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आदिवासी और पेसा

पेसा ऐक्ट ग्राम सभाओं को लघु वनोपज संग्रह और खनन तथा आबकारी से संबंधित विवादों में समाधान का अधिकार देता है

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चुनावी थाप : भोपाल में आदिवासी कलाकारों के बीच ढोलक बजाते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
चुनावी थाप : भोपाल में आदिवासी कलाकारों के बीच ढोलक बजाते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार का बड़े पैमाने पर जनजातियों तक पहुंच बनाने की कोशिश में जुटना बेमकसद नहीं है. वहां विधानसभा चुनाव सिर्फ एक साल दूर हैं और 2011 की जनगणना के अनुसार, 21 प्रतिशत जनजातीय आबादी के साथ मध्य प्रदेश में जनजातीय लोगों की संख्या देश के सभी राज्यों से अधिक है. भाजपा ने 2018 में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कुल 47 सीटों में से केवल 15 पर जीत हासिल की थी जबकि कांग्रेस को 30 सीटें मिली थीं और एक सीट निर्दलीय के खाते में गई थी. उपचुनावों में कुछ सीटें हार जाने के कारण कांग्रेस के पास इन सीटों की संख्या कम हो गई है, फिर भी इनका बहुमत उसी के पास है. राज्य की 230-सदस्यीय विधानसभा में चुनावी जीत के लिए आदिवासी वोटों की अहमियत का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 2013 में जब भाजपा ने राज्य में जीत हासिल की थी, तब उसे कुल 47 आदिवासी सीटों में से 31 पर जीत मिली थी.

15 नवंबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू प्रदेश के शहडोल में थीं. राष्ट्रपति बनने के बाद इस राज्य की पहली यात्रा में वे जनजातीय गौरव दिवस पर आयोजित एक समारोह में भाग लेने पहुंची थीं. (पिछले साल केंद्र सरकार ने आदिवासी प्रतीक पुरुष बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस घोषित किया था.) उनकी यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब सत्तारूढ़ भाजपा 2023 चुनावों से पहले आदिवासी मतों को अपनी ओर खींचने की हर कोशिश कर रही है. इस अवसर का उपयोग जनजातियों के हित में एक बड़े कार्यक्रम की शुरुआत के तौर पर राष्ट्रपति की ओर से घोषित और काफी समय से लंबित ''अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार'' (पेसा) अधिनियम के तहत नियमों के निर्माण की घोषणा के लिए किया गया.

पेसा के तहत नियमों की अधिसूचना जारी होने से राज्य में यह अधिनियम लागू हो सकेगा और मध्य प्रदेश ऐसा करने वाला देश का आठवां राज्य बन जाएगा. पेसा अधिनियम ग्राम सभा पंचायतों को कई विषयों के बारे में निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है. यह कानून कुल राज्य के कुल 333 विकास खंडों में से 89 आदिवासी विकास खंडों में अर्थात् पूरे राज्य के एक तिहाई से कुछ ही कम क्षेत्रों में लागू होगा. 

इन नियमों का निर्माण जटिल मामला था, क्योंकि ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने का यह आदिवासी समर्थक कदम अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले कुछ अन्य समूहों को अलग-थलग कर सकता है. ऐसे समूहों में ज्यादातर पिछड़े समुदाय हैं, जो वर्षों से भाजपा के साथ हैं. पेसा अधिनियम पारित होने के 26 साल बाद इन नियमों का बनना यह भी दिखाता है कि 1993 से 2003 तक राज्य में सत्तारूढ़ रही कांग्रेस सरकारों ने भी इससे परहेज किया था.

पेसा के तहत बने नियम ग्राम सभाओं को लघु वनोपज संग्रह और खनन तथा आबकारी से संबंधित विवादों में समाधान का अधिकार देते हैं. विचार-विमर्श के चरण में संबंधित विभागों ने इन पक्षों पर चुनौतियां पेश की थीं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शहडोल में अपने भाषण में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया कि पेसा नियमों का उद्देश्य किसी को अलग-थलग करना नहीं, बल्कि आदिवासियों को सशक्त बनाना है. स्पष्ट है कि वे अधिसूचना प्रक्रिया की चुनौतियों से परिचित थे. उन्होंने कहा, ''पेसा ऐक्ट के कार्यान्वयन से आदिवासियों को उनकी भूमि, जल और जंगलों पर अधिकार मिलेगा. यह क्रांतिकारी कदम है और मुझे खुशी है कि इसकी घोषणा बिरसा मुंडा की जयंती पर की जा रही है.''

आदिवासियों का समर्थन पाने के लिए इस दौरान भाजपा ने कई उपायों की घोषणा की है. सभी सरकारी विभागों में आदिवासियों के लिए आरक्षित रिक्तियों को भरने के लिए भर्ती शुरू की गई है तथा लोगों की—विशेष रूप से आदिवासियों की—स्वास्थ्य समस्याओं का पता लगाने के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए गए हैं. कांग्रेस प्रवक्ता के.के. मिश्र का कहना है कि ''2023 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पेसा के तहत नियमों का निर्माण जल्दबाजी में किया गया है. चूंकि भाजपा 2003 से मध्य प्रदेश की सत्ता में है, इसलिए उसे यह भी जवाब देना होगा कि इन नियमों को बनाने में 18 साल क्यों लगे.''

यह जानते हुए कि पेसा अधिनियम का कार्यान्वयन तब तक राजनैतिक लाभ नहीं दे सकता जब तक कि उसे लोगों को समझाया न जाए, राज्य भाजपा ने 20 नवंबर से 'पेसा जागरूकता यात्रा' निकालने का फैसला किया है. यह यात्रा राज्य के सभी 89 आदिवासी विकास खंडों से होते हुए 4 दिसंबर को समाप्त होगी. 

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