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पंजाबः किधर जाएंगे मौन हिंदू वोटर

हिंदू वोटरों को मनाने के लिए सुखबीर को कड़ी मेहनत करनी होगी क्योंकि गठबंधन में जब अकाली दल ग्रामीण सिख आबादी को खैरातें बांटता था. भाजपा संतुलन साधते हुए हिंदू हितों की हिफाजत करती थी

दाता के दरबार अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल 6 अक्तूबर को जालंधर के देवी तालाब मंदिर में दाता के दरबार अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल 6 अक्तूबर को जालंधर के देवी तालाब मंदिर में

उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर में दर्शन करने पहुंचे पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश कांग्रेस समिति (पीपीसीसी) प्रमुख नवजोत सिंह सिद्धू की तस्वीरें 3 नवंबर की दोपहर से ही चारों ओर प्रसारित होने लगीं. इस 'शांति तीर्थयात्रा' का आयोजन कांग्रेस के नए पंजाब प्रभारी हरीश चौधरी ने किया था, ताकि झगड़ते नेताओं के मतभेद खत्म किए जा सकें और पंजाब के हिंदुओं को संदेश दिया जा सके कि पार्टी को उनकी भावनाओं का ख्याल है.

पंजाब में हिंदू मतदाता 38.5 फीसद हैं और यही वे वोटर हैं जो एकमुश्त तौर पर सबसे ज्यादा इधर से उधर खिसकते हैं. राज्य की 45 सीटों पर वे या तो बहुसंख्यक हैं या फिर इतनी तादाद में अपने बूते पर नतीजा तय कर सकें. बीते तीन दशकों में 7 से 14 फीसद हिंदू वोट इधर से उधर हुए हैं और इस तरह से उन्होंने जीत-हार का फैसला किया. 2017 में 10.5 फीसद हिंदू वोट शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन से अलग हो गए थे. नतीजतन 117 सदस्यों वाली विधानसभा में उसकी सीटें घटकर सीधे 18 पर आ गईं. उग्रवाद के बाद के बरसों में उसे इतनी कम सीटें पहले कभी नहीं मिली थीं. इसी तरह 2007 में 13.5 फीसद हिंदू वोट अमरिंदर सिंह की अगुआई वाली कांग्रेस हुकूमत से छिटककर चले गए थे और शहरी इलाकों से पार्टी का सफाया हो गया और अमरिंदर सरकार सत्ता से बेदखल हो गई थी.

पंजाब के हिंदू हमेशा से उस राजनैतिक पार्टी को समर्थन देते आए हैं जो उनके कारोबार को सुरक्षा दे सके और राज्य में अमन-चैन कायम रख सके. किसान आंदोलन और उसमें खालिस्तान समर्थक तत्वों की मौजूदगी की आशंका ने हिंदुओं और उदार सिखों को समान रूप से चिंतित कर दिया है. पाकिस्तानी ड्रोन से हथियार गिराने की खबरों और पंजाब में चुन-चुनकर हत्याएं करने के खालिस्तानी ऑपरेटरों के फरमान की अफवाहों से उनके मन में डर बैठ गया है. 2017-18 में जब सिद्धू ने करतारपुर साहिब गलियारा खोलने का श्रेय लिया तो कट्टर और पंथिक सिखों ने उनकी पीठ थपथपाई.

मगर तस्वीरों में उन्हें पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से गले मिलते और बाद में खालिस्तान समर्थक एक्टिविस्ट गोपाल सिंह चावला के साथ फोटो खिंचवाते देख हिंदू वोटर स्तब्ध और भयभीत रह गए. सिद्धू 2015 की गुरु ग्रंथ साहिब को अपवित्र करने और उसके बाद पुलिस गोलीबारी की घटना की जांच करवाने को लेकर अमरिंदर पर दबाव नहीं बना पाए थे. लेकिन अब चन्नी पर वे भारी पड़ते दिख रहे हैं. उनके दबाव में चन्नी ने राज्य के महाधिवक्ता ए.पी.एस. देओल को पहले ही चलता कर दिया है. मेलमिलाप के लिए आलाकमान के पड़ रहे दबाव की वजह से चन्नी को कुछ और रियायतें देनी पड़ सकती हैं. इस तरह के घटनाक्रमों ने पंजाब के हिंदुओं को मायूस कर दिया है.

पारंपरिक तौर पर पंजाब के हिंदुओं ने कांग्रेस को वोट दिया. मगर एक बड़ा हिस्सा 1997 में अकाली-भाजपा गठजोड़ के साथ चला गया. हिंदुत्व के प्रतीक नरेंद्र मोदी केंद्र में मजबूती से स्थापित हैं और अमरिंदर कांग्रेस से रुखसत हो चुके हैं. ऐसे में कांग्रेस के पास पंजाबी हिंदुओं को देने के लिए कुछ नहीं है.
उधर भाजपा पंजाब के हिंदुओं में अपना आधार सितंबर 2020 से ही मजबूत करती आ रही है. जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने से गुरदासपुर, पठानकोट, होशियारपुर और अमृतसर के हिंदू कारोबारियों के लिए वहां मौके तलाशने के दरवाजे खुल गए. उसने 1957 में राज्य सरकार के बुलावे पर जम्मू-कश्मीर आए वाल्मीकियों को भी मूल निवास के प्रमाण दे दिए. इससे उन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण की पात्रता मिल गई.

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी से भी भाजपा के प्रति भावनाएं नरम पड़ी हैं. अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा राज्य के हिंदुओं के दिलों को भले ही छूता हो, पर पार्टी बहुत सावधानी से आगे बढ़ रही है. यह उत्तर प्रदेश की तरह नहीं है जहां पार्टी ने इस पर पूरा जोर लगा दिया है. पंजाब के हिंदू वोटरों को रिझाने के लिए यहां पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा, ड्रग माफिया पर कड़ी कार्रवाई और उग्रवाद के शिकार परिवारों को मुआवजा देने के मुद्दों को तूल दे रही है. अमरिंदर नई पार्टी बना ही रहे हैं. भाजपा को उम्मीद है कि पूर्व मुख्यमंत्री अपने साथ उदार सिख वोट भी लाएंगे, जिससे अकाली दल के साथ छोड़ देने से पैदा कमी की भरपाई में मदद मिलेगी.

उधर, अकाली दल को भाजपा से रिश्ते टूटने के बाद अपने हिंदू वोटों को बनाए रखने की फिक्र है. पार्टी ने 1995 के मोगा सम्मेलन में संविधान बदलकर अपने को महज सिखों की बजाए सारे पंजाबियों की पार्टी बनाया था. भाजपा से गठबंधन और पितृपुरुष प्रकाश सिंह बादल की उदार छवि से अकाली दल को हिंदुओं का समर्थन हासिल करने में मदद मिली. लेकिन वह समर्थन अब खतरे में है.

इसे बचाने के लिए सुखबीर, उनकी पत्नी हरसिमरत और युवा अकाली दल के अध्यक्ष बिक्रम सिंह मजीठिया पंजाब और हिमाचल के आसपास के इलाकों के मंदिरों की दौड़ लगाते रहे हैं. सुखवीर माथे पर तिलक धारण किए, कलाई पर कलावा बांधे और देवी को लाल चुनरी की भेंट चढ़ाते देखे गए हैं. हालांकि पारंपरिक सिखों ने उनके इस अवतार की आलोचना की, पर सुखबीर मानते हैं कि इतना जोखिम उठाने में कोई हर्ज नहीं है. इसीलिए जब वे पंथिक एजेंडे पर लौटते भी हैं, तब भी हिंदुओं को खुश रखने के लिए उदारता की राह नहीं छोड़ते. असल में उन्होंने कहा भी है कि अगर अकाली दल सत्ता में आता है तो दो उपमुख्यमंत्री बनाएगा—एक दलित सिख समुदाय का और एक हिंदुओं में से.

मगर अकाली दल ने बीते 70 सालों में भाजपा के बगैर राज्य में एक भी चुनाव नहीं जीता. सुखबीर ताकत हासिल करने के लिए पहले भाजपा में रहे नेताओं को भी साथ लाने में जुटे हैं. इनमें अमृतसर उत्तर से पूर्व मंत्री अनिल जोशी, सुजानपुर से राज कुमार गुप्ता और खन्ना से आप के अनिल दत्त फल्ली तथा अन्य शामिल हैं. बठिंडा शहरी से सरूप चंद सिंगला, लुधियाना पश्चिम से हरीश राय ढांडा, डेरा बस्सी से एन.के. शर्मा प्रमुख हिंदू चेहरों के रूप में पहले ही पार्टी में आ चुके हैं. फिर भी हिंदू वोटरों को मनाने के लिए सुखबीर को कड़ी मेहनत करनी होगी क्योंकि गठबंधन में जब अकाली दल ग्रामीण सिख आबादी को खैरातें बांटता था, भाजपा संतुलन साधते हुए हिंदू हितों की हिफाजत करती थी.

दूसरी तरफ, कांग्रेस अमरिंदर की विदाई के नतीजों को लेकर परेशान है. पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल के दौरान न केवल खालिस्तानी तत्वों को आड़े हाथों लिया बल्कि पंजाब में हिंसा फैलाने के पाकिस्तानी मंसूबों के खिलाफ भी वे मुखर थे. उनके पार्टी छोड़ने, पार्टी आलाकमान के हाथों जाहिरा अपमान और सिद्धू की मनमानी तथा ज्यादतियों की वजह से उन्हें राज्य के सभी तबकों में सहानुभूति हासिल हुई है. सिद्धू के आक्रामक ढंग से पंथिक एजेंडे पर चलने से भी बात सध नहीं पा रही है. उन्होंने चन्नी पर दबाव बनाए रखा है और 2015 के बेअदबी विवाद में ''इंसाफ'' की मांग कर रहे हैं. कांग्रेस थिंक टैंक परेशान है कि अगर सिद्धू ने अपनी लफ्फाजी का सुर धीमा नहीं किया तो हिंदू पार्टी से और ज्यादा अलग हो जाएंगे.

कांग्रेस के हिंदू समर्थन आधार को दूसरा खतरा आप और इस बार अकेले चुनाव लड़ रही भाजपा से है. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के कारण सभी पार्टियों ने हिंदुओं को रिझाने के लिए मंदिरों की दौड़ लगानी शुरू कर दी. आप नेता अरविंद केजरीवाल ने खुद को हनुमान भक्त घोषित किया, 2017 के विधानसभा चुनाव में आप ने हिंदू वोटों का 20 फीसद हिस्सा हासिल किया था. दो साल बाद 2019 के आम चुनाव में इसमें से आधे वोट कांग्रेस या भाजपा की झोली में चले गए.

पिछले 25 सालों से सवर्ण वोट आधार पर निर्भर भाजपा शहरी दलितों (ज्यादातर हिंदू) के बड़े हिस्से को साथ लाने में जुटी है. हालांकि अपनी नई कृषि नीतियों के खिलाफ किसानों के व्यापक विरोध के चलते पार्टी उम्मीद करेगी कि हिंदू, जट सिखों के खिलाफ एकजुट हो जाएं. हिंदू मुख्यत: शहरों में बसे हैं. वैसे हिंदू वोटरों को चुप्पा माना जाता है. कोई नहीं कह सकता, वे किस तरफ जाएंगे.

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