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पुस्तक समीक्षाः किताब की कांवड़ यात्रा

पिलग्रिम नेशन में पटनायक की दिलचस्पी तीर्थस्थलों के इतिहास के बजाए उन किंवदंतियों, मिथकों और पौराणिक कथाओं में ज्यादा दिखाई देती है, जो इन जगहों की यात्रा करने वालों में आस्था जगाती हैं.

पिलग्रिम नेशन द मेकिंग ऑफ भारतवर्ष पिलग्रिम नेशन द मेकिंग ऑफ भारतवर्ष

बांस की कांवड़ पर बिठाकर माता-पिता को 40 तीर्थों की यात्रा करवाने वाले श्रवण कुमार को ऐसा आदर्श माना जाता है जिसे दोहराना असंभव है. पर अरविंद केजरीवाल हाल ही में जब दोबारा मुख्यमंत्री चुने गए तो उनके डिप्टी मनीष सिसोदिया ने कहा कि ''दिल्ली ने अपने दुलारे बेटे, श्रवण कुमार को फिर चुन लिया है''. देवदत्त पटनायक ने अपनी नई किताब पिलग्रिम नेशन: द मेकिंग ऑफ भारतवर्ष के आवरण के लिए भी श्रवण कुमार की ही तस्वीर उकेरना तय किया. भारतवर्ष शब्द भी किसी नेता के शब्दकोश से लिया गया मालूम देता है. पटनायक कहते हैं, ''अब ऐसे नेता भी हैं जो इन शब्दों को लेकर अंधराष्ट्रवादी हैं, पर कभी ऐसे शब्दों पर उन्हें शर्म महसूस होती थी. नेता आएंगे-जाएंगे, पर मैं किताबें तो लिखता ही रहूंगा.''

यह अंदेशा रहता है कि हिंदुत्व अपने से मिलते-जुलते किसी भी नैरेटिव को अपने में समेट न ले, पर हिंदू मिथकशास्त्र पर लिखते हुए पटनायक ने अपनी तटस्थता बरकरार रखी है. पिलग्रिम नेशन में उन्होंने वाराणसी, द्वारका और बद्रीनाथ ही नहीं, बोधगया, लखनऊ के बड़े इमामबाड़े और स्वर्ण मंदिर को भी शामिल किया है. किताब के 32 अध्यायों से एक सच झलकता है—कोई भी धर्म प्रभावों से बचा नहीं है. वे कहते हैं, ''आप ईसाइयत की बात करें तो यहूदी धर्म का जिक्र करना होगा. विचारों में घालमेल, मेलजोल और विलय होता रहता है.''

पटनायक के मुताबिक, भारत में तीर्थयात्राओं ने सर्वप्रथम 1,500 साल पहले लोकप्रियता हासिल की. उस वक्त यात्रा पर राष्ट्रीयता की सरहदों ने पाबंदियां नहीं थोपी थीं. ''साधु-संत और अध्येता यात्राएं करते आ रहे थे, पर आम लोगों के लिए कर्म—यानी जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्ति—का विचार प्रेरणा बन गया.'' हो सकता है, एक किस्म की यात्रा दूसरी से राहत देने के लिए आई हो. ''आम लोग सोचने से ज्यादा करने में यकीन करते हैं, सो तीर्थयात्रा नीरस जिंदगी से राहत है.''

पिलग्रिम नेशन में पटनायक की दिलचस्पी तीर्थस्थलों के इतिहास के बजाए उन किंवदंतियों, मिथकों और पौराणिक कथाओं में ज्यादा दिखाई देती है, जो इन जगहों की यात्रा करने वालों में आस्था जगाती हैं. तिरुपति को अपना सांसारिक घर बनाने के विष्णु के फैसले के बारे में लिखते हुए पटनायक का सरल वर्णन दादी-नानी की किस्सागोई के करीब पहुंच जाता है: ''वे प्रियतमा लक्ष्मी के चरणचिन्हों पर चल रहे थे, जिन्होंने असहमति के चलते क्रोध में वैकुंठ छोड़ दिया था.'' फिर वे बताते हैं कि विष्णु अब भी पृथ्वी पर फंसे हुए हैं.

पटनायक बुलावे का भी जिक्र करते हैं. हिंदू धर्म में अवधारणा है कि तीर्थ यात्रा पर आप तभी जाते हैं जब वहां के देवी-देवता आपको बुलाते हैं. वे देवता अचानक चाचा-ताऊ की तरह दिखाई देने लगते हैं. वे कहते हैं, ''हिंदू धर्म में ईश्वर दूर की कौड़ी नहीं है. उनकी कल्पना धरती पर आबाद लोगों की तरह की गई है. देवता भी भक्त पर उतने ही निर्भर हैं जितने भक्त देवता पर. भक्त चढ़ावा चढ़ाता है और देवता आशीर्वाद देते हैं. तो यह लेना-देना चलता रहता है.'' वे यह भी कहते हैं कि ईसाइयत में क्षमादान और बौद्ध धर्म में इच्छा को अस्वीकार करने की अवधारणा है. पर हिंदू धर्म इच्छा को ही आधार बनाता है.

मिथकशास्त्री और इतिहासकार होने के नाते पटनायक लैंगिक आख्यानों से कभी मुंह नहीं मोड़ते. वे कहते हैं, ''अधिकांश समाज—बौद्ध, जैन, सिख-हिंदू—पितृसत्तात्मक और स्त्रीद्वैषी हैं. पर इस बारे में इस तरह सोचें. आपका आध्यात्मिक सूचकांक सबसे पहले खुशियां फैलाने की आपकी क्षमता से जुड़ा है. जहां तक रीति-रिवाजों की बात है, तो वे अच्छे हो सकते हैं, पर उन सबकी सीमाएं हैं.'' पटनायक ने हर साल कम से कम चार किताबें प्रकाशित करने का लक्ष्य तय किया है और अगले छह सालों तक व्यस्त रहने के लिए उनके पास काफी मसाला है. तीर्थस्थलों पर बढ़ती भीड़ के बारे में वे कहते हैं, ''वहां जाना हमारी विवशता नहीं है, पर लोग जाना चाहते हैं. यह मांग और आपूर्ति का मामला है. ईश्वर अलबत्ता हर जगह है.'' —श्रीवत्स नेवतिया

पिलग्रिम नेशन

द मेकिंग ऑफ भारतवर्ष

लेखक: देवदत्त पटनायक

प्रकाशक: अलेफ

कीमत: 499 रु.

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