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पंजाबः संघ पर निशाना

एसजीपीसी का प्रस्ताव स्पष्ट संदेश देता है कि एसएडी के रास्ते भाजपा से जुदा हैं और वह उसके साथ कोई राजनीतिक भविष्य नहीं देखता

आक्रामक रुख एसजीपीसी प्रमुख बीबी जागीर कौर आक्रामक रुख एसजीपीसी प्रमुख बीबी जागीर कौर

अब सुखबीर बादल की अगुआई वाला शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) अपने पुराने वोटरों का भरोसा वापस हासिल करने के लिए जूझ रहा है—वह पंजाब का ग्रामीण किसान और धार्मिक सिख समुदाय है, जिनको पंथी वोटर भी कहा जाता है. एसएडी पिछले सितंबर में कृषि कानूनों को लेकर एनडीए छोड़ने के बाद से यह कोशिश कर रहा है और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने अब इस आग में थोड़ा और घी डाल दिया है. 31 मार्च को इसने भाजपा के वैचारिक संरक्षक आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) पर 'भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश करने' का आरोप लगाते हुए निंदा प्रस्ताव पारित किया. 3 अप्रैल को इसने निहंग सिखों, संत समाज तथा कार सेवा संगठनों और पारंपरिक सिख निकायों की एक बैठक भी अमृतसर में बुलाई, ताकि प्रस्ताव पर उनकी भी मुहर लग सके.

आलोचकों का कहना है कि यह पूरी तरह से एक सियासी दांव है. लेखक और टिप्पणीकार जगतार संधू जोर देते हैं, ''ऐसे प्रस्ताव लाने की कोई फौरी वजह नहीं थी.'' राजनीति निश्चित तौर पर एक वजह तो है—पिछले साल सितंबर के बाद से जब एसएडी ने भाजपा से गठजोड़ तोड़ लिया, एसएडी कृषि कानूनों को दिए अपने शुरुआती समर्थन से हुए नुक्सान को पाटने की कोशिश कर रहा है.

अगले साल फरवरी में विधानसभा चुनाव से पहले सूबे में दो बड़ी चुनावी परीक्षाएं हैं—25 अप्रैल को दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (डीएसजीएमसी) और सितंबर में एसजीपीसी चुनाव होने हैं. सुखबीर को अकाली दल के नेताओं के जटिल सियासी गठजोड़ों से भी निबटना होगा. मिसाल के तौर पर, डीएसजीएमसी में ऐसे सदस्य हैं जिनके भाजपा के साथ गठजोड़ हैं—यहां तक कि डीएसजीएमसी के मुखिया एम.एस. सिरसा को पूर्व भाजपा विधायक के तौर पर दिल्ली विधानसभा से पेंशन भी मिलती है. आरएसएस के नेता एसजीपीसी पर अपनी नाकामी को ढंकने की कोशिश करार देते हैं.

वे ध्यान दिलाते हैं कि फरवरी और मार्च में, आरएसएस ने पंजाब के 6,600 गांवों में अयोध्या में बनने वाले राम मंदिर के लिए चंदा जुटाने का अभियान चलाया था. आरएसएस के पंजाब प्रांत सह संघचालक रजनीश अरोड़ा कहते हैं, ''हमें कहीं भी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा, वह भी तब जब किसानों का आंदोलन शिखर पर था. कुछ लोग जानबूझकर लोगों के दिमाग में जहर भर रहे हैं.'' आरएसएस के सिख संगठन राष्ट्रीय सिख संगत के अध्यक्ष गुरचरन सिंह गिल कहते हैं, ''विचारधारा या दर्शन को लेकर कोई अंतर नहीं है. यह प्रस्ताव महज सियासी कारणों से पारित किया गया.''

अकाल तख्त के पूर्व जत्थेदार रंजीत सिंह कहते हैं, ''एसएडी 23 साल तक भाजपा के साथ गठजोड़ में रही और इसकी आरएसएस के साथ मित्रता रही, और अब उन्हें उसमें शैतान दिखने लगा है. अगर आरएसएस देश को हिंदू राष्ट्र में बदलना चाह रहा है तो करने दीजिए. एसजीपीसी को ब्योरा देना चाहिए कि आरएसएस ने सिखों को किस तरह से नुक्सान पहुंचाया है. ऐसे प्रस्ताव (बादल परिवार के सियासी फायदे के लिए) एसजीपीसी जैसे संस्थान की प्रतिष्ठा धूमिल कर देंगे.'' पूर्व राज्यसभा सांसद तरलोचन सिंह कहते हैं, ''एसजीपीसी को यह मानने की जरूरत है कि न तो आरएसएस और न ही इसके आनुषंगिक संगठन सिखों का धर्मांतरण करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि ऐसे ईसाई संगठन दलित सिखों को ईसाई बना रहे हैं.''

हालांकि, सुखबीर बादल ने एसजीपीसी के प्रस्ताव पर सीधी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. बहरहाल, उनकी स्थिति को यह तथ्य स्पष्ट कर देता है कि 5 अप्रैल को उन्होंने राज्य के कपूरथला जिले के भोलाठ में एसजीपीसी चीफ बीबी जागीर कौर के लिए एक रैली की, जो एसएडी की महिला विंग स्त्री अकाली दल की मुखिया भी हैं.

पंजाब भाजपा के महासचिव सुभाष शर्मा आरोप लगाते हैं, ''पहले तो किसान आंदोलन को भड़काने के लिए उन्होंने गुरुद्वारों के पैसे का दुरुपयोग किया और अब इस संस्था का दुरुपयोग सियासी फायदे के लिए कर रहे हैं.''

एसएडी के एक अंदरूनी सूत्र का कहना है, ''एसजीपीसी का प्रस्ताव साफ तौर पर यह संदेश दे रहा है कि एसएडी ने भाजपा के साथ रास्ते अलग कर लिए हैं और वह इसके साथ आगे कोई राजनैतिक भविष्य नहीं देख रहा.'' बहरहाल, यह देखना है कि एसएडी को क्या पंथिक वोटरों का भरोसा दोबारा हासिल होगा या नहीं.

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