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पश्चिम बंगाल चुनावः त्रिकोणीय लड़ाई?

पिछले आम चुनाव में वाम मोर्चा के वोटों का हिस्सा केवल 7 फीसद था जबकि 2014 के चुनाव में यह 30 फीसद था. उनके वोटों की हिस्सेदारी में इस गिरावट के चलते भाजपा को 20 फीसद वोटों का फायदा हुआ था

संयुक्त मोर्चा हाथरस गैंगरेप के खिलाफ कोलकाता में सीपीएम और कांग्रेस का प्रदर्शन संयुक्त मोर्चा हाथरस गैंगरेप के खिलाफ कोलकाता में सीपीएम और कांग्रेस का प्रदर्शन

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से पहले वहां एक व्यापक 'धर्मनिरपेक्ष' गठबंधन बनाने की तैयारी चल रही है. कांग्रेस-वाम मोर्चा मौलाना अब्बास सिद्दीकी और 21 जनवरी को गठित उनके इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आइएसएफ) को साथ लाने का प्रयास कर रहा है. 33 वर्षीय सिद्दीकी बंगाल में 3,000 से ज्यादा मस्जिदों पर नियंत्रण रखने वाले फुरफुरा शरीफ के वारिस हैं. वे दक्षिण बंगाल के हुगली, हावड़ा, दक्षिण 24 परगना और उत्तर 24 परगना जिलों में मुसलमानों पर खासा प्रभाव रखते हैं. उनके आइएसएफ में आठ संगठन शामिल हैं जो दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों और हिंदू मटुआ का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनका मोर्चा मुसलमानों और समाज के अन्य 'कमजोर वर्गों' को एक नया भविष्य देने की बात करता है. अपनी एक जनसभा को संबोधित करते हुए सिद्दीकी कहते हैं, ''इस बार (विधानसभा चुनाव में) हम किंगमेकर की भूमिका अदा करेंगे.''

कांग्रेस और वाम मोर्चा 294 में से 230 सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप दे चुके हैं और खबर है कि वे सिद्दीकी को बची हुई लगभग 60 सीटों का एक बड़ा हिस्सा देने के लिए तैयार हैं. बहरहाल, सिद्दीकी ने इस प्रस्ताव पर अभी कोई उत्साह नहीं दिखाया है. वे कहते हैं, ''अगर वे (कांग्रेस-वाम मोर्चा) गठबंधन बनाने में रुचि रखते हैं तो उन्हें मेरे साथ सीटों के बंटवारे पर बातचीत करनी चाहिए. मुझे पता है कि वे आपस में 230 सीटों पर बंटवारे को अंतिम रूप दे चुके हैं. इसके बाद उन्होंने मेरे लिए ज्यादा विकल्प ही नहीं छोड़ा है.''

सीटों का बंटवारा ही एकमात्र अड़चन नहीं है. तीनों के बीच कोई भी चुनावी समझौता इस बात पर निर्भर करेगा कि सिद्दीकी बंगाल में असदुद्दीन ओवैसी और उनकी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुसलिमीन (एआइएमआइएम)—जिसे कई लोग भाजपा की बी टीम के रूप में देखते हैं—से खुद को अलग रखना चाहते हैं या नहीं. ओवैसी बंगाल में चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं और इस बारे में सिद्दीकी के संपर्क में रहे हैं. कांग्रेस और वाम मोर्चा ओवैसी से दूरी बनाए रखना चाहते हैं. उन्हें इस बात की भी आशंका है कि सांप्रदायिक एजेंडा लेकर चलने वाली ओवैसी की राजनीति से प्रदेश में मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण को और भी बढ़ावा मिल सकता है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में व्यापक स्तर पर ध्रुवीकरण देखा गया था जिसमें तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को मिलाकर उनके खाते में 83 फीसद (क्रमश: 43.3 फीसद और 40 फीसद) वोट पड़े थे.

वाम मोर्चा और कांग्रेस ने सिद्दीकी को अपने खेमे में लाने के लिए हर तरह से सकारात्मक संकेत दिए हैं. वाम मोर्चा के अध्यक्ष सूर्यकांत मिश्र ने आइएसएफ को पिछड़ों और वंचितों का प्रतिनिधित्व करने वाला धर्मनिरपेक्ष मंच बताया है. कांग्रेस के नेता अब्दुल मक्कान ने पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी को पत्र लिखकर बताया है कि सिद्दीकी के साथ गठबंधन बंगाल चुनाव में बड़ा 'गेम चेंजर' साबित हो सकता है क्योंकि मौलाना ''केवल मुसलमानों में ही नहीं बल्कि दलितों और आदिवासियों में भी बहुत लोकप्रिय हैं.''

बंगाल के 10 करोड़ मतदाताओं में मुसलमान करीब 30 फीसद हैं. इनमें से करीब एक-चौथाई चार जिलों में केंद्रित हैं जहां फुरफुरा शरीफ (यानी सिद्दीकी) का काफी प्रभाव है. राज्य में मुस्लिम बहुल 125 सीटों में से कांग्रेस और वाम मोर्चा ने 2016 में 40 सीटें जीती थीं और अन्य 85 सीटों पर वे दूसरे नंबर पर रहे थे. अब्बास को अपने साथ लाकर यह नया मोर्चा तृणमूल को नुक्सान पहुंचा आसानी से कामयाबी पा सकता है. माकपा के पॉलित ब्यूरो के सदस्य मो. सलीम कहते हैं, ''मुस्लिम वोटों को हमसे छीनकर ममता बनर्जी ने बड़े-बड़े वादों और तुष्टिकरण के बल पर उन्हें अपने साथ बनाए रखने की कोशिश की है. पर अब मुसलमान तृणमूल को छोड़ने का मन बना चुके हैं क्योंकि वे सुरक्षित विकल्प खोज रहे हैं जो वैचारिक रूप से भाजपा से मुकाबला कर सके.''

भाजपा को भी यह बात पता है कि कांग्रेस और वाम मोर्चा उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसीलिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगे बढ़कर उनके खिलाफ मोर्चा संभाल रहे हैं. 7 फरवरी को हल्दिया में आयोजित एक रैली में मोदी ने आरोप लगाया कि भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस-वाम मोर्चा और तृणमूल आपस में 'मैच-फिक्सिंग' कर रहे हैं. उधर, सिद्दीकी खुद को मुसलमानों का मसीहा बताने वाली ममता को निशाना बना रहे हैं और मुसलमानों के लिए विकास करने के उनके दावे पर सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं, ''ममता के शासन में भाजपा ने बंगाल में पहली बार लोकसभा की 18 सीटें जीत लीं और वह मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी है. मुसलमानों को यह बात समझ में आ गई है कि ममता और भाजपा एक-दूसरे के पूरक हैं.''

कांग्रेस के नेताओं को लगता है कि सिद्दीकी के साथ समझौता करके पार्टी अपने पारंपरिक गढ़ मुर्शिदाबाद (दक्षिण बंगाल) और उत्तर दीनाजपुर तथा मालदा (उत्तर बंगाल) में सफलता हासिल कर सकती है. कांग्रेस दक्षिण दीनाजपुर, मालदा और मुर्शिदाबाद में सिद्दीकी के लिए कोई भी सीट देने के लिए तैयार नहीं है. खबर है कि सिद्दीकी दक्षिण बंगाल में 40 सीटों की मांग कर रहे हैं जहां मुस्लिम बहुल 125 सीटों में से 61 सीटें आती हैं.

वाम मोर्चा को उनकी इस मांग से कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि उसका मानना है कि ऐसा करने से मुस्लिम वोटों पर तृणमूल की मजबूत पकड़ खत्म हो जाएगी और ममता को भारी नुक्सान पहुंचाया जा सकता है. 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल के पक्ष में 7 फीसद मुस्लिम वोटों के जाने से बंगाल में वाम मोर्चा के 34 साल पुराने शासन का अंत हो गया था. विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम अगर ममता का साथ छोड़ते हैं तो वे निश्चित रूप से प्रस्तावित कांग्रेस-वाममोर्चा-आइएसएफ गठबंधन के साथ जाएंगे.

पिछले आम चुनाव में वाम मोर्चा के वोटों का हिस्सा केवल 7 फीसद था जबकि 2014 के चुनाव में यह 30 फीसद था. उनके वोटों की हिस्सेदारी में इस गिरावट के चलते भाजपा को 20 फीसद वोटों का फायदा हुआ था. हालांकि आगामी चुनाव में वाम मोर्चा के कॉडरों का एक वर्ग भाजपा को फिर से वोट देने के बारे में पुनर्विचार कर सकता है. ममता की पार्टी को छोड़कर भाजपा में जाने वाले कई नेताओं, जिनमें से कई के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं, के कारण बहुतों को लगता है कि भाजपा एक प्रकार से तृणमूल का बदतर संस्करण है.

लेकिन वाम मोर्चा के कुछ कार्यकर्ताओं के मुताबिक, जब सारी उठापटक खत्म हो जाएगी तो चुनावी लड़ाई भाजपा बनाम तृणमूल पर आकर सिमट जाएगी. वाम मोर्चा की स्थानीय समिति के एक पूर्व नेता का कहना है, ''वाम मोर्चा का कॉडर, जो एक दशक तक तृणमूल के दमन का शिकार रहा है, एक बार फिर बदले की भावना से सरकार बदलने के लिए वोट देगा. वैसे, एक मजबूत मुस्लिम नेता (सिद्दीकी) कुछ मुस्लिम वोटों को खींच सकते हैं पर वाम मोर्चा के हिंदू वोटरों ने अपना मन बना लिया है.'' वे शायद इन दिनों चल रहे एक नारे का हवाला दे रहे हैं कि 'दूहजारएकुशे राम, चौबीशे बाम'' (2021 में भाजपा, 2026 में वाम मोर्चा).

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