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मध्य प्रदेशः तीन साल और सरकार

पार्टी गांवों में जमीनी स्तर पर खुद को फिर से खड़ा करने पर ध्यान जरूर देना चाहेगी, जहां उसका कभी परचम लहराया करता था. अगर यह होता है, तभी आगे कांग्रेस के लिए कुछ गुंजाइश बन सकती है

उम्मीद से ज्यादा मीठा जीत का जश्न मनाते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (बीच में) और प्रदेश अध्यक्ष वी.डी. शर्मा (दाएं) उम्मीद से ज्यादा मीठा जीत का जश्न मनाते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (बीच में) और प्रदेश अध्यक्ष वी.डी. शर्मा (दाएं)

मध्य प्रदेश के 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जोरदार जीत ने राज्य में अगले तीन साल तक भगवा पार्टी के राज को निष्कंटक कर दिया है. पार्टी ने 28 सीटों पर हुए चुनावों में 19 पर जीत दर्ज की, जिसने आधिकारिक या अनाधिकारिक हर सर्वे को झुठला दिया. यहां तक कि यह भाजपा की खुद की उम्मीदों से परे है. दूसरी तरफ, कांग्रेस सर्वे के आंकड़ों के उलट बुरी गत में पहुंची. इससे जीत हासिल करके सत्ता में वापसी की पार्टी की उम्मीद धरी रह गई. कांग्रेस महज 9 सीटें ही जीत पाई. ये उपचुनाव कांग्रेस के 25 विधायकों के दलबदल कर इस साल मार्च में भाजपा में शामिल होने से हुए थे.

क्षेत्रवार देखा जाए तो ये उपचुनाव मोटे तौर पर ग्वालियर-चंबल इलाके और बाकी अन्य जगहों पर हुए. ग्वालियर-चंबल में 16 सीटें थीं जिसमें भाजपा ने 9 सीटें झटक लीं. इस इलाके के बाहर तो पार्टी का प्रदर्शन शानदार रहा. उनमें 12 में से 10 भाजपा की झोली में गईं. कांग्रेस ने कुछेक इलाकों में ही बेहतर प्रदर्शन किया—मुरैना और भिंड जिलों की 7 में से उसने 4 सीटें जीतीं, ग्वालियर की 3 में से 2 और शिवपुरी में 2 में से एक सीट पार्टी ने हासिल की. पार्टी का चुनावी नारा—पार्टी छोड़कर गए विधायकों के खिलाफ गद्दारी का आरोप—बाकी इलाकों में कुछ खास असर नहीं छोड़ पाया.

शिवराज सिंह सरकार में मंत्री पद पर 14 पूर्व कांग्रेस विधायकों में से सिर्फ तीन—अदल सिंह कंसाना, इमरती देवी और गिरिराज दंडोतिया—ही चुनाव हारे. भाजपा की ताकत ग्वालियर-चंबल संभाग में भी दिखी. पार्टी ने अशोक नगर, बमोरी और मुंगौली सीटें जीत लीं, जो भोपाल से नजदीक हैं. ग्वालियर-चंबल संभाग के बाहर गद्दारी के नारे का जोर नहीं दिखा. जो दो सीटें कांग्रेस जीती, वे कांग्रेस विधायकों के निधन से खाली हुई थीं.

कई का कहना है कि कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के पीछे गलत चुनावी नारे का चयन रहा. लेकिन नतीजे यह भी दिखाते हैं कि भाजपा को सत्ता में काबिज होने और सांगठनिक ताकत का फायदा मिला. हालांकि, कांग्रेस ने चुनाव प्रचार चुस्त था, लेकिन जमीनी कार्यकर्ताओं की कमी कांग्रेस को झेलनी पड़ी. दूसरी बात, गद्दारी वाला दावा इस बात से भी कमजोर पड़ गया कि खुद कांग्रेस ने भाजपा के आधा दर्जन बागियों (जिनमें से एक, सतीश सिकरवार जीते भी) को टिकट दिया था. फिर कांग्रेस यह भी उम्मीद कर रही थी कि भाजपा के असंतुष्ट पार्टी का खेल बिगाड़ेंगे लेकिन सांची, हाटपिपल्या, बडनावर और ग्वालियर के नतीजे ऐसा संकेत नहीं देते.

इन चुनावी नतीजों का भाजपा में, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नए नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को सबसे अधिक फायदा होगा. चौहान के सियासी करियर को मार्च में दूसरा जीवनदान मिला था, जब भाजपा ने उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री बनाया था, जबकि इस पद के लिए कई और मजबूत दावेदार मौजूद थे. कुछ लोगों का कहना है कि इसकी मुख्य वजह यह थी कि भाजपा उपचुनावों पर निगाह बनाए हुए थी और उसे यह लग गया था कि चुनाव जीतने के लिए ऐसे दिग्गज नेता की जरूरत होगी जिसका प्रभाव पूरे मध्य प्रदेश में हो. इस मामले में, चौहान ने खुद को साबित कर दिया है.

उन्होंने राज्य में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली है और केंद्र के साथ अपने रिश्ते सुधार लिए हैं. इस जीत में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी हिस्सा बंटा रहे हैं, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि अंबा और जौरा सीट जीतने में उनकी केंद्रीय भूमिका रही है. दोनों ही सीटें मुरैना जिले में पड़ती हैं जो तोमर का लोकसभा क्षेत्र है. यह उपचुनाव नवनियुक्त भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वी.डी. शर्मा के लिए भी पहली परीक्षा सरीखा था, क्योंकि वे भी उसी जिले से हैं.

अब चौहान को उन वादों को पूरा करना होगा, जो उन्होंने चुनाव के दौरान किए हैं. कांग्रेस के गद्दारी के आरोपों के जवाब में भगवा पार्टी ने कहा कि कांग्रेस ने ही विकास के मोर्चे पर कमतर प्रदर्शन करके राज्य के मतदाताओं के साथ गद्दारी की है. भाजपा ने लाखों करोड़ रुपयों वाली लागत की नई परियोजनाओं का ऐलान भी किया. हालांकि, इन योजनाओं को जमीन पर उतारना वाकई टेढ़ी खीर साबित होगी क्योंकि दूसरे राज्यों की ही तरह मध्य प्रदेश भी महामारी से पैदा हुई वित्तीय दिक्कतों से दो-चार है और राजस्व वसूली भी जमीन चाट रही है.

लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के मामले में चुनावी पंडितों का कहना है कि इन नतीजों से उन्हें नई पार्टी में दरपेश शुरुआती समन्वय की मुश्किलों से पार पाने में मदद मिलेगी. हालांकि, भाजपा ने ग्वालियर-चंबल संभाग में सीटें खोई भी हैं लेकिन राज्य के दूसरे हिस्सों से सिंधिया के चार वफादार—तुलसी सिलावट, प्रभुराम चौधरी, गोविंद सिंह राजपूत और राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव—बड़े अंतर से चुनाव जीत गए हैं. सब मान रहे हैं कि सिंधिया केंद्र में मंत्री बनाए जाएंगे. लेकिन यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अब उनकी सियासत कौन सी करवट लेती है क्योंकि अब वे अपनी नई पार्टी में मजबूती से स्थापित हो चुके हैं.

कांग्रेस में कमलनाथ को कुछ कड़े कदम उठाने होंगे, जो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विपक्ष के नेता दोनों पदों पर हैं. हालांकि, कांग्रेस का संख्याबल विधानसभा में मजबूत विपक्ष की भूमिका के लिहाज से अब भी पर्याप्त है लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि पार्टी की प्रदेश इकाई में पीढ़ीगत नेतृत्व परिवर्तन की मांग सिर उठा सकती है.

पार्टी गांवों में जमीनी स्तर पर खुद को फिर से खड़ा करने पर ध्यान जरूर देना चाहेगी, जहां उसका कभी परचम लहराया करता था. अगर यह होता है, तभी आगे कांग्रेस के लिए कुछ गुंजाइश बन सकती है. भाजपा के फूल में से कुछ पंखुड़ियां चुराने के बजाए कांग्रेस को अपना हाथ मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए.

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