scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

नौकरशाहीः अब लंबा कार्यकाल

कई सिविल सेवकों का मानना है कि इससे नौकरशाही में उत्तराधिकार की शृंखला प्रभावित होगी, इसलिए वे नाराज हैं

नौकरशाही का विस्तार नौकरशाही का विस्तार

नवंबर की 14 तारीख को, संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने से दो हफ्ते पहले, केंद्र सरकार ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) के निदेशकों के कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाने के लिए एक अध्यादेश पारित किया. दोनों पदों का दो साल का निश्चित कार्यकाल था, भले ही उनकी सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष हो.

इसे लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने दिल्ली पुलिस विशेष प्रतिष्ठान (डीपीएसई) अधिनियम और केंद्रीय सतर्कता अधिनियम (सीवीसी) में संशोधन करने के अलावा, 2005 में पेश किए गए केंद्रीय सिविल सेवा के मौलिक नियमों में भी संशोधन किया है. यह केंद्र सरकार को रक्षा सचिव, गृह सचिव, इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) के निदेशक और रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ) के सचिव के कार्यकाल को दो साल तक के लिए बढ़ाने की शक्ति देता है. इन अधिकारियों का भी अधिकतम कार्यकाल दो साल का होता है.

विपक्षी नेताओं ने सरकार के इस कदम के समय को लेकर हंगामा किया है. राजद (राष्ट्रीय जनता दल) के राज्यसभा नेता मनोज झा कहते हैं, ''संसद बुलाने से ठीक पहले सीबीआइ और ईडी प्रमुखों का कार्यकाल बढ़ाने का अध्यादेश केंद्र की मंशा पर संदेह पैदा करता है.'' 17 नवंबर को, तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए अध्यादेश को सीबीआइ और ईडी प्रमुखों के कार्यकाल पर शीर्ष अदालत के पिछले फैसलों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी. उसी दिन, सरकार ने ईडी के निदेशक संजय कुमार मिश्र का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया. वह 18 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले थे.

अब लंबा कार्यकाल
अब लंबा कार्यकाल

हालांकि, सरकारी सूत्रों का कहना है कि हाइ-प्रोफाइल जांच में निरंतरता बनाए रखने के लिए इस तरह के विस्तार की जरूरत होती है, वहीं, कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला का दावा है कि तीन साल के सेवा विस्तार का मकसद कुछ नौकरशाहों को 2024 की लोकसभा तक अपने विभागों के प्रमुख के रूप में बनाए रखना है, ताकि विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच का प्रबंधन लचीले अफसरों के जरिए किया जा सके. वे कहते हैं, ''ईडी भाजपा का इलेक्शन डिपार्टमेंट बन गया है और सीबीआइ अब 'कॉम्प्रमाइज्ड ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन' है.''

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव (यूपी में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने हैं) के अलावा हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा, पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ईडी जांच का सामना करने वाले विपक्षी नेताओं में शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ ईडी/सीबीआइ मामलों की जांच में अत्यधिक देरी पर चिंता व्यक्त की थी. मौजूदा या पूर्व 51 सांसदों और 112 विधायकों के खिलाफ सीबीआइ के 121 मामले हैं. कथित अपराध कई साल पहले के होने के बावजूद 45 मामलों में आरोप तय नहीं किए गए हैं. ईडी 51 मौजूदा/पूर्व सांसदों और 71 मौजूदा/पूर्व विधायकों या एमएलसी के खिलाफ 122 मामलों की जांच कर रहा है.

विपक्षी दल नरेंद्र मोदी सरकार पर हर विभाग में अपने पसंदीदा अधिकारियों को सेवा विस्तार देने का भी आरोप लगाते हैं. मई में, केंद्र ने आइबी प्रमुख अरविंद कुमार और रॉ सचिव सामंत कुमार गोयल के कार्यकाल को एक साल के लिए बढ़ा दिया. अगस्त में, केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को एक साल का विस्तार दिया गया था. कैबिनेट सचिव राजीव गौबा को भी एक साल का विस्तार मिला, जो 30 अगस्त को सेवानिवृत्त होने वाले थे.

पी.के. सिन्हा, जिन्हें 2015 में कैबिनेट सचिव नियुक्त किया गया था, को 2019 तक उस कार्यालय में बने रहने के लिए तीन सेवा विस्तार मिले—वह अब तक के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले कैबिनेट सचिव हैं. मोदी के नेतृत्व में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले नौकरशाह के. कैलाशनाथन रहे हैं, तब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. 2013 में सेवानिवृत्त होने के बाद, कैलाशनाथन को भूपेंद्रभाई पटेल सहित गुजरात के तीन मुख्यमंत्रियों के मुख्य प्रधान सचिव के रूप में जारी रखने के लिए सात सेवा विस्तार मिले हैं.

विस्तार की संस्कृति भारतीय राज्यों के लिए नई बात नहीं है. दिसंबर 2020 में, दो सेवा विस्तार के बाद आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिव के रूप में सेवानिवृत्त हुई नीलम साहनी को तुरंत मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी का प्रमुख सलाहकार नियुक्त किया गया. उसी महीने, ओडिशा के मुख्य सचिव असित कुमार त्रिपाठी, अपनी सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद, मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के प्रमुख सलाहकार बने. इसी साल मई में, ममता बनर्जी ने मुख्य सचिव अल्पन बंद्योपाध्याय को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त किया. महाराष्ट्र में, मुख्य सचिव के रूप में दो विस्तार के बाद, अजय मेहता को जून में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का प्रमुख सलाहकार नियुक्त किया गया था.

एक ओर जहां सीबीआइ और ईडी प्रमुखों का कार्यकाल लंबा करने की मांग की जाती रही है, वहीं पूर्व नौकरशाहों का कहना है कि मनमाने ढंग से विस्तार करना इसका कोई तरीका नहीं है. ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट के पूर्व महानिदेशक एन.आर. वासन का मानना है कि लंबे कार्यकाल में नियुक्ति के लिए एक मजबूत तंत्र होना चाहिए. सीबीआइ और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) में भी काम कर चुके वासन कहते हैं, ''यह निर्णय तीन व्यक्तियों के बीच आधे घंटे की बैठक में नहीं लिए जाने चाहिए, जैसा कि अब होता है. पूर्व में कदाचार की घटनाओं को देखते हुए ऐसे अधिकारियों को हटाने के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था भी होनी चाहिए.''

वासन अपने कई सहयोगियों से सहमत हैं कि सभी दलों की सरकारों ने पसंदीदा अफसरों को बनाए रखने के लिए सेवा विस्तार का इस्तेमाल किया है. यूपीए शासन के दौरान मनमोहन सिंह ने टी.के.ए. नायर को तीन साल के लिए प्रमुख सचिव के रूप में नियुक्त किया था. वह चार सेवा विस्तार से सात साल तक पद पर बने रहे, और फिर उन्हें पीएमओ का सलाहकार बनाया गया.

पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जी.के. पिल्लै अधिकारियों के लंबे कार्यकाल के खिलाफ नहीं हैं, बशर्ते इसकी निश्चित शर्तें हों और वार्षिक विस्तार के रूप में नहीं सौंपे गए हों. पिल्लै कहते हैं, ''संदेश स्पष्ट है—आप लंबे समय तक पद पर बने रह सकते हैं और सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों की अपेक्षा कर सकते हैं यदि आप (अपने) राजनैतिक आकाओं को खुश करते हैं. इसने 1997 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले (जिसने सीबीआइ निदेशक के लिए न्यूनतम दो साल का कार्यकाल निर्धारित किया) की अहमियत को कम कर दिया है.'' वह कहते हैं, ''हाल ही में, हमने देखा कि कैसे केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के प्रमुख को तीन सेवा विस्तार दिए गए और सेवानिवृत्ति के बाद, वह राज्यसभा के महासचिव बनाए गए.''

इन विस्तारों की नैतिकता या प्रासंगिकता पर विवाद के अलावा, केंद्रीय सिविल सेवाओं के मौलिक नियमों में बदलाव से सेवारत सिविल सेवकों में बहुत नाराजगी है, जो मानते हैं कि नौकरशाही में उत्तराधिकार की शृंखला के प्रभावित होने का अंदेशा है. ज्यादातर नौकरशाहों को इस बात का डर है कि इससे कॉडर का मनोबल गिर सकता है. संसद के आगामी सत्र में इस मुद्दे पर विपक्ष के हमले की तैयारी कर रही मोदी सरकार के लिए शायद इससे निपटना एक बड़ी चुनौती है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें