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मध्य प्रदेश उपचुनावः इस खेल में कुछ भी संभव है

अपने दम पर साधारण बहुमत हासिल करने के लिए भाजपा को नौ सीटों की जरूरत है जबकि कांग्रेस को सभी 28 चाहिए

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आत्मविश्वास का प्रदर्शन भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मुरैना में आत्मविश्वास का प्रदर्शन भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मुरैना में

पंद्रह साल के अंतराल पर सत्ता में कांग्रेस की वापसी कराने वाले विधानसभा चुनावों के बाद दो साल से भी कम समय में 3 नवंबर को मध्य प्रदेश में 28 विधानसभा क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण उपचुनाव हैं जिनके नतीजे शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली मौजूदा भाजपा सरकार का भाग्य तय करेंगे. दांव पर बहुत कुछ लगा होने के मद्देनजर इस संघर्ष में भाजपा और कांग्रेस के बड़े नेताओं के पूरे राज्य में हेलिकॉप्टर दौरे, बड़ी-बड़ी रैलियां और महामारी के बावजूद रोड-शो आदि वे सभी घटक मौजूद हैं जो पूर्ण विधानसभा चुनावों में होते हैं. यहां तक कि आम तौर पर उपचुनावों में भाग न लेने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने भी इसमें अपने प्रत्याशी उतार दिए हैं.


दोनों प्रमुख दलों को अच्छी तरह से मालूम है कि ये परिणाम कम से कम अगले तीन वर्षों के लिए उनका भाग्य बनाएंगे या बिगाड़ेंगे. इस स्थिति में भाजपा के लिए सत्ता पर पकड़ बनाए रखना थोड़ा आसान दिख रहा है. राज्य की 230 सदस्यीय विधानसभा में 107 विधायकों वाली इस पार्टी को अपने दम पर साधारण बहुमत के लिए केवल नौ और सीटों की जरूरत है. ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके निष्ठावान विधायकों के दलबदल से मार्च में सत्ता गंवाने वाली कांग्रेस को अपने दम पर साधारण बहुमत हासिल करने के लिए सभी 28 सीटें जीतनी होंगी. विधानसभा में पार्टी के फिलहाल 88 विधायक हैं.


विरासत में मिले टंगड़ी मारने वाले मुद्दों जैसे कि कमजोर संगठनात्मक ढांचा, गुटबाजी और कम जमीनी प्रचारकों के होते हुए भी कांग्रेस उत्साह के साथ लड़ रही है. अटकलें हैं कि भाजपा को विधानसभा में साधारण बहुमत से रोकने के लिए भाजपा विधायकों से इस्तीफा दिलवाने का 'प्लान बी'  भी है. पार्टी अगर उपचुनावों में लगभग 20 सीटें जीत लेती है तो सत्ता में वापसी के लिए निश्चित रूप से इस हथियार का इस्तेमाल किया जाएगा.

कांग्रेस के नेताओं को यह भी भरोसा है कि विधानसभा में सात असंबद्ध विधायक—चार निर्दलीय, दो बसपा के और समाजवादी पार्टी (सपा) का एक विधायक—जरूरत पड़ने पर उनका समर्थन करेंगे. उन्होंने कमलनाथ सरकार बनवाने में मदद की थी, लेकिन मार्च में भाजपा के सत्ता संभालने पर अपनी निष्ठा बदल ली थी. कांग्रेस के एक रणनीतिकार का कहना है, ''उपचुनावों में सत्ताधारी पार्टी हमेशा लाभ की स्थिति में होती है. विपक्षी उम्मीदवारों के आत्मविश्वास का स्तर बहुत ऊंचा न होने पर मतदाता सत्तारूढ़ दल की ओर झुक जाते हैं. इसीलिए यह दिखाना बहुत महत्वपूर्ण है कि सरकार में शीघ्र ही बदलाव होने जा रहा है.''


चुनाव बाद की कुछ स्थितियां लगभग स्पष्ट हैं. पहला, अगर भाजपा 28 में से 15 या अधिक सीटें जीतती है तो वह 2023 के अंत में अगले विधानसभा चुनाव तक आराम से सरकार में बने रहने की उम्मीद कर सकती है. पार्टी को तब उन सात असंबद्ध विधायकों के समर्थन की जरूरत नहीं होगी, जिन्हें वह पिछले सात महीनों से सत्ता में रहते हुए खुश रखने की कोशिश करती आई है. दूसरा, भाजपा नौ से कम सीटें जीतती है लेकिन सबसे बड़ी पार्टी बनी रहती है. ऐसा होने पर सात असंबद्ध विधायकों के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश की जाएगी.


तीसरी संभावना यह है कि बसपा कुछ सीटें जीतकर किंगमेकर के रूप में उभरे. मायावती की पार्टी का ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में हमेशा कुछ असर रहा है, जहां 16 सीटों पर उपचुनाव होने हैं. मुरैना और भिंड जिलों में बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति (एससी) वोटों की मौजूदगी ही इस क्षेत्र में बसपा के पास कुछ ताकत होने की वजह रही है. हालांकि, बसपा केवल अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को ही नहीं बल्कि कांग्रेस और भाजपा में टिकट से वंचित रह गए बागियों को भी टिकट देती है. अधिकांश निर्वाचन क्षेत्रों में बसपा का वोट आधार स्थिर होने के कारण त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति में अनारक्षित सीटों पर भी उसके उम्मीदवारों को जीत मिल चुकी है.


भाजपा के प्रदर्शन का राज्य में उसके बड़े नेताओं पर क्या असर पड़ेगा? अगर पार्टी 15 से कम सीटें जीतती है और कमजोर बहुमत वाली सरकार बनाती है या असंबद्ध विधायकों का समर्थन लेती है तो पार्टी में चौहान के नेतृत्व और सिंधिया को महत्व दिए जाने पर सवाल उठाए जा सकते हैं. चौहान के मामले में राज्य भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की मांग लगातार होती रही है. जहां तक सिंधिया का मामला है तो पार्टी में नेताओं का एक समूह है जिनकी पूरी राजनीति ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में सिंधिया के विरोध पर आधारित रही है. यह समूह उन्हें निशाना बनाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देगा. लेकिन, अगर भाजपा अपेक्षा से कमजोर प्रदर्शन करके भी सत्ता में बनी रहती है तो इसका असर सिंधिया की तुलना में चौहान पर ज्यादा होगा. माना जाएगा कि सिंधिया ने तो कांग्रेस सरकार को गिरा कर अपना काम पहले ही कर दिया था.


उपचुनावों का प्रमुख विषय 'गद्दारी' है जो मुख्य रूप से मार्च के उस घटनाक्रम से उपजा है जब 22 कांग्रेस विधायकों ने कमलनाथ सरकार को गिराने के लिए पाला बदल लिया था. कांग्रेस इन 22 विधायकों के साथ-साथ बाद में दलबदल करने वाले तीन अन्य पर सत्ता के लालच में पार्टी की पीठ में छुरा घोंपने का आरोप लगाती है. उपचुनाव के प्रचार अभियान में लगातार इस ओर इशारा किया जाता रहा है कि भाजपा ने कांग्रेस के सभी 25 पूर्व विधायकों को टिकट दिया है.


दिलचस्प बात यह है कि जहां कांग्रेस ने भाजपा पर दलबदलुओं पर इनामों की बौछार करने का आरोप लगाया है वहीं पार्टी ने उपचुनाव की घोषणा से ठीक पहले भाजपा छोड़ कर पार्टी में शामिल हुए पांच उम्मीदवारों को भी टिकट दिया है. ये हैं प्रेम चंद गुड़ू, के.एल. अग्रवाल, पारुल साहू, अजब सिंह कुशवाहा और सतीश सिकरवार. कांग्रेस ने एक साध्वी—राम सिया भारती—को भी उमा भारती के प्रतिनिधित्व वाली सीट मलेहरा में उतारा है. लोधी समुदाय की राम सिया भारती क्षेत्र में लोकप्रिय 'कथा वाचक' हैं. इससे लगता है कि भगवा समर्थक लोग अब पूरी तरह से भाजपा के साथ नहीं हैं.

उपचुनावों के अन्य प्रमुख मुद्दों में कृषि ऋण माफी और कांग्रेस का यह दावा है कि कमलनाथ सरकार ने अपने 15 महीने के कार्यकाल में चौहान के नेतृत्व वाले भाजपा शासन के 15 साल की तुलना में अधिक काम किया है. लेकिन मुख्यमंत्री का बचाव करते हुए, भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रभात झा कहते हैं, ''शिवराज सिंह चौहान ने समाज के हर वर्ग को राहत प्रदान की है और पिछले सात महीनों में एक लाख करोड़ रुपए के विकास कार्यों की घोषणा की है.''


चौहान और सिंधिया भाजपा के चुनाव अभियान के प्रमुख चेहरे हैं जबकि कांग्रेस में काफी हद तक 'कमलनाथ शो' है, जिससे लगता है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को रणनीति के तहत अभियान से दूर रखा गया है. दूसरी ओर, झा का दावा है कि कांग्रेस के खेमे में सब ठीक नहीं है और यही वजह है कि दिग्विजय के अलावा अजय सिंह और गोविंद सिंह जैसे नेता अलग-थलग हैं.


उपचुनाव के जो भी नतीजे आएं, मध्य प्रदेश में सत्तारूढ़ रहने वाली पार्टी को ढेरों लोकलुभावन वादे पूरे करने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा जबकि राज्य गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा है. कोविड के प्रकोप से राजस्व संग्रह बहुत घट गया है और राज्य सरकार को भारी उधारी पर निर्भर रहना पड़ा है. 31 मार्च, 2020 तक राज्य पर कुल दो लाख करोड़ रुपये से अधिक का ऋण है जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है. यहां से आगे जो भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, कांटों का ताज उसका इंतजार कर रहा है.

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