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महंगाईः कोविड पर नियंत्रण की कीमत

केयर रेटिंग्ज का एक नोट कहता है कि गैर-खाद्य चीजों की महंगाई मार्च की 11.8 फीसद के मुकाबले अप्रैल में 15.6 फीसद रही. खाद्य उत्पादों की महंगाई मार्च में 9 फीसद से बढ़कर अप्रैल में 12.6 फीसद हो गई

महंगी उपज अक्तूबर, 2020 के आखिरी दिनों में पूर्वी दिल्ली स्थित गाजीपुर सब्जी मंडी महंगी उपज अक्तूबर, 2020 के आखिरी दिनों में पूर्वी दिल्ली स्थित गाजीपुर सब्जी मंडी

फरवरी के आखिर और मार्च की शुरुआत में जब कोविड की दूसरी लहर में उछाल आनी शुरू हुई, नीति निर्माता और बैंकर चिंता में पड़ गए कि राज्यों के लगाए जा रहे लॉकडाउन से महंगाई में आग लग सकती है. उनकी चिंता बेबुनियाद नहीं थी, यह तब साबित हुआ जब खुदरा बाजार में पहुंचने से पहले चीजों की कीमतों में बदलावों पर नजर रखने वाले डब्ल्यूपीआइ (थोक मूल्य सूचकांक) के आंकड़े आए.

डब्ल्यूपीआइ महंगाई इस वर्ष अप्रैल में पिछले वर्ष के इसी माह के मुकाबले करीब 11 महीनों के उच्चे स्तर 10.49 फीसद पर पहुंच गई. मार्च में यह बढ़कर 7.39 फीसद हो गई थी, जिसकी वजह मूल धातुओं, बिजली और ईंधन के दामों में बढ़ोतरी थी. इनमें से आखिरी दो तो चार वर्ष के ऊंचे स्तर पर हैं. अप्रैल के ऊंचे आंकड़े की एक और वजह 'निचले आधार का प्रभाव' था. 25 मार्च को राष्ट्रीय लॉकडाउन के बाद बीते वर्ष अप्रैल में थोक महंगाई गिरकर-1.6 फीसद पर आ गई थी.

जिंसों की कीमतों में वृद्धि चिंता की बात है, क्योंकि इससे खुदरा कीमतों में आग लग सकती है जब आने वाले महीनों में कंपनियां ईंधन, बिजली और कच्चे माल की लागतें उपभोक्ताओं पर डाल देंगी. ढुलाई और उत्पादन की लागतें पहले ही बढ़ रही हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि जिंसों के वैश्विक दामों में वृद्धि और निचले आधार के असर से थोक महंगाई छोटे वक्त में ऊंचे स्तर पर बनी रहेगी. वहीं, ब्याज दरों से जुड़े भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के फैसलों पर इसका असर तब तक पडऩे की संभावना नहीं है जब तक इससे खुदरा महंगाई प्रभावित नहीं होती.

आरबीआइ ने 7 अप्रैल को रेपो दर (जिस पर बैंक उससे उधार लेते हैं) में बदलाव नहीं करते हुए इसे 4 फीसद पर बनाए रखा. फरवरी में महंगाई के 5 फीसद पर पहुंच जाने से आरबीआइ ने ब्याज दरों में कटौती का जोखिम मोल नहीं लिया, क्योंकि ज्यादा सस्ते कर्ज के जरिए अर्थव्यवस्था में धनापूर्ति महंगाई की आग में घी का काम कर सकती थी.

उस वक्त कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि से महंगाई के कच्चे आंकड़ों में उछाल आया और (खाने-पीने तथा ईंधन जैसी उतार-चढ़ाव वाली चीजों को छोड़कर) मूल महंगाई भी फरवरी में 6 फीसद पर पहुंच गई थी. वैसे, आरबीआइ के गवर्नर शक्तिकांत दास ने ऐलान किया कि शीर्ष बैंक अपनी 'उदार नीति' जारी रखेगा और दरों में कटौती तभी करेगा जब ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए व्यवस्था में ज्यादा धन झोंकना जरूरी होगा. अप्रैल में महंगाई के ऊंचे आंकड़ों का एक नतीजा यह हुआ कि इस पड़ाव पर ब्याज दरों में कटौती केंद्रीय बैंक के रडार से दूर रहने की संभावना है. इस बीच सीपीआइ (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) पर आधारित खुदरा महंगाई अप्रैल में घटकर 4.29 फीसद पर आ गई. यह लगातार पांचवां महीना है जब सीपीआइ आरबीआइ की महंगाई की ऊपरी सीमा 6 फीसद के भीतर है.

एक्यूट रेटिंग्ज ऐंड रिसर्च के चीफ एनालिटिक ऑफिसर सुमन चौधरी कहते हैं, ''अप्रैल में डब्ल्यूपीआइ में वृद्धि का मुख्य कारण ईंधन और बिजली की कीमतों में 20.9 फीसद (सालाना) वृद्धि है, जो प्राथमिक तौर पर पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमतों में खासकर बीते तीन महीनों में आए उछाल की वजह से है.'' डब्ल्यूपीआइ में अनुक्रमिक तेजी भी ऊंचे स्तर पर है, जो प्राथमिक जिंसों के दामों में स्थिर वृद्धि बताती है. वे यह भी कहते हैं कि निर्मित उत्पादों की कीमतों में स्थिर वृद्धि के चलते सीपीआइ महंगाई में भी माह-दर-माह आधार पर बढ़ोतरी आना शुरू हो सकता है.

केयर रेटिंग्ज का एक नोट कहता है कि गैर-खाद्य चीजों की महंगाई मार्च की 11.8 फीसद के मुकाबले अप्रैल में 15.6 फीसद रही. खाद्य उत्पादों की महंगाई मार्च में 9 फीसद से बढ़कर अप्रैल में 12.6 फीसद हो गई, जिसकी मुख्य वजह सब्जियों और पशुओं से मिलने वाले तेलों और वसाओं के दामों में अच्छी-खासी वृद्धि थी. अप्रैल में ईंधन और बिजली की महंगाई भी पिछले महीने के 10.3 फीसद के मुकाबले छलांग लगाकर 20.9 फीसद पर पहुंच गई. नोट यह भी कहता है, ''(इसकी) वजह तेल की वैश्विक मांग के नजरिए में उजली संभावनाओं और निचले आधार प्रभाव के चलते कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कठोर बने रहने में देखा जा सकता है.''

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