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शेरों से मुलाकात

सासन गिर के बाहर स्थित आरामनेस रिजॉर्ट... लग्जरी से लेकर जंगल के मजे तक, यहां हर चीज इफरात है

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गिर का राजा, एशियाई शेर गिर का राजा, एशियाई शेर

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कई बार सफारी राइड पर जा चुके हैं, हर सफर शुरू होने के पहले दिल धड़कने लगता है. इसकी रिवायतें—सूर्योदय से पहले उठिए, झटपट तैयार हो जाइए, खुली जीप पर आराम से बैठ जाइए और पार्क के गेट से ड्राइव करते हुए निकल जाइए—आने वाले जादू के लिए आपको दिमागी तौर पर तैयार कर देती हैं. हमें किस तरह के नजारे देखने को मिलेंगे? क्या शेर को आमने-सामने देखने का सबसे बड़ा सपना पूरा होगा? आप खुद को ज्यादा उम्मीदें न पालने के लिए समझा सकते हैं, बस जंग का मजा लेकर लौट आने के लिए सोच सकते हैं, लेकिन मजा तो है ही: हम में से ज्यादातर लोग जंगल के राजा, करिश्माई विशाल जीव से मिलने की उम्मीद करते हैं.

और आप सबसे ज्यादा खतरे में पड़े इन शानदार जीवों को दुनिया में सिर्फ एक जगह देख सकते हैं और जगह है गिर नेशनल पार्क. ये एशियाई शेर कभी ईरान से लेकर भारत तक के जंगलों में विचरण करते थे, 19वीं सदी तक हरियाणा और बिहार में मिल जाते थे, अब सिर्फ गुजरात के दक्षिण सौराष्ट्र के जंगलों में ही जिंदा हैं. कभी जूनागढ़ के नवाब की शिकारगाह रहे इस संरक्षित क्षेत्र में करीब 500 शेर हैं. उस जानवर की इतनी ही तादाद बची है जिसके अक्स भीमबेटका की चट्टानों की पेंटिंग, निनेवे की दीवारों और सारनाथ में अशोक के स्तंभ पर नजर आते हैं.

शेरों के साथ हमारी मुलाकात के लिए हमें आदिल आरिफ ले जा रहे हैं, जो सासन गिर के बाहर हाल में खुले आरामनेस के प्रकृतवादी हैं. जैसे ही हमारी जीप सड़क से होते हुए पार्क में प्रवेश करती है, हमें जंगली करौंदे के छोटे सफेद फूलों की खुशबू आती है. रास्ते के दोनों तरफ ये फूल सितारों की तरह बिखरे हैं. आरिफ बताते हैं कि शेर इन्हीं पौधों की घनी झाड़ियों के नीचे आराम करना पसंद करते हैं.

गर्मी के दिनों में जब सारा जंगल सूख जाता है तब सिर्फ यही पौधे हरे-भरे रहते हैं. हम करौंदे की हर झाड़ी को गौर से निहारते हैं और आरिफ हमें देखकर मुस्कराते हैं. वे कहते हैं, ''आजकल शेर को देखने के आसान तरीके हैं. बस उन जीपों को देखिए, जो खड़ी हो गई हैं. या किसी ट्रैकर से पूछिए.'' उनकी बात सही है, दो वर्दीधारी मूंछ वाले लोग हमें सड़क के किनारे एक खाली जगह की ओर जाने का इशारा करते हैं. वहां, खुले में बैठी एक शेरनी साफ नजर आती है! पांच शावक उसके इर्दगिर्द उछल-कूद करते हुए उत्सुकता से देख रहे हैं और हम ऊह..आह... करते हुए सुरक्षित दूरी से तस्वीरें खींच रहे हैं.

छोटे-छोटे कान और नन्हे पंजों वाले शावकों की मोह लेने वाली खूबसूरती को देखकर हम अपने रास्ते में पड़ने वाले सड़े मांस की बदबू को भूल जाते हैं. पास में ही एक गाय का कंकाल पड़ा है, जिसका मांस इस शेरनी और शावकों के पेट में धीरे-धीरे पच रहा है. हालांकि गिर में एक खुर वाले कई जीव हैं—हमने वेलवेट सींग वाले चीतलों के झुंड के साथ ही एक नीलगाय और सांभर को भी देखा—लेकिन मालधारी समुदायों के पाले गए जानवर ही इन शेरों के मुख्य भोजन हैं. आरामनेस के कर्मचारी चाहते हैं कि उनके मेहमान उनकी सहजीविता को देखें और उसकी तारीफ करें.

आरिफ और उनके साथी प्रकृतिवादी नमन दोशी हमें जंगल के किनारे बापू मियां के परिवार के इलाके में ले जाते हैं. विशाल कंपाउंड में कंटीली झाड़ियों की बाड़ लगी हुई है. एक कोने में छांह में भैंस के दो बच्चे और गिर गाय के दो बच्चे रस्सी से बंधे हुए हैं. बापू मियां जब यह बताते हैं कि उनकी देसी नस्लें कितने शानदार तरीके से इस इलाके में ढल गई हैं, तब दोशी उनकी बातों का गुजराती से अनुवाद करते चलते हैं. वे जंगल में जिन घासों और झाडिय़ों को चरती हैं, उनसे उनका दूध बेहद पोषक बन जाता है. हम पूछते हैं, ''लेकिन जब शेर आपकी गायों को मार देते हैं तो आप परेशान नहीं होते?'' गले तक शेर जैसे बाल वाले बापू मियां जिंदादिली के साथ फलसफाना अंदाज में कंधा उचकाते हुए कहते हैं, ''शेरों को भी खाना चाहिए.''

गिर में शेर देखना बहुत आसान है. बाघों के विपरीत वे इनसानों से कतराते नहीं हैं. लेकिन शेर को ऐसे परितंत्र के हिस्से के रूप में देखना जिसमें न केवल दूसरे जानवर हैं बल्कि पशुपालक मालधारी भी हैं, बहुत चुनौतीपूर्ण और पेचीदा है. इसी मामले में आरामनेस को बढ़त हासिल है. इसके लाजवाब प्रकृतिवादी इलाके को समझाने में माहिर हैं. बेर के पेड़ों के नीच मकड़ियों के जाले क्यों होते हैं? आप गिर और दूसरी नस्ल की गायों में फर्क कैसे करते हैं? आरिफ और दोशी ने जंगल और उसके लोगों को बेहतरीन ढंग से जीवंत बना दिया.

जंगल से घिरा आरामनेस खुद को सफारी लॉज बताता है लेकिन यह अल्ट्रा-लग्जुरियस रिजॉर्ट का एहसास कराता है, जिसमें पर्सनल पूल, निजी खानसामे, शाही कमरे और शानदार साज-सज्जा है. सुबह-सुबह की फ्लाइट और राजकोट से तीन घंटे की ड्राइव के बाद विशाल हवेली जैसे दरवाजे की सीढ़ियों पर ठंडे गीले टॉवेल से अपने मुंह साफ करना बेहद आनंददायक है. उसके भीतर 18 खूबसूरत बंगले हैं, जिनके फर्श सूरज की रोशनी और साए में दमकते रहते हैं. मार्बल बाथटब लगभग इतना बड़ा है कि उसमें मालधारी की भैंस समा जाए, और मैं सुगंधित पानी में आनंद के साथ आह करते हुए उतरती हूं. हाउसकीपिंग बहुत तेजतर्रार है, कुछ ज्यादा ही झटपट काम करते हैं: जब भी मैं किसी टॉवेल से हाथ साफ करती हूं, कुछ ही मिनटों में उसे उठा लिया जाता है और उसकी जगह दूसरा रख दिया जाता है.

बाद में मुझे भूख लगती है और मैं भव्य रिसेप्शन और डाइनिंग हॉल की ओर जाती हूं, उसके बाहरी हिस्से में बलुई पत्थर के स्क्रीन लगे हैं, जो जंगल में बिखरी टीक की पत्तियों की तरह लगते हैं. मुख्य भोजन से पहले ऐंटीपास्टी और सैलड ताजे और लजीज हैं. डेसर्ट और कॉफी बिल्कुल मनमाफिक हैं. मैं और अधिक स्थानीय व्यंजनों—काठियावाड़ी व्यंजन या परिष्कृत स्वामीनारायण थाली—चखना पसंद करती लेकिन जो कुछ वहां मिलता है, वह भी बहुत अच्छा है. उस शेरनी की मानिंद मैं भी खाने-पीने के बाद मस्ती से आराम फरमाती हूं.

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