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विपक्षः उभरते क्षेत्रीय दल

विपक्षी नेता कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी को अपना कप्तान मानने को तैयार नहीं हैं. राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने हाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन के विचार का मजाक उड़ाया

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बड़ी योजना कांग्रेस नेता सोनिया और राहुल गांधी से मिलकर बाहर आतीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बड़ी योजना कांग्रेस नेता सोनिया और राहुल गांधी से मिलकर बाहर आतीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी

भारतीय राजनीति में बिरले ही उपचुनाव जनभावनाओं के परिचायक होते हैं. मार्च 2018 में हुए उपचुनावों को लीजिए. तब सत्तारूढ़ भाजपा उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटें हार गई थी. इनमें एक गोरखपुर की सीट थी, जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ है. साल भर बाद भगवा पार्टी उत्तर प्रदेश की 80 में से 62 और देश भर में 303 सीटें जीतकर धड़धड़ाती हुई सत्ता में लौटी. उसने गोरखपुर और फूलपुर की वे सीटें भी झोली में डाल लीं जो उपचुनाव में उसके हाथ से फिसल गई थीं.

यही वजह है कि राजनैतिक पंडित 30 विधानसभा और तीन लोकसभा सीटों पर हाल में हुए उपचुनावों के नतीजों के ज्यादा मायने नहीं निकाल रहे हैं. भाजपा ने 23 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और महज सात जीतीं. हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में, जहां वह सत्ता में है, सभी सीटें हार गई. इससे विपक्ष में उत्साह की लहर दौड़ गई. कांग्रेस ने 26 पर चुनाव लड़ा और आठ सीटें जीतीं. वहीं क्षेत्रीय दलों ने छह सीटें जीतीं, वे न भाजपा से जुड़े थे और न कांग्रेस से. मिजोरम और मेघालय में भाजपा दो सीटें अपने सहयोगी क्षेत्रीय दलों के हाथों गंवा बैठी.

गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों के लिए ये नतीजे उस चुनावी व्यवस्था की तस्दीक करते हैं, जिनकी वे मांग करते रहे हैं. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के राज्यसभा सदस्य प्रोफेसर मनोज झा ने अगस्त में इंडिया टुडे से बातचीत में ''मॉडल सहकारी संघवाद'' की तरफ इशारा किया था, जिसमें कांग्रेस उन राज्यों पर ध्यान दे जहां वह मजबूत है और दूसरे राज्यों में नेतृत्व की भूमिका—पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और बिहार में राजद सरीखी—क्षेत्रीय पार्टियों पर छोड़ दे. हालांकि इस मॉडल पर अमल अभी होना है. कांग्रेस ने बिहार में राजद के खिलाफ और पश्चिम बंगाल में तृणमूल के खिलाफ चुनाव लड़ा और असम में भी साझा उम्मीदवार खड़े नहीं किए.

दरअसल, अन्य क्षेत्रीय दलों में भी एक दूसरे के इलाकों में पैर फैलाने की बेताबी दिखाई देती है. मसलन, इस साल बंगाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा पर अपनी जबरदस्त जीत से उत्साहित तृणमूल त्रिपुरा और गोवा सरीखे राज्यों में अपने पंख फैलाने का जतन कर रही है. यही नहीं, कांग्रेस में सेंध लगाकर वह असम में सुष्मिता देव और गोवा में लुइजिन्हो फैलेरो सरीखे कांग्रेसी नेताओं को अपने पाले में ले आई. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आम आदमी पार्टी (आप) भी गुजरात, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा सरीखे राज्यों में विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.

कांग्रेस के लोकसभा सांसद और कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) के सदस्य मनिकम टैगोर कहते हैं, ''तृणमूल और आप सरीखी पार्टियां गैर-भाजपा वोट बांटकर अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की ही मदद कर रही हैं. कांग्रेस को खारिज करने की बात करना आसान है, लेकिन 2024 के आम चुनाव से पहले जिन 17 राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें से 13 में कांग्रेस ही भाजपा और उसके सहयोगी दलों को मुख्य रूप से चुनौती देने की स्थिति में है.'' पार्टी नेता यह भी इशारा करते हैं कि कुछ क्षेत्रीय दलों को उनके खिलाफ काम करने के लिए भाजपा की ओर से जोर-जबरदस्ती से मजबूर किया जा रहा है.

कांग्रेस के संचार प्रभारी और सीडब्ल्यूसी के सदस्य रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, ''कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर भाजपा के खिलाफ लड़ने के लिए उत्सुक है. जिम्मेदारी क्षेत्रीय दलों की भी है कि वे मोदी-शाह जोड़ी के विद्वेषपूर्ण तौर-तरीकों की धौंस-डपट में न आएं, जो उनके नेताओं के परिवारों के खिलाफ ईडी, आइटी और सीबीआइ का दुरुपयोग कर रहे हैं. गोवा, उत्तराखंड और पंजाब सरीखे राज्यों में चुनावी इकाइयां बनाने की तलाश भाजपा के पक्ष में जाती है और इससे कांग्रेस के ही वोट बांटेंगे.''

अलबत्ता, कई विपक्षी नेता कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी को अपना कप्तान मानने को तैयार नहीं हैं. राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने हाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन के विचार का मजाक उड़ाया, तो तृणमूल के सलाहकार प्रशांत किशोर ने हाल में गोवा में दिए गए एक भाषण में उनकी नेतृत्व शैली पर तीखा हमला किया. राज्यसभा में टीएमसी के संसदीय दल के नेता डेरेक ओब्रायन कांग्रेस से अपनी मानसिकता बदलने की मांग करते हैं. वे कहते हैं, ''विपक्ष में हम बराबर के भागीदार हैं. हमें नीचा दिखाने के बजाए इस पर बात करें. अभी छह महीने पहले कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने पश्चिम बंगाल की सभी 294 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. अब हमसे उदार होने और वह सब भूल जाने की उम्मीद की जा रही है. हम भूल जाएंगे. लक्ष्य भाजपा को हराना है.'' मगर ऐसा करने की योजना पर सर्वानुमति फिलहाल कहीं दिखाई नहीं देती.

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