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एफसीआरएः विदेशी पैसों का टोटा

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद पहले महीने में ही इंटेलिजेंस ब्यूरो ने कई विदेशी-वित्त पोषित संगठनों पर भारत के ''आर्थिक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित'' करने का आरोप लगाते हुए एक गोपनीय रिपोर्ट पेश की थी

एफसीआरए: विदेशी फंडिंग की प्राप्ति और उपयोग को निगरानी एफसीआरए: विदेशी फंडिंग की प्राप्ति और उपयोग को निगरानी

एक जनवरी, 2022 को जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 5,968 फर्मों के एफसीआरए (विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम) पंजीकरण को रद्द कर दिया तो कई लोगों ने नाराजगी जाहिर की. किसी संस्था को विदेशी फंडिंग हासिल करने और उनका उपयोग करने के लिए यह पंजीकरण अनिवार्य है. आलोचकों ने कहा कि इस कदम का मकसद उन एनजीओ (गैर-सरकारी संगठनों) को पंगु बनाना है जो भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की आलोचना करते रहे हैं या फिर अल्पसंख्यकों की ओर से चलाए जा रहे हैं. जिन संस्थाओं का पंजीकरण खत्म किया गया है उनमें नोबल विजेता मदर टेरेसा की ओर से स्थापित मिशनरीज ऑफ चैरिटी, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, इंडियन इस्लामिक सेंटर, ऑक्सफैम इंडिया ट्रस्ट और कॉमन कॉज शामिल हैं. इन्होंने हाल के समय में कई केंद्रीय कानूनों के खिलाफ कई जनहित याचिकाएं दाखिल की थीं.

एफसीआरएः विदेशी पैसों का टोटा
एफसीआरएः विदेशी पैसों का टोटा

हालांकि, एफसीआरए पंजीकरण खो चुके कुछ लोगों सहित स्वतंत्र पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह 2020 में एफसीआरए में हुए संशोधन का नतीजा है. उस संशोधन ने एफसीआरए पंजीकरण प्रक्रिया को बोझिल, अपारदर्शी और सरकार के विवेक पर निर्भर बना दिया है. आंध्र प्रदेश में शेयर ऐंड केयर फाउंडेशन ने सुप्रीम कोर्ट में एफसीआरए, 2020 की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. फाउंडेशन के नोएल हार्पर कहते हैं, ''नए नियमों से अब एनजीओ का काम करना बहुत मुश्किल हो गया है.

नए नियम उन लोगों के लिए भी दंडात्मक हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं.'' एफसीआरए की सूची में से हटाए गए 5,968 संस्थाओं में से 5,789 ने 31 दिसंबर की समयसीमा के भीतर नवीकरण के लिए आवेदन नहीं किया. (एफसीआरए पंजीकरण पांच साल के लिए वैध होता है और उसके बाद उसका नवीकरण किया जाना जरूरी होता है). असल में, 29 सितंबर, 2020 और 13 दिसंबर, 2021 के बीच 18,778 संगठन लाइसेंस के नवीकरण के योग्य थे—इनमें से केवल 12,989 ने नवीकरण के लिए आवेदन दाखिल किया. कुछ संस्थानों ने आवेदन नहीं किया, जिनमें दो आइआइटी (दिल्ली और कानपुर), नेहरू मेमोरियल म्यूजियम ऐंड लाइब्रेरी और इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स भी शामिल हैं.

बहरहाल, आलोचक इस बात पर ध्यान दिलाते हैं कि मिशनरीज ऑफ चैरिटी और ऑक्सफैम इंडिया ट्रस्ट सहित कुछ पंजीकरण रद्द कर दिए गए थे, और वे खत्म नहीं हुए थे. 25 दिसंबर, 2021 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 'प्रतिकूल इनपुट' का हवाला देते हुए मिशनरीज ऑफ चैरिटी के पंजीकरण का नवीनीकरण करने से इनकार कर दिया. पंजीकरण के लिए नया आवेदन तीन साल बाद ही किया जा सकता है. 12 दिसंबर को, वडोदरा पुलिस ने, एक जिला समाज कल्याण अधिकारी की शिकायत के आधार पर, कोलकाता स्थित इस एनजीओ के वडोदरा के एक आश्रय गृह के खिलाफ गुजरात धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत ''हिंदू धार्मिक भावनाओं को आहत करने'' और ''युवा लड़कियों को ईसाइयत की ओर आकर्षित करने'' के आरोप में मामला दर्ज किया था. अगस्त में, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की अध्यक्ष प्रियंका कानूनगो ने दावा किया कि वडोदरा के उस आश्रय गृह के दौरे में उन्हें धर्मांतरण के सुबूत मिले थे.

एफसीआरएः विदेशी पैसों का टोटा
एफसीआरएः विदेशी पैसों का टोटा

फरवरी 2020 में, एनसीपीसीआर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया था और इसमें झारखंड में मिशनरीज ऑप चैरिटी के शेल्टर होम की बाल तस्करी में कथित संलिप्तता की जांच की मांग की गई थी. बहरहाल, इन आरोपों को कानून के उल्लंघन श्रेणी में नहीं रखा जाता है और इस मामले में, कानून कहता है कि एफसीआरए पंजीकरण केवल उन लोगों के लिए अस्वीकार किया जा सकता है जिन पर जबरन धर्मांतरण के लिए मुकदमा चलाया गया है या उन्हें दोषी ठहराया गया है.

एफसीआरए को पहली बार 1976 में विदेशी फंडिंग की प्राप्ति और उपयोग को निगरानी के लिए लागू किया गया था. 2010 में, केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने इसे निरस्त कर दिया और एक नया कानून पारित किया. फिर, 2020 में, भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने विदेशी फंडिंग के उपयोग पर नियंत्रण सख्त करने के लिए इस अधिनियम में और संशोधन किए. मसलन, अब विदेशी फंडिंग के केवल 20 फीसद (पहले के 50 फीसद से कम) का उपयोग प्रशासनिक खर्चों के लिए किया जा सकता है. अगर सरकार, किसी जांच के आधार पर, यह मानती है कि कोई संगठन एफसीआरए के प्रावधानों का उल्लंघन कर रहा है, तो वह इसे विदेशी फंडिंग हासिल करने या उसका इस्तेमाल करने से रोक सकती है, भले ही वह संगठन दोषी नहीं पाया जाए. नए नियम एनजीओ पर विदेशी फंड की रकम को किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था को ट्रांसफर करने पर भी रोक लगाते हैं. आलोचकों का कहना है कि इस नियम से दूरदराज के इलाकों में काम करने वाले छोटे एनजीओ पर बुरा असर पड़ा है जिनकी विदेशी फंड तक पहुंच नहीं है, और इससे इनके बड़े एनजीओ से फंड मिलने पर रोक लग गई है.

तेलंगाना में नेशनल वर्कर्स वेलफेयर ट्रस्ट के जोसेफ लिजी और एनम्मा जाओचिम के साथ हार्पर ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि एफसीआरए में 2020 के संशोधन ने एनजीओ के कामकाम में विदेशी फंड के इस्तेमाल पर बुरी तरह से बंदिश लगा दी है. हार्पर कहते हैं, ''सरकार को नियमों को आसान बनाना चाहिए. वरना स्वाभाविक है कि लोग शक करेंगे कि इन नियमों के पीछे जरूर कोई और बात है.'' केंद्र ने कहा है कि विदेशी धन का उपयोग उनके बताए गए उद्देश्य के लिए किया जा रहा है, न कि देश को नुक्सान पहुंचाने वाले अन्य मकसदों के लिए, यह सुनिश्चित करने के लिए संशोधनों की जरूरत थी. मसलन, सरकार का दावा है कि विकास कार्यों के लिए मिले धन को अक्सर माओवादियों को प्रशिक्षिति करने में इस्तेमाल कर लिया जाता है.

इन संशोधनों के समर्थन में एनसीपीसीआर ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया है, जिसमें कुछ गैर-सरकारी संगठनों का जिक्र किया गया है, जहां फंड को कथित तौर कहीं और भेजा गया या या संदिग्ध स्रोतों से प्राप्त किया गया. अभी शीर्ष अदालत ने अपना फैसला नहीं सुनाया है. एफसीआरए पंजीकरण रद्द करने को लेकर कई कानूनी चुनौतियां हैं—2016 में, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह और उनके पति आनंद ग्रोवर की ओर से संचालित गैर-सरकारी संगठन लॉयर्स कलेक्टिव का पंजीकरण रद्द कर दिया गया था. सरकार ने दावा किया था कि संगठन ने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए विदेशी धन का इस्तेमाल किया. सरकार ने यह भी कहा कि जयसिंह ने विदेशी धन प्राप्त करके एफसीआरए मानदंडों का उल्लंघन किया था, क्योंकि एफसीआरए के तहत एक सरकारी अधिकारी ऐसा नहीं कर सकता.

2014 में सत्ता में आने के बाद से, कार्यकर्ताओं और गैर-सरकारी संगठनों की आवाज दबाने के लिए एफसीआरए का इस्तेमाल करने के आरोप में वैश्विक स्तर पर मोदी सरकार की आलोचना होती है. खासकर ग्रीनपीस और ऐमनेस्टी इंटरनेशनल के एफसीआरए पंजीकरण को रद्द किए जाने के बाद. सितंबर 2020 में, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने आरोप लगाया था कि अधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज उठाने की वजह से केंद्र ने उसके बैंक खातों को फ्रीज कर दिया. बैंक खातों के बंद होने के बाद, संगठन ने भारत में अपना कार्यालय बंद कर दिया.

वहीं, केंद्र की एनडीए सरकार ने ध्यान दिलाया कि ऐमनेस्टी इंटरनेशनल का एफसीआरए पंजीकरण 2010 में यूपीए सरकार ने रद्द कर दिया था और इसे कभी नवीनीकृत नहीं किया गया. असल में, एफसीआरए का प्राथमिक मकसद गैर-सरकारी संगठनों के कामकाज पर कड़ी नजर रखना था. 2012 में, तत्कालीन यूपीए सरकार ने कुडनकुलम नाभिकीय ऊर्जा परियोजना का विरोध करने वाले कई गैर-सरकारी संगठनों की बांह मरोड़ने के लिए एफसीआरए नियमों का इस्तेमाल किया. 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद पहले महीने में ही इंटेलिजेंस ब्यूरो ने कई विदेशी-वित्त पोषित संगठनों पर भारत के ''आर्थिक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित'' करने का आरोप लगाते हुए एक गोपनीय रिपोर्ट पेश की थी. इससे एनजीओ के प्रति मोदी सरकार का नजरिया साफ हो गया था.

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