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दलितों पर डाल रहे डोरे

उद्धव और प्रकाश 20 नवंबर को महाराष्ट्र के प्रमुख समाज सुधारक 'प्रबोधनकार’ केशव सीताराम ठाकरे को समर्पित एक पोर्टल के रिलॉन्च के अवसर पर एक मंच पर आए.

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गठबंधन का मौसम: (बाएं से) प्रकाश आंबेडकर, उद्धव ठाकरे
गठबंधन का मौसम: (बाएं से) प्रकाश आंबेडकर, उद्धव ठाकरे

धवल कुलकर्णी

कहते हैं कि मुश्किल हालात से निबटने के लिए सख्त उपाय करने होते हैं. आगामी निकाय चुनावों के प्रतिष्ठा की लड़ाई बनने और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले अंतिम लड़ाई होने के मद्देनजर शिवसेना के दो प्रतिद्वंद्वी गुट दलित समूहों को रिझाने के लिए एक-दूसरे से होड़ लगा रहे हैं. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) के प्रमुख और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर के साथ गठजोड़ की कोशिश कर रहा है.

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बालासाहेबांची शिवसेना (बीएसएस) ने पूर्व लोकसभा सांसद जोगेंद्र कवाडे के नेतृत्व वाली पीपल्स रिपब्लिकन पार्टी (पीआरपी) के साथ गठबंधन कर लिया है. बीएसएस की प्रमुख सहयोगी भाजपा ने रामदास अठावले से पहले ही गठजोड़ कर रखा है, जो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआइ) के अपने गुट के नेता और नरेंद्र मोदी सरकार में राज्यमंत्री हैं.

यह समझना मुश्किल नहीं है कि मुख्यधारा की सियासी पार्टियां आरपीआइ के गुटों को रिझाने के लिए क्यों लालायित हैं. इन गुटों में मुख्यत: नव बौद्ध दलित हैं. नव-बौद्ध (वे महार जिन्होंने 1956 में आंबेडकर के साथ धर्मांतरण कर लिया) राज्य की आबादी का 7-8 फीसद हैं और वे दलितों में सबसे बड़े समूह हैं. इसके अलावा, दलितों में सबसे ज्यादा जुझारू समझे जाने वाले नव-बौद्धों को किसी मुद्दे पर एकजुट करना आसान होता है. महाराष्ट्र में करीब 59 अनुसूचित जाति (एससी) समूह हैं. हालांकि कोई समुदाय एक साथ किसी को वोट नहीं करता लेकिन विभिन्न आरपीआइ गुटों को नव-बौद्ध दलितों के बीच समर्थन हासिल है.

उद्धव और प्रकाश 20 नवंबर को महाराष्ट्र के प्रमुख समाज सुधारक 'प्रबोधनकार’ केशव सीताराम ठाकरे को समर्पित एक पोर्टल के रिलॉन्च के अवसर पर एक मंच पर आए. प्रबोधनकार उद्धव के दादा थे और बहुजन समर्थक (गैर-ब्राह्मण) हिंदुत्व के पैरोकार थे. वे डॉ. आंबेडकर के भी सहयोगी थे. दो प्रमुख हस्तियों के पोतों की मुलाकात के बाद मुंबई, ठाणे, पुणे और नागपुर जैसे शहरों के निकाय चुनावों में गठबंधन की जमीन तैयार होने लगी. प्रकाश का यह प्रस्ताव स्वाभाविक है. आरपीआइ के दूसरे नेताओं के उलट उनका जनाधार हिंदू दलितों, अलुतेदारों (छोटे ओबीसी), मुसलमानों के साथ ही पढ़े-लिखे शहरी दलितों में भी है. 

शिंदे और कावडे ने भी 4 जनवरी को अपनी पार्टियों के बीच गठजोड़ का ऐलान किया. कावडे ने 1984 में कथित तस्कर हाजी मस्तान मिर्जा के साथ मिलकर दलित मुस्लिम सुरक्षा महासंघ का गठन किया था, जो महाराष्ट्र में दलित-मुस्लिम का पहला राजनैतिक गठजोड़ था. कावडे अतीत में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से भी गठजोड़ कर चुके हैं.

उद्धव और शिंदे, दोनों के नेतृत्व वाले गुट खुद को 'असली’ शिवसेना साबित करने में जुटे हैं. यह मुंबई में उनके प्रदर्शन पर निर्भर करेगा, जहां बीएसएस-भाजपा बृहन्नमुंबई नगर निगम पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रही हैं. देश के सबसे अमीर शहरी निकाय पर फिलहाल उद्धव गुट का कब्जा है. दोनों के बीच संघर्ष तेज होने पर छोटी पार्टियां चुनाव के नतीजे बदल सकती हैं.

संयोगवश, शिवसेना और बौद्ध दलितों के बीच दुश्मनी का इतिहास रहा है. शिवसेना और दलित पैंथरों के बीच वर्ली में 1974 में संघर्ष हुआ था. पैंथरों को शिवसेना से भिड़ने वाला इकलौता सामाजिक समूह माना जाता था. शिवसेना ने मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी का नाम आंबेडकर रखे जाने का विरोध किया था और इसी मुद्दे पर उसने मराठों, हिंदू दलितों और ओबीसी के बीच अपना आधार बढ़ाया था. अठावले और कावडे 'नामांतर’ आंदोलन (1978-1994) की उपज हैं, जिसमें यूनिवर्सिटी का नाम बदलने की मांग की गई थी.

मुंबई यूनिवर्सिटी में कला संकाय के पूर्व डीन पी.जी. जोगडंड का कहना है, ''सियासी पार्टियां खुद को प्रगतिशील दिखाने के लिए आरपीआइ गुट से जुड़ना चाहती हैं...(लेकिन) अगर प्रकाश और शिवसेना हाथ मिला लें तो यह स्वागत योग्य होगा और एक नया सामाजिक इंजीनियरिंग का मॉडल बन सकता है.’’ इससे किसी को फायदा हो न हो, आरपीआइ नेताओं को जरूर फायदा होगा.

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