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पश्चिम बंगालः दम है तो लगाओ 356

ममता ने नड्डा के काफिले पर हमले को भाजपा की नौटंकी बताकर पल्ला झाड़ लिया है जबकि उनकी पार्टी टीएमसी के कुछ नेता इसे लोगों की नाराजगी बताते हैं

विरोध भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के काफिले पर हमले के खिलाफ कोलकाता में सड़क जाम करते पार्टी कार्यकर्ता विरोध भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के काफिले पर हमले के खिलाफ कोलकाता में सड़क जाम करते पार्टी कार्यकर्ता

तीन दिनों में तीन हमले, उनमें से दो घातक. भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के काफिले पर दक्षिण 24 परगना में पत्थरबाजों ने हमला किया, उत्तर 24 परगना में एक भाजपा बूथ अध्यक्ष पर हमला हुआ जिसमें उनकी जान चली गई और उसी तरह पूर्वी बर्दवान में पार्टी के एक कार्यकर्ता को मार डाला गया. ये सारे हमले तीन दिनों (10-12 दिसंबर) की अवधि में हुए. अगर समाचारों में अनुच्छेद 356 और बंगाल में राष्ट्रपति शासन की संभावना जताई जा रही थी, तो इसके पर्याप्त कारण थे.

लेकिन राष्ट्रपति शासन कब लगेगा और कैसे लगेगा, इस पर जितनी चर्चा मुख्य विपक्षी दल भाजपा में चल रही है, लगभग उतना ही शोर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में भी दिखता है. कई टीएमसी विधायक, जो अपनी पहचान उजागर नहीं होने देना चाहते, ने माना कि पार्टी के हुड़दंगी तत्व नियंत्रण से बाहर हो गए हैं और राष्ट्रपति शासन लागू करना अपरिहार्य हो सकता है. ममता बनर्जी के मंत्रिमंडल के एक मंत्री का कहना है, ''पुलिस का एक तबका बहुत ढीला है, यही वजह है कि गुंडे-बदमाश उत्पात मचा रहे हैं. यहां तक कि मुख्यमंत्री का भी उन पर कोई नियंत्रण नहीं है...हम भाजपा के हाथों में खेल रहे हैं.''

राज्यपाल जगदीप धनखड़ 'भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा' के मामलों को उठाने में बहुत उत्साही रहे हैं, लेकिन पार्टी राष्ट्रपति शासन लगाने के मुद्दे पर विभाजित दिखती है. नड्डा ने कहा कि उनके काफिले पर हमले के बाद भी ''केंद्रीय नेतृत्व राष्ट्रपति शासन की मांग नहीं करना चाहता है.'' लेकिन कैलाश विजयवर्गीय, मुकुल रॉय और बाबुल सुप्रियो जैसे बंगाल इकाई के नेता केंद्र से बार-बार कार्रवाई की मांग करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं. रॉय ने कहा, ''2015 के बाद से हमने 136 लोगों को खो दिया है. मुझे लगता है कि राज्य में लोकतंत्र बहाल करने के लिए अनुच्छेद 356 का तुरंत प्रयोग किया जाना चाहिए.'' विजयवर्गीय को लगता है कि ''केंद्रीय बलों की तत्काल तैनाती'' ही एकमात्र तरीका है जिससे चुनाव प्रचार बिना किसी भय के जारी रह सकता है.

इस बीच, 15 दिसंबर को ममता ने केंद्र को चुनौती दी कि अगर उसमें हिम्मत है तो बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करके दिखाए. तो क्या जितना कोलाहल बाहर दिखता है, वास्तव में खलबली उससे कहीं अधिक है? प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के पूर्व प्राचार्य अमल कुमार मुखोपाध्याय को लगता है कि हिंसक घटनाएं टीएमसी की आंतरिक उथल-पुथल और नेताओं के पार्टी छोड़कर जाने की प्रतिक्रिया है. मुखोपाध्याय कहते हैं, ''टीएमसी अपनी पकड़ गंवा रही है और हाल की हिंसा सिर्फ उनकी हताशा दर्शाती है. पार्टी को शायद लगता है कि राष्ट्रपति शासन उन्हें जीवनदान देगा और ममता के लिए सहानुभूति पैदा करने में मदद करेगा लेकिन भाजपा केंद्रीय नेतृत्व के ममता के इस जाल में फंसने की संभावना नहीं है.''

जादवपुर विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर इमान कल्याण लाहिड़ी को भी लगता है कि भाजपा को माहौल अपने पक्ष में दिख रहा है, ऐसे में निर्वाचित सरकार बर्खास्त करके वह अपनी संभावनाओं को समाप्त नहीं करना चाहेगी. लाहिड़ी कहते हैं, ''केंद्रीय नेतृत्व अनुच्छेद 356 को लागू करने पर सहमत नहीं होगा क्योंकि इससे विपक्ष के उस दावे की पुष्टि होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक तानाशाह हैं.'' वे महसूस करते हैं कि भाजपा यह हो-हल्ला सरकार और अधिकारियों को दबाव में रखने के लिए मचा रही है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि वे किसी को नहीं बख्शेंगे. केंद्र ने सख्ती शुरू कर दी है और तीन आइपीएस अधिकारी जो नड्डा की सुरक्षा के जिम्मेदार थे, को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर वापस बुलाया जा रहा है (इससे राज्य के साथ केंद्र का एक और गतिरोध पैदा हो गया है क्योंकि ममता ने उन अधिकारियों को भेजने से मना कर दिया है.)

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ए.के. गांगुली का कहना है कि बंगाल में स्थिति ऐसी नहीं है जिसे संवैधानिक संकट करार दिया जाए. वे कहते हैं, ''चार महीने में चुनाव होने वाला है और मैं किसी चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकने का कोई कारण नहीं देखता. इसके अलावा, कानून और व्यवस्था का पतन अनुच्छेद 356 को लागू करने के लिए आधार नहीं हो सकता है. शिकायतों की वजहें भी हैं क्योंकि कानून-व्यवस्था संतोषजनक नहीं है.''

इस बिंदु पर, केंद्र-राज्य संबंधों और अनुच्छेद 356 को लेकर 1983 के सरकारिया आयोग के विचारों को ध्यान में रखना बुद्धिमानी होगी, जिसमें कहा गया था कि ''अति संयम से, चरम स्थितियों में जब सभी विकल्प विफल हो जाएं तब राज्य में संवैधानिक मशीनरी को टूटने से रोकने या सुधारने के लिए अंतिम उपाय के उपाय के रूप में'' इसका इस्तेमाल किया जाए. वकील और सीपीएम के राज्यसभा सांसद बिकाश भट्टाचार्जी ने चेतावनी दी कि निर्वाचित शासन को उखाड़ फेंकना लोगों के साथ अच्छा बर्ताव नहीं होगा. वे कहते हैं, ''इसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया होगी, जैसा कि हमने बंगाल में 1968, '70 और '71 में देखा है. जनता की सहानुभूति आमतौर पर चुनी हुई सरकार के साथ होती है.''

ऐसा है, तो भाजपा नेता अनुच्छेद 356 के लिए समर्थन हासिल करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? लाहिड़ी कहते हैं, ''यह ममता से पुलिस और प्रशासन को अलग करने की चाल हो सकती है. हालांकि चुनाव, चुनाव आयोग की कड़ी निगरानी में होते हैं, पर भाजपा को लगता है कि राज्य में तब तक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते जब तक सत्ता की बागडोर टीएमसी के हाथ में रहेगी.''

सैकत भोवाल भाजपा के 'जनसंजोग' कार्यक्रम के लिए प्रचार कर रहे थे, जब उन पर और उनके सहयोगियों पर 11 दिसंबर को उत्तर 24 परगना जिले के हलिसहर में हमला हुआ था. उन्होंने अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया. पुलिस के मुताबिक, इस साल राजनैतिक हत्याओं की संख्या 50 हो गई है और भाजपा का दावा है कि उसके सबसे ज्यादा लोग 'शहीद' हुए हैं. 2020 की अखबारों की रिपोर्ट बताती है कि टीएमसी ने भी कम से कम पांच नेता हिंसा में गंवाए हैं.

उत्तर 24 परगना के एक टीएमसी नेता पूछते हैं, ''भाजपा के एक बूथ लीडर को मारने की क्या जरूरत थी, जब हम दुआरे-दुआरे सरकार (सभी सरकारी सेवाओं को लोगों के द्वार तक पहुंचाने वाला सरकारी कार्यक्रम) के साथ जनता के बीच पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं?'' पार्टी में बहुत से लोगों को लगता है कि हिंसा से जनता हमसे दूर चली जाएगी जैसा 2018 के पंचायत चुनावों के बाद हुआ था. टीएमसी ने पंचायतों की 34 प्रतिशत सीटें 'निर्विरोध' जीतीं थीं, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में यह पार्टी पर भारी पड़ी.

नड्डा के काफिले पर हमले को लेकर दी जा रही प्रतिक्रिया में पार्टी पहले से ही विभाजित नजर आती है: ममता के भतीजे, सांसद और टीएमसी के नंबर-2 अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी के एक वर्ग ने इसे 'भाजपा के खिलाफ लोगों के सहज असंतोष' बताते हुए, सही ठहराया; जबकि ममता की अगुवाई में पार्टी के अन्य समूह ने इसे भाजपा की 'नौटंकी' बताते हुए इस घटना से पल्ला झाड़ लिया. इस बीच, पुलिस ने बीच का रास्ता निकालते हुए इसे छोटी-सी घटना बताया है. पुलिस ने ट्वीट किया: ''उनके (नड्डा के) काफिले को कुछ नहीं हुआ. देबीपुर, डायमंड हार्बर में सड़क किनारे खड़े लोगों ने काफिले के पीछे चल रहे वाहनों पर पत्थर फेंके. हर कोई सुरक्षित और स्थिति शांतिपूर्ण है.'' प्रशासन की प्रतिक्रिया नड्डा के काफिले पर हमले के दिन भवानीपुर में एक रैली में ममता के भाषण के अनुरूप थी जिसमें उन्होंने कहा, ''छोटी सी घटना थी. वे हथियार लेकर आ रहे हैं. खुद पर हमले करा रहे हैं और टीएमसी पर आरोप लगा रहे हैं.''

दरअसल, यह राजनैतिक जिद का खेल है जिसमें टीएमसी और भाजपा निपुण हैं. नड्डा का कथन कि केंद्र राष्ट्रपति शासन की सिफारिश नहीं करेगी चाहे ''राज्य (भाजपा) के नेता जो भी सोचते हों'' और ममता का उसे लगातार राष्ट्रपति शासन लगाने की चुनौती देना, दोनों पक्षों की बातें एक ही सियासी रणनीति का हिस्सा हैं. दुर्भाग्य से, टकराव में दोनों ओर के प्यादों को जान गंवानी पड़ रही है.

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