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केरलः आक्रोश में हैं इंद्र देव

नदी के तटवर्ती इलाकों में अंधाधुंध अतिक्रमण और बेहिसाब खनन ने जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को और बढ़ा दिया है

डूबती उम्मीदें इडुक्की जिले के थोडुकुजा में 16 अक्तूबर को घर के मलबे से कुत्ते को बचाता एक ग्रामीण डूबती उम्मीदें इडुक्की जिले के थोडुकुजा में 16 अक्तूबर को घर के मलबे से कुत्ते को बचाता एक ग्रामीण

केरल एक बार फिर सैलाब की वजह से कराह रहा है. दक्षिण-पश्चिम मॉनसून ने अपने कदम पीछे खींचे ही थे कि उसी समय उत्तर-पूर्वी मॉनसून 2019 के बाद तीसरी दफा आ पहुंचा. मूसलाधार बारिश से बड़े पैमाने पर भूस्खलन शुरू हो गया. इस बार यह मध्य केरल के कोट्टयम, इडुक्की और पथनमथिट्टा जिलों के पहाड़ी भूभागों में ज्यादा हुआ. अक्तूबर के महीने में राज्य में सामान्य से 117 फीसद ज्यादा बारिश हुई, जिसकी वजह से एर्नाकुलम, अलपुझा और त्रिचूर जिलों में सैलाब आ गया. 2018 में आई सदी की भीषणतम बाढ़ के बाद यह लगातार चौथा साल है जब बारिश ने यहां कहर बरपाया है.

बार-बार आ रहे सैलाब और मौसम के पैटर्न में व्यापक बदलावों ने जलवायु विशेषज्ञों को सतर्क कर दिया है. कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी (सीयूएसएटी/क्यूसैट) के एडवांस्ड सेंटर फॉर एटमॉस्फरिक रडार रिसर्च में सीनियर साइंटिस्ट डॉ. एम.जी. मनोज कहते हैं, ''बीते दशक के दौरान केरल ने जलवायु में तेज बदलाव देखे हैं. मॉनसून के दौरान बारिश के पैटर्न में साफ बदलाव आए हैं क्योंकि अरब सागर मॉनसून के दौरान नियमित रूप से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज कर रहा है (सामान्य तापमान 27 डिग्री सेल्सियस के नीचे हुआ करता था). समुद्री तापमान में बदलाव जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का साफ संकेत है.''

मनोज कई सालों से भारत के दक्षिण समुद्रतट पर जलवायु परिवर्तनों का अध्ययन कर रहे हैं. वे कहते हैं कि केरल के भूगोल और उसके असमतल विस्तार ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है. बढ़ते समुद्री तापमान के चलते गहरे बादल बन रहे हैं और पश्चिमी घाट की पहाड़ियों के साथ उनकी नजदीकी ने बादल फटने की घटनाओं को बढ़ावा दिया है. मनोज बताते हैं, ''आपदाग्रस्त इलाकों में घंटे भर के भीतर 50-70 मिमी बारिश हुई, जिससे अचानक बाढ़ आई और भूस्खलन हुए. यह नई स्थिति है—भारतीय मौसम विभाग ने छोटे स्थानों पर बादल फटने को अपने मौसम चार्ट पर अभी वर्गीकृत तक नहीं किया है. मॉनसून के दौरान कई इलाकों में बादल आते हैं और फटाफट बरस जाते हैं, जिससे महज एक घंटे में 20 मिमी से ज्यादा मूसलाधार बारिश हो रही है. 50-100 किमी चौड़े कई इलाकों, पहाड़ों और 44 नदियों के साथ केरल का भूगोल ऐसा है जो आपदा को बढ़ा देता है.''

केरल में साल में औसत 3,000 मिमी बारिश होती है, जो तीन हिस्सों में होती है—मॉनसून पूर्व (अप्रैल-मई), दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (जून-सितंबर) और उत्तर-पूर्वी मॉनसून (अक्तूबर-दिसंबर). बीते सालों में बारिश के इन सत्रों ने 'गॉड्स ओन कंट्री' बनने में और सस्ती पनबिजली बनाने में केरल की मदद की. मगर 2017 से जलवायु का कैलेंडर बदल गया. इसका पहला संकेत ओखी चक्रवात था, जो उसी साल राज्य के दक्षिणी समुद्रतट से टकराया और 143 मछुआरों की जान लेकर गया. 2017 के बाद 29 चक्रवाती तूफान भारत से टकराए और उनमें से 11 अरब सागर से निकलकर आए थे. सच तो यह है कि इस मई में केरल बाल-बाल बच गया जब ताउते चक्रवात इस तट से नजरें चुराकर सीधा गुजरात चला गया. एक बड़े मौसम वैज्ञानिक खुलासा करते हैं, ''अगर यह हमारे तट से 50 किमी और नजदीक आ जाता तो केरल में तबाही बरपा देता.''

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अध्ययनों ने राज्य की 5,642.6 वर्ग किमी जमीन (कुल भूभाग की 14.5 फीसद) पर खतरे की झंडी दिखाई है और इसे बाढ़ की संभावना वाला भूभाग बताया है. 27 तालुकों की आबादी बेहद खतरे में है जबकि अन्य 45 तालुकों के लोग औसत जोखिम की जद में हैं.

सिविल इंजीनियर से हाइड्रोलॉजिस्ट बने और फिलहाल मुल्लापेरियार बांध विवाद प्रकोष्ठ में कार्यरत जेम्स विलियम्स कहते हैं, ''हमें बाढ़ के साथ रहना सीखना ही होगा क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव गंभीर होंगे. यह केरल के लिए चुनौतियों से भरा दौर है और कोई आसान समाधान नहीं है. हमें अपने कमजोर नदी घाटी क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए माइक्रो-प्लानिंग करते हुए बाढ़ को वैज्ञानिक नजरिए से संभालना होगा.''

विलियम्स के मुताबिक केरल के लिए अब 'फ्लड स्टोरेज कुशन' बनाना व्यावहारिक नहीं रह गया है. वे कहते हैं, ''राज्य में संचालित 53 बांधों की कुल भंडारण क्षमता 580.6 करोड़ क्यूबिक मीटर है. केरल के पास भारी बाढ़ के दौरान पानी छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं होता.'' यह पांच साल पहले से एकदम अलहदा स्थिति है, क्योंकि तब गर्मियों के महीनों (जनवरी-मई) में टीवी पर न्यूजरूमों में चर्चा निरपवाद रूप से सूखे की आशंकाओं और बिजली कटौतियों के बारे में हुआ करती थी और सरकारों को बांध का पानी 'बर्बाद करने' के लिए कोसा जाता था.

तेज जलवायु परिवर्तन का असर नदी किनारों पर अतिक्रमण, बेलगाम खुदाई, बहुत ज्यादा जनसंख्या घनत्व (प्रति वर्ग किमी 859 लोग) और वेटलैंड के गायब होने की वजह से और गहरा गया. अक्तूबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में राज्य सरकार ने कोस्टल रेग्यूलेशन जोन (सीआरजेड) या समुद्रतटीय विनियमन क्षेत्र के 27,735 उल्लंघनों का खुलासा किया. उसने ब्योरेवार बताया कि स्थानीय निकायों की मंजूरी के बगैर 1,860 ढांचे खड़े कर लिए गए, पर उसने कार्रवाई से छूट की भी गुजारिश की.

संरक्षणवादी इस गड़बड़ी के लिए सियासी नेतृत्व पर दोष मढ़ते हैं. हाल ही में अचानक बाढ़ के बाद जबरदस्त भूस्खलन का दंश झेल चुके कोट्टयम जिले के कूटीकल का दौरा करने के बाद सेवानिवृत्त प्रोफेसर और पर्यावरणविद ई. कुंजीकृष्णन ने कहा, ''हम अपने लालच और भ्रष्टाचार की भारी कीमत चुका रहे हैं, क्योंकि इसने केरल को हाल के सालों में आपदा-संभावित क्षेत्र में तब्दील कर दिया है. हमने बेरोकटोक पत्थरों की खुदाई के चलते पश्चिमी घाट को बर्बाद कर दिया है. इस क्षेत्र में करीब 6,500 जगह खुदाई चल रही है, जिनमें से महज 750 के पास लाइसेंस है. उधर नदी घाटियों में अतिक्रमणों ने जल प्रवाह को सीमित कर दिया है.''

कोट्टयम जिले के मुंडकायम के रहने वाले के.पी. जेबी को कड़वा अनुभव हुआ जब वे मणिमलयार नदी के किनारे बना अपना घर गंवा बैठे. पेशे से बस ड्राइवर जेबी ने गाढ़ी कमाई की पाई-पाई बचाकर परिवार के लिए अच्छा-सा घर बनाया था. बेलगाम पानी का ज्वार पल भर में घर के साथ उनका सब कुछ बहा ले गया. तकलीफ में डूबे जेबी कहते हैं, ''ईश्वर का शुक्र है हम जिंदा हैं. मूसलाधार बारिश शुरू हुई और लगा कि नदी आगबबूला है, तो हम चले गए. हमारा सब चला गया.''

सेवानिवृत्त बड़े अफसरशाह और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे टी.के.ए. नायर कहते हैं कि केरल को राज्य के सामने मौजूदा जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निबटने के लिए अचूक रणनीतियां बनानी होंगी. ''कई चेतावनियां मिल चुकी हैं. यह अलग बात है कि हम उन्हें सुनते हैं या नहीं. केरल की हरेक परियोजना का, चाहे वह सरकारी हो या निजी, पारिस्थितिकीय प्रभाव अध्ययन किया ही जाना चाहिए ताकि भविष्य में मौतों को कम से कम किया जा सके.''

मगर राज्य सरकार बाढ़-संभावित इलाकों में पाबंदियों और आपदा-संभावित क्षेत्रों से लाचार परिवारों को दूसरी जगह बसाने को लेकर अब भी टालमटोल कर रही है. कम से कम अभी तो अक्तूबर की आपदाओं के पीड़ियों के लिए राहत कार्य किए जा रहे हैं.

राज्य के राजस्व मंत्री के. राजन कहते हैं कि वाम मोर्चा सरकार को ''स्थिति की गंभीरता का एहसास है और वह आपदा-संभावित क्षेत्रों में माइक्रो-प्लानिंग शुरू करेगी. लेकिन हमारी पहली प्राथमिकता अभी स्थानीय स्तरों पर आरंभिक चेतावनी प्रणालियां विकसित करना है ताकि विनाशकारी प्रभावों को रोका जा सके.''

आपदा-संभावित क्षेत्रों के लिए एकीकृत योजना लागू करने में जरा भी देरी राज्य के लिए घातक साबित हो सकती है. कोविड के साथ लंबी और क्षत-विक्षत कर देने वाली लड़ाई के बाद केरल किसी तरह आहिस्ता-आहिस्ता सामान्य अवस्था की तरफ लौट रहा है और इसके लोग ऐसे उत्तरदायी प्रशासन की उम्मीद रखते हैं जो जलवायु परिवर्तन की इन तगड़ी घटनाओं की चेतावनियां सुनता हो.

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