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पंजाबः अकेले पड़ते अमरिंदर

2015 में गुरुग्रंथ साहिब से बेअदबी के मामले में एसआइटी के लचर रुख और हाईकोर्ट के फैसले की कीमत अमरिंदर को पंथिक वोटों से चुकानी होगी

चौतरफा चुनौती मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह सरकार के चार साल होने के मौके पर मार्च में प्रेस से मुखातिब हुए चौतरफा चुनौती मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह सरकार के चार साल होने के मौके पर मार्च में प्रेस से मुखातिब हुए

अगले विधानसभा चुनाव को बमुश्किल एक साल रह गया है, ऐसे में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह यह नहीं चाहेंगे कि वे किसी राजनीतिक संकट में अकेले फंसे हुए दिखाई दें. 10 अप्रैल को पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट ने 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब को अपवित्र किए जाने के मामले पर गठित एसआइटी (विशेष जांच दल) की रिपोर्ट को खारिज कर दिया. राज्य में बहुतों की नजर में न्यायिक प्रक्रिया के उपहास के तौर देखे जा रहे इस मुद्दे ने मुख्यमंत्री के लिए एक राजनैतिक संकट खड़ा कर दिया है.

उनके आलोचकों में अब उनके दो विश्वासपात्र भी शामिल हो गए हैं—प्रदेश कांग्रेस प्रमुख सुनील जाखड़ और सहकारिता मंत्री सुखजिंदर रंधावा. इन दोनों ने 26 अप्रैल को अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया. लेकिन मुख्यमंत्री ने फिलहाल उनके इस्तीफों को खारिज कर दिया है. इन दोनों ने मामले को ठीक से संभाल न पाने के लिए सार्वजनिक बयान देकर सरकार की आलोचना की थी जिसके बाद अमरिंदर सिंह ने दोनों को फटकार लगाई थी. इस बीच क्रिकेटर से नेता बने उनके पुराने आलोचक और कांग्रेस के नेता नवजोत सिंह सिद्धू, राज्यसभा सांसद प्रताप सिंह बाजवा और लुधियाना से सांसद रवनीत बिट्टू उन पर निशाना साधते रहे हैं.

ये सभी ताकतवर नेता हैं जिन्हें कैप्टन अमरिंदर सिंह नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं—युवा सिख मतदाताओं में सिद्धू का अच्छा प्रभाव है, बाजवा पीसीसी के पूर्व प्रमुख व पांच बार कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं और बिट्टू पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं जिनकी हत्या कर दी गई थी. 27 अप्रैल को अमरिंदर सिंह ने सिद्धू के आरोपों पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए उन पर आरोप लगाया कि वह एक बार फिर कांग्रेस पार्टी से निकलने के लिए एक भूमिका तैयार कर रहे हैं.

इस पूरे मामले में पार्टी आलाकमान की चुप्पी मुख्यमंत्री के लिए चिंता की बात हो सकती है. पार्टी नेतृत्व ने उनकी शिकायतों की ज्यादातर अनदेखी ही की है, खासकर बाजवा के खिलाफ (उलटे उन्हें ज्यादा जिम्मेदारियां देकर पुरस्कृत ही किया है). इससे पार्टी की प्रदेश इकाई पर अमरिंदर की पकड़ कमजोर ही हुई है. इस बीच जाखड़ ने अपने एक बयान में ''अति आत्मविश्वास और राजनैतिक जिम्मेदारी की कमी'' को एसआइटी की विफलता का जिम्मेदार बताया है.

2015 के अक्तूबर-नवंबर में गुरु ग्रंथ साहिब को अपवित्र किए जाने की घटना की सबसे पहली खबर फरीदकोट जिले के बरगारी गांव के एक गुरुद्वारे से आई थी. इसके बाद पास के फिरोजपुर, अमृतसर, लुधियाना और तरनतारन जिलों में इसी तरह की 122 घटनाओं का पता चला था. सिखों के लिए हर कहीं यह एक बहुत संवेदनशील मुद्दा है, खासकर कोटकापुरा में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी के बाद, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई थी. सिखों के एक वर्ग का मानना है कि इन घटनाओं के पीछे जेल में बंद सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा संप्रदाय के प्रमुख गुरमीत राम रहीम और उनके दलित सिख अनुयायियों का हाथ हो सकता है.

पवित्र पुस्तक को अपवित्र किए जाने की रिपोर्टें तब आईं जब अकाल तख्त जत्थेदार ने 2007 की उस घटना के लिए विवादास्पद नेता की माफी को स्वीकार कर लिया जिसमें उसने कथित रूप से गुरु गोविंद सिंह जी के वस्त्रों जैसा पहनावा पहना था. उस फैसले के बाद डेरा प्रमुख के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हुए थे और पंथिक (धार्मिक सिख) वोटरों के बीच पनपे गुस्से ने तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और शिरोमणि अकाली दल के उनके बेटे सुखविंदर बादल को धूल चटा दी थी.

2017 के विधानसभा चुनाव में अमरिंदर ने बादल परिवार को दोषी कहकर उनके और गोली चलाने वाले पुलिस वालों के खिलाफ केस चलाने की कसम खाई थी. लेकिन हाइकोर्ट में अब एसआइटी की रिपोर्ट खारिज हो जाने के बाद उनकी पार्टी के लोग कैप्टन के पीछे पड़ गए हैं. सत्ता में लौटने के तुरंत बाद अमरिंदर ने हाइकोर्ट के अवकाश प्राप्त जज रंजीत सिंह की अध्यक्षता में जांच समिति बना दी थी. जज ने रिपोर्ट में पुलिस की गोलीबारी को 'अनुचित' बताया और बादल के शासन के दौरान पुलिस प्रमुख सुमेध सिंह सैनी और अन्य लोगों पर अभियोग लगाया था. इन घटनाओं को लेकर रिपोर्ट में डेरा सच्चा सौदा के पदाधिकारियों की भूमिका पर भी इशारा किया गया था. अतीत में अमरिंदर खुले तौर पर डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम और उनके दामाद व कांग्रेस के पूर्व विधायक हरमिंदर सिंह जस्सी का समर्थन ले चुके थे. डेरा का मालवा के दलित सिखों में व्यापक जनाधार है, शायद इसीलिए रंजीत सिंह की रिपोर्ट चुपचाप दफना दी गई.

हाइकोर्ट के फैसले के बाद एसएडी दावा कर रहा है कि उनका पक्ष सही था लेकिन आम आदमी पार्टी (आप), (सुखदेव) ढींढसा के नेतृत्व वाले एसएडी (डेमोक्रेटिक) और भाजपा जैसी दूसरी विपक्षी पार्टियों के नेता अमरिंदर सिंह पर राजनैतिक खेल खेलने और दोषियों को छोड़ देने का आरोप लगा रहे हैं. 30 अप्रैल को सभी सिख पंथिक गुट—बादल इकाई को छोड़कर—कोटकापुरा में हाइकोर्ट के फैसले की प्रति जलाने के लिए जमा होंगे.

अमरिंदर को जहां राजनैतिक नतीजे का सामना करना पड़ रहा है, वहीं उनके आइजीपी (पुलिस महानिरीक्षक) कुंवर विजय प्रताप, जो एसआइटी के प्रमुख रहे थे, ने इस्तीफा दे दिया है. एसआइटी भंग करते हुए अदालत की विपरीत टिप्पणियों—कि जांच रिपोर्ट आइजीपी की 'काल्पनिक कहानियों' पर आधारित थी और उन्हें इस मामले से हटा दिया जाना चाहिए—के चलते ही आइजीपी ने शायद इस्तीफा दिया. अमरिंदर पर अब बादल परिवार के प्रति 'नरम' होने का आरोप लग रहा है.

पंजाब सरकार के प्रवक्ता ने इन आरोपों को बकवास बताया है और इशारा किया है कि हाइकोर्ट के फैसले को किस तरह ऊपरी अदालतों में चुनौती दी जा रही है और एक नई एसआइटी इस मामले पर काम कर रही है. लेकिन कैप्टन की परेशानियां यहीं खत्म होने वाली नहीं हैं. पार्टी विधायकों, जिनमें कई कैबिनेट मंत्री भी शामिल हैं, ने कांग्रेस आलाकमान से अमरिंदर और उनके दरबारियों की शिकायत की है कि उन्हें सरकारी नीतियों, विकास से संबंधित कोषों से पैसों के भुगतान और राज्य के निकायों में राजनैतिक नियुक्तियों जैसे महत्वपूर्ण मामलों में विश्वास में नहीं लिया जा रहा है.

गुरु ग्रंथ साहिब से बेअदबी के भावनात्मक मुद्दे (साथ में ड्रग के खतरे और भ्रष्टाचार के आरोप) के कारण कांग्रेस और 'आप' ने पंथिक के वोटरों का एक बड़ा हिस्सा अपनी तरफ खींच लिया था. 2019 के आम चुनाव में भी अमरिंदर ने इस प्रभावशाली वोट बैंक का समर्थन हासिल कर लिया था. बेअदबी का मुद्दा फिर कैप्टन की परेशानी का सबब है जब विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं. विरोधियों से संबंध सुधारने की उनकी कोशिशों को भी इससे नुक्सान हो सकता है.

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