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हिमाचल प्रदेशः कहां फिसले भाजपा के पांव

जुब्बल कोटखाई सीट पर तो भाजपा जमानत तक न बचा पाई, जहां उसकी प्रत्याशी नीलम सरैइक को महज 2,644 वोट मिले

नई जिंदगी मंडी संसदीय सीट पर उपचुनाव में चुनी गईं कांग्रेस की प्रतिभा सिंह (बीच में) और पार्टी के दूसरे नेता नई जिंदगी मंडी संसदीय सीट पर उपचुनाव में चुनी गईं कांग्रेस की प्रतिभा सिंह (बीच में) और पार्टी के दूसरे नेता

बात 8 अक्तूबर की है. हिमाचल प्रदेश में विधानसभा उपचुनाव होने थे. भाजपा ने उस दिन अपर शिमला की सुदूर जुब्बल कोटखाई सीट से उम्मीदवार के नाम का ऐलान किया. बताते हैं, इस ऐलान के बाद चेतन बरागटा सार्वजनिक मंच पर फूट-फूटकर रोए. यह सीट उनके पिता दिग्गज भाजपा नेता नरेंद्र बरागटा के निधन से खाली हुई थी. जून में कोविड के बाद की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण उनका निधन हो गया था. चेतन को उम्मीद थी कि वे ही पिता की जगह लेंगे. उन्हें मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का समर्थन भी था. पर आलाकमान ने अल्पज्ञात नीलम सरैइक को तरजीह दी.

चेतन अंतत: बागी उम्मीदवार बने और भाजपा इस सीट पर जमानत तक नहीं बचा पाई. पार्टी दो अन्य विधानसभा सीटें अर्की और फतेहपुर के साथ मंडी की प्रतिष्ठित लोकसभा सीट भी हार गई. ये नतीजे उभरते क्षत्रप के तौर पर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की छवि के लिए झटका हैं, जो पूर्व मुख्यमंत्रियों शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल सरीखे राज्य के दिग्गज नेताओं और अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी काबीना मंत्री अनुराग ठाकुर के बीच से जगह बनाते हुए शिखर पर पहुंचे.

मंडी की हार उन्हें सबसे ज्यादा चुभेगी. यह उनका अपना इलाका जो है. उनका विधानसभा क्षेत्र सेराज इसी संसदीय क्षेत्र में आता है. कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिभा सिंह के पक्ष में सहानुभूति की लहर थी, जो उनके पति, पूर्व मुख्यमंत्री और रामपुर बुशहर रियासत के पूर्व राजा वीरभद्र सिंह की मृत्यु से उपजी थी. इसकी काट के लिए उम्मीद थी कि जयराम कोई चमत्कार करेंगे, खासकर जब यहां मुख्यमंत्री का अपना निर्वाचन क्षेत्र भी है. 2019 में यहां मौजूदा सांसद रामस्वरूप शर्मा ने कांग्रेस के आश्रय शर्मा को 4,00,000 वोटों से हराया था. बीते मार्च में उनके आत्महत्या कर लेने के कारण यह सीट खाली हुई थी.

अगस्त के पहले हफ्ते में राज्य में शत-प्रतिशत पात्र लोगों को कोविड टीके की पहली खुराक लगने के बाद मुख्यमंत्री का मनोबल काफी बढ़ा हुआ था. अब कई वजहों से वे कठघरे में हैं. राज्य भाजपा गुटबाजी से तार-तार है. उनकी सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी भावना तारी है. आरोप हैं कि उनके मंत्री कुछ खास अफसरशाहों के भरोसे हैं. सामाजिक क्षेत्र की कई योजनाओं के अमल में भी झोल देखे जा रहे हैं. यही नहीं, कोविड लॉकडाउन के बाद स्थानीय कारोबारियों को मदद, कीमत वृद्धि पर नियंत्रण और हिमाचल की अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी पर गहरा असर डालने वाली एक के बाद एक प्राकृतिक आपदा सरीखे मुद्दों पर उनकी सरकार की प्रतिक्रिया से राज्य भाजपा के नेता तक खुश नहीं हैं.

भाजपा ने उत्तराखंड, कर्नाटक और गुजरात सरीखे पार्टी-शासित राज्यों में सत्ता विरोधी भावना से लड़ने के लिए 'मुख्यमंत्री बदलो, नैरेटिव बदलो' की नीति अपनाई. मगर हिमाचल में उपचुनाव के नतीजों के बाद उसके पैरों के नीचे से अचानक जमीन खिसक गई है. 2017 में जब पार्टी इस पहाड़ी राज्य की सत्ता में लौटी, जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री पद के लिए पहली पसंद नहीं थे. चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने धूमल को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया था. वे चुनाव ही हार गए. छीका टूटकर जयराम की गोद में जा गिरा. उपचुनावों ने राज्य की राजनीति पर ठाकुर की छूटती पकड़ और खासकर बागियों को मनाने या काबू करने में उनकी नाकामी को उघाड़कर रख दिया है. फतेहपुर में भाजपा उम्मीदवार बलवंत सिंह करीब 6,000 वोटों से भवानी सिंह पठानिया से हारे, जबकि पार्टी के बागी राजन सुशांत ने 13,000 वोट बटोर लिए.

बीते चार सालों में ठाकुर को राज्य की जमीनी हकीकतों से पार्टी नेतृत्व को रू ब रू कराने में खासी मशक्कत करनी पड़ी है. इसी साल राज्यसभा के लिए महेंद्र पांडेय के नाम की उनकी सिफारिश को ताक पर रखकर आलाकमान इंदुबाला गोस्वामी को ऊपरी सदन में ले आया. इसी तरह उनके ऐतराज के बावजदू राजीव बिंदल को राज्य भाजपा प्रमुख बना दिया गया (बाद में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उन्हें हटाया गया और ठाकुर के वफादार सुरेश कश्यप राज्य अध्यक्ष बने).

यह बात भी किसी से दबी-छिपी नहीं कि केंद्रीय कैबिनेट मंत्री अनुराग ठाकुर मुख्यमंत्री बनकर राज्य में लौटना चाहते हैं. पार्टी में उनके बढ़ते रुतबे और गृह मंत्री अमित शाह तथा (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड/बीसीसीआइ में उनके प्रभाव के जरिए) उनके बेटे जय शाह के साथ उनकी नजदीकी ने भी मुख्यमंत्री के खेमे में बेचैनी पैदा कर दी है. उधर, भाजपा की अगुआई वाले गठबंधन ने असम की पांचों और पार्टी ने मध्य प्रदेश की तीनों सीटें जीत लीं. इससे हेमंत बिस्व सरमा और शिवराज सिंह ने अपनी हैसियत मजबूत कर ली जबकि शिमला में ठाकुर की नींद उड़ गई है.

वंशवाद की दुविधा

जुब्बल कोटखाई हिमाचल में भाजपा के गलत राजनैतिक फैसलों की खांटी मिसाल है. उम्मीदवार की घोषणा से पहले शुरुआत में ही मुख्यमंत्री और राज्य इकाई ने चेतन को पितृशोक से उबरकर निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव अभियान शुरू करने को कहा. वे भाजपा के दिग्गज नेता के बेटे तो थे ही, राज्य इकाई के आइटी सेल के प्रमुख भी रह चुके थे. 15 साल से वे राजनीति में सक्रिय हैं.

उपचुनाव की तैयारी में चेतन की मदद के लिए ठाकुर ने अपने कैबिनेट मंत्री सुरेश भारद्वाज को भी भेज दिया. चुनावी रेवड़ियां भी बांटीं. क्षेत्र को सब-डिविजन बना दिया. परियोजनाओं वगैरह का भी ऐलान किया. मगर मुख्यमंत्री केंद्रीय नेतृत्व को राजी नहीं कर पाए. चेतन ने बगावत का झंडा थाम लिया और अपने पिता के पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी और कांग्रेस के स्थानीय 'वंशवादी' नेता, पूर्व मुख्यमंत्री के पोते रोहित ठाकुर को कड़ी टक्कर देकर कोई 6,100 वोटों से हारे. मगर किरकिरी तो भाजपा की हुई. पार्टी उम्मीदवार नीलम सरैइक अपनी जमानत गंवा बैठीं. उन्हें महज 2,644 वोट मिले, जो कुल डाले गए वोटों के 5 फीसद भी नहीं थे.

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने यह कहकर उम्मीदवार के चयन को सही ठहराया कि पार्टी नेतृत्व ने ''निरंतर और सोच-समझकर'' पार्टी नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट नहीं देने का फैसला किया है. इससे उपचुनावों के लिए हिमाचल में चेतन और कर्नाटक में लिंगायतों के दबदबे वाली हंगल सीट से पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के बेटे बी.वाइ. विजयेंद्र मुकाबले से बाहर हो गए. पार्टी हंगल सीट भी हार गई. भाजपा चुनावी नारे की तरह इस तथ्य का इस्तेमाल करना चाहती थी कि उसकी प्रतिद्वंद्वी पार्टियां परिवारिक सदस्यों को टिकट देकर भाई-भतीजावाद को बढ़ावा दे रही हैं. हिमाचल में कांग्रेस ने जुब्बल कोटखाई से रोहित ठाकुर और मंडी लोकसभा सीट से प्रतिभा सिंह को खड़ा किया. दोनों जीत गए. उधर राजस्थान की वल्लभनगर सीट के उपचुनाव में उसके दिवंगत विधायक गजेंद्र सिंह की पत्नी प्रीति शक्तावत भी जीत गईं.

अब पार्टी में ''वंशवादी नहीं'' की नीति के खिलाफ खुसुर-फुसुर शुरू हो गई है. जमीन पर वंशवाद कांग्रेस के पक्ष में बैठा है तो भाजपा को भी मुफीद पड़ा है. नई दिल्ली के एक आला नेता कहते हैं, ''नाते-रिश्तेदारों को बाहर करने की ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. राजनेताओं के पारिवारिक सदस्य बराबर कड़ी मेहनत कर रहे हैं... वे क्या करें, किसी दूसरी पार्टी में चले जाएं?'' वहीं 'वंशवादी नहीं' नीति को चुनिंदा ढंग से लागू करने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. मसलन, अनुराग ठाकुर हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री धूमल के बेटे हैं.

भाजपा अध्यक्ष नड्डा के गृह राज्य में इन विनाशकारी नतीजों को लेकर गहरा आत्मनिरीक्षण करना होगा. ये नतीजे ऐसे समय आए हैं, जब विपक्षी कांग्रेस दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह की मृत्यु के बाद बेतरतीब हालत में थी. राज्य में 2022 के अंत में विधानसभा के चुनाव होंगे. उपचुनावों को एक किस्म का सेमी-फाइनल माना जा रहा था, क्योंकि इनमें कुल 68 में से 20 विधानसभा क्षेत्रों—तीन विधानसभा सीटों और मंडी लोकसभा सीट के 17 विधानसभा क्षेत्रों—पर जोर आजमाइश हुई है. भाजपा को अपनी रणनीति नए सिरे से बनानी होगी.

इस जीत के बाद कांग्रेस की राज्य इकाई नए जोश से भर उठेगी और हो सकता है कि कौल सिंह ठाकुर, मुकेश अग्निहोत्री और दूसरे नेताओं के आपस में झगड़ते गुट तीन बार की सांसद प्रतिभा सिंह का नेतृत्व स्वीकार कर लें. जहां तक मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की बात है, उपचुनावों ने बता दिया है कि राज्य की राजनीति पर उनकी पकड़ कितनी कमजोर है. उन्हें अगले कुछ महीनों में राज्य और पार्टी इकाई में ऐसे बदलाव करने होंगे, जो दिखाई दें. वर्ना वे पार्टी नेतृत्व की 'इन्हें हटाओ, उन्हें बदलो' नीति के अगले शिकार हो सकते हैं.

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