64 सीटों से संतोष करना पड़ा.

उधर आरएसएस का कहना है कि वह एक व्यक्तित्व के प्रचार-प्रसार के खिलाफ है और इस बात से नाखुश भी कि हरेक चुनाव अभियान मोदी बनाम अन्य की लड़ाई बन जाता है. भाजपा को अपने राज्य नेताओं को मजबूत करना होगा, यह तो खैर तय ही है. इस दिशा में कुछ काम चल भी रहा है, मसलन उत्तराखंड में, जहां पार्टी ने चुनाव से महज एक साल पहले मुख्यमंत्री बदला है. दूसरी तरफ, कर्नाटक है जहां बी.एस. येदियुरप्पा के उत्तराधिकार की कोई योजना नहीं है, जो 2023 में चुनाव के वक्त 80 साल से ऊपर के हो जाएंगे. इसी तरह हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, त्रिपुरा के बिप्लव देव और गोवा के प्रमोद सावंत को लेकर पार्टी के भीतर ही अच्छा-खासा विरोध है. येदियुरप्पा को छोड़ दें तो ये सभी मुख्यमंत्री अपने दुबारा चुने जाने के अभियान को कुछ चमक देने के लिए 'ब्रांड मोदी' पर निर्भर हैं.

साथ ही साथ विपक्ष भी अपने चाकुओं की धार तेज कर रहा है. विपक्ष शासित राज्यों ने वैक्सीन के वितरण, जीएसटी में राज्यों के हिस्से और साथ ही बिजली, कृषि, श्रम और सावर्जनिक क्षेत्र के उद्यमों के निजीकरण सरीखे बेहद अहम क्षेत्रों में आमूलचूल बदलावों पर मोदी सरकार के जोर देने के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इसके अलावा कोविड के हालात से निबटने को लेकर लोगों के बीच विरोध बढ़ रहा है. ये वे मुद्दे हैं जिन पर प्रधानमंत्री मोदी के लिए आरएसएस से जुड़े लोगों और संगठनों का समर्थन जुटाना भी मुश्किल हो रहा है.

बंगाल के चुनाव में पूर्व मिदनापुर के प्रभारी रहे केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कहते हैं, ''हमारे आलोचकों का कहना है कि हमने पश्चिम बंगाल नहीं जीता. हां, हमने नहीं जीता. लेकिन हम अपनी वोट हिस्सेदारी के साथ-साथ विधानसभा में अपनी ताकत बढ़ाने में कामयाब रहे. हमने गद्दीनशीन मुख्यमंत्री (ममता बनर्जी) को भी हराया.'' मंत्री महोदय ने इस बात पर खुशी जताई कि उनकी राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस और विचारधारात्मक विरोधी कम्युनिस्ट पश्चिम बंगाल के राजनैतिक परिदृश्य से साफ हो गए. कांग्रेस असम, पुदुच्चेरी, केरल में भी हार गई और तमिलनाडु में डीएमके की पीठ पर सवारी भर कर सकी. ''यह भी हमारे लिए बुरी खबर नहीं है.''

प्रधान कहते हैं कि 2024 के नजरिए से भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने अपनी स्थिति मजबूत की है. भाजपा ने खुद को अखिल भारतीय पार्टी के तौर पर सामने रखा है और ''हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान'' एजेंडे की छवि से छुटकारा पा लिया है, ताकि राष्ट्रीय अफसाने पर उसी तरह प्रभावी हो सके जैसे पहले कांग्रेस हुआ करती थी. अपने नए भूभागों के विस्तार की कोशिश में पार्टी 2015 से ही 'मिशन कोरोमंडल' (जिसका नाम देश के पूरब को दक्षिण से जोड़ने वाले तट के नाम पर रखा गया है) के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ी है. लेकिन अभी उसे बहुत लंबी दूरी पार करनी है.

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