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लॉकडाउन की कीमत

राज्यों के लिए कोविड का टीकाकरण बड़ा खर्च होगा. एक मोटा अनुमान यह दर्शाता है कि राज्यों को टीकाकरण अभियान चलाने के लिए कम से कम 40,000 करोड़ रु. की जरूरत होगी

सन्नाटा मुंबई में चल रहे लॉकडाउन के बीच छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के बाहर खाली सड़क का दृश्य सन्नाटा मुंबई में चल रहे लॉकडाउन के बीच छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के बाहर खाली सड़क का दृश्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 अप्रैल को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में राज्यों से आग्रह किया कि वे आखिरी उपाय के तौर पर ही लॉकडाउन के बारे में सोचें. हालांकि एक हफ्ते के भीतर ही कोविड के मामलों में अंधाधुंध बढ़ोतरी के बाद महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात और कर्नाटक यही करने को मजबूर हो गए जबकि पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान और हरियाणा ने रात और सप्ताहांत के कर्फ्यू लगाए.

पिछले साल के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के नतीजों से कराह रहा महाराष्ट्र नाप-तौलकर लगाए गए लॉकडाउन को 15 मई तक बढ़ाने का ऐलान करने को मजबूर हो गया. यह जीएसडीपी (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) के लिहाज से सबसे बड़ा राज्य है और राष्ट्रीय जीवीए (सकल मूल्य संवर्धित) में 14.2 फीसद का योगदान देता है. 2020-21 के वित्तीय साल में राज्य की अर्थव्यवस्था मुद्रास्फीति के समायोजन के बाद 8 फीसद और बगैर समायोजन के 5.6 फीसद संकुचित हुई. भारतीय स्टेट बैंक के चीफ इकॉनोमिस्ट सौम्य कांति घोष एक रिपोर्ट में अनुमान जाहिर करते हैं कि अभी चल रहा लॉकडाउन 80,000 करोड रुपए या जीएसडीपी का 2.7 फीसद लील जाएगा. वित्त वर्ष 2020-21 में महाराष्ट्र का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का 3.3 फीसद—15 सालों में सबसे ज्यादा—था. मौजूदा लॉकडाउन भी यहां के उद्योग और सेवा क्षेत्र के लिए बहुत मनहूस खबर है. दोनों क्षेत्रों ने पिछले साल 11 फीसद से ज्यादा का संकुचन झेला था.

कर्नाटक ने 27 अप्रैल से दो हफ्तों का लॉकडाउन लगाया. इस अवधि के दौरान वह करीब 22,000 करोड़ रुपए से हाथ धो बैठेगा. पिछले साल कर्नाटक की अर्थव्यवस्था में 2.6 फीसद का संकुचन आया. वित्त वर्ष 22 में राज्य की उधारियां करीब 71,332 हजार करोड़ रुपए होंगी, जो महामारी से पहले के अनुमान के मुकाबले करीब 33 फीसद ज्यादा हैं. वित्त वर्ष 21 की राजस्व प्राप्तियों में 11 फीसद की कमी (1.8 लाख करोड़ रुपए के अनुमानित संग्रह के बजाय 1.6 लाख करोड़ रुपए) के बाद और ज्यादा उधार लेना जरूरी हो गया और राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के संभाले जा सकने लायक 2.55 फीसद से बढ़कर 3.23 फीसद पर पहुंच गया.

वित्तीय साल 2020-21 में राज्यों का कुल राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.4 फीसद था, जबकि देश का राजकोषीय घाटा जीडीपी का 9.5 फीसद आंका गया. घाटा इसलिए बढ़ गया क्योंकि केंद्र को राज्यों के राजस्व में कमी और जीएसटी (माल और सेवा कर) के मद में हुए घाटों की भरपाई के लिए कर्ज उगाहना पड़ा. जीएसटी के नियमों के मुताबिक राज्यों के कर संग्रह में कमी की भरपाई केंद्र सरकार को करनी होती है.

लॉकडाउ की कीमत
लॉकडाउ की कीमत

दृष्टिकोण निराशाजनक ही है. नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय लोक वित्त और नीति संस्थान (एनआइपीएफपी) के डायरेक्टर पिनाकी चक्रबर्ती कहते हैं, ''अगर शटडाउन उम्मीद के मुताबिक तीन हफ्ते जारी रहते हैं तो अगली दो तिमाहियों के दौरान आर्थिक बहाली पर असर पड़ेगा. इसमें जीएसटी राजस्व और उत्पाद शुल्क तथा राज्यों के लिए वैट (मूल्य-संवर्धित कर) सरीखे संग्रह हैं.''

मौजूदा और मंडराती वित्तीय तंगहाली का अर्थ होगा राज्यों की तरफ से पूंजीगत खर्चों में—सड़कों, पुलों, राजमार्गों वगैरह पर—अनिवार्य कटौतियां. इस वित्त वर्ष के लिए इनका कुल अनुमान उनके बजटीय खर्च का 10-15 फीसद था. इन कटौतियों का सीमेंट और लौह अयस्क की मांग पर उत्तरोत्तर असर पड़ेगा. ईंधन और शराब की मांग पर पहले ही असर पड़ा है और इन पर लगाया मिलने वाला वैट राज्य के राजस्व का मोटे तौर पर एक-तिहाई हिस्सा होता है.

कर्फ्यू, लॉकडाउन और फैक्ट्रियों की स्वैच्छिक बंदी के चलते बड़े औद्योगिक शहरों से प्रवासी कामगारों की रवानगी फिर शुरू हो गई. मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलूरू के व्यावसायिक केंद्र या तो बंद हैं या आधी क्षमता से काम कर रहे हैं. हीरो मोटोकॉर्प ने 20 अप्रैल को अपने तमाम मैन्यूफैक्चरिंग केंद्रों पर कामकाज 1 मई तक बंद कर दिया. इसके बाद गुरुग्राम, हरिद्वार, वडोदरा, लुधियाना, सोनीपत, मानेसर और फरीदाबाद के कई ऑटोमोबाइल और दूसरे मैन्यूफैक्चर ने उत्पादन कुछ वक्त के लिए स्थगित कर दिया.

उत्पादन और विवेकाधीन मांग में गिरावट का असर जीएसटी संग्रह पर पडऩा तय है. मार्च 2021 में सकल जीएसटी संग्रह रिकॉर्ड 1.23 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया. पिछले वित्तीय साल का यह लगातार पांचवां महीना था जब जीएसटी संग्रह ने महीने में 1 लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा पार किया. राज्यों के नियोजित पूंजीगत खर्च को फिर पटरी पर लाने के लिए इस रफ्तार का बना रहना जरूरी है.

आर्थिक मामलों पर भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल अग्रवाल उम्मीद जाहिर करते हैं, ''पिछले साल के उलट इस बार हम बीमारी को बेहतर जानते हैं और अच्छी तरह लैस हैं.'' फिलहाल जब अस्पताल संक्रमितों की बढ़ती तादाद से नहीं निपट पा रहे हैं, यह क्रूर मजाक ही मालूम देता है. मगर अग्रवाल उम्मीद का दामन नहीं छोड़ते. उन्होंने कहा, ''स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे और आपूर्तियों से जुड़ी चुनौतियां हैं, लेकिन केंद्र और राज्य जल्द से जल्द उनके समाधान के लिए कृतसंकल्प हैं. कोविड के मामलों में आए उछाल ने 350 जिलों पर ज्यादा असर नहीं डाला है. इन जिलों में अर्थव्यवस्था को नुक्सान पहुंचने का कोई मतलब नहीं है.''

टीकाकरण अभियान राज्य सरकारों के लिए बड़ा खर्च होगा. केंद्र ने अब मैन्यूफैक्चर को ऑर्डर की गई खुराकों की 50 फीसद खुले बाजार में राज्यों और निजी खिलाड़ियों को देने की इजाजत दे दी है. फौरी गुणा-भाग से पता चलता है कि मौजूदा कीमतों पर राज्यों को इस अभियान के लिए कम से कम 40,000 करोड़ रुपए की जरूरत होगी. महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और असम की सरकारों ने मुफ्त टीके लगाने का ऐलान किया है.

वित्तीय संस्थाओं का अनुमान है कि 2021-22 के वित्तीय साल में जीडीपी ग्रोथ 7.7-13.7 फीसद के दायरे में होगी. इसमें मौजूदा लॉकडाउन का असर शामिल नहीं है. आने वाले महीने बहुत उतार-चढ़ावों से भरे होंगे.

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