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शिक्षक भर्ती मामलाः जल उठा राजस्थान

उदयपुर डिविजन में सामान्य श्रेणी के 1,167 शिक्षकों पदों को लेकर एसटी समुदाय के प्रदर्शन से पूरा प्रदेश हिल गया

उपद्रव के निशान प्रभावित इलाकों का दौरान करने गए जनप्रतिनिधि और अधिकारी उपद्रव के निशान प्रभावित इलाकों का दौरान करने गए जनप्रतिनिधि और अधिकारी

राजस्थान में आदिवासी युवकों का, शिक्षकों के सामान्य श्रेणी के 1,167 पदों को उनके समुदाय से भरने की मांग के समर्थन में चल रहा प्रदर्शन हिंसक हो गया. डूंगरपुर जिला 24 सितंबर से इसकी चपेट में है. हिंसा में दो लोगों की जान जा चुकी है और लाखों की संपत्ति का नुक्सान हो चुका है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार इस हिंसा के पीछे माओवादियों का हाथ होने से इनकार नहीं कर रही है. केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्री के अनुरोध पर रैपिड ऐक्शन फोर्स (आरएएफ) की दो टीमें राज्य में भेजी हैं. उपद्रव में 35 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं जबकि डूंगरपुर के एडिशनल एसपी का वाहन प्रदर्शनकारियों ने जला दिया है.  


अफसरों का कहना है कि डूंगरपुर के उदयपुर से सटे खेरवाड़ा इलाके में हालात नाजुक थे. वहां प्रदर्शनकारियों ने उदयपुर को अहमदाबाद से जोड़ने वाले नेशनल हाइवे नंबर 8 में 25 किलोमीटर के हिस्से को कब्जे में लिया था. उपद्रवियों ने 26 सितंबर को खेरवाड़ा में श्रीनाथ कॉलोनी में सामान्य वर्ग के लोगों के 65 घरों पर धावा बोला. इस क्षेत्र में छोटी पहाडिय़ां हैं और तीर-कमान तथा पत्थरों से लैस प्रदर्शनकारी इन पर चढ़कर ट्रैफिक और पुलिस को निशाना बना रहे थे. राजस्थान में आदिवासियों का इलाका राज्य के 200 में से 17 विधानसभा क्षेत्रों में फैला हुआ है और ये क्षेत्र उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और सिरोही में हैं. आदिवासी राज्य के करीब 30 सीटों पर असर रखते हैं. राज्य के दक्षिण में आदिवासी कुछ ज्यादा पिछड़े रह गए क्योंकि पूर्वी राजस्थान की मीणा जनजाति ने राज्य और केंद्र की नौकरियों के करीब पूरे अनुसूचित जनजाति (एसटी) कोटे पर कब्जा जमा लिया.


मौजूदा उपद्रव की जड़ में उदयपुर डिविजन की आदिवासी आबादी के लिए निचले पदों में आरक्षण का मसला है. अप्रैल, 2018 में राज्य सरकार ने ग्रेड 3 के शिक्षकों के 5,431 पदों के भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला. इसमें एसटी के लिए 45 फीसद और अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 5 फीसद पद आरक्षित किए गए तथा इनके लिए 36 फीसद अंकों की योग्यता (अर्हता) रखी गई. अन्य बाकी के पद सामान्य वर्ग के लिए थे और उनके लिए योग्यता 60 प्रतिशत अंकों की थी. जून 2018 में जब रिजल्ट घोषित हुए तो 2,721 सामान्य श्रेणी के पदों में से 965 पदों पर गैर एससी-एसटी वाले चुने गए. साथ ही 589 पद उन आदिवासियों के पास चले गए जो 60 फीसद से अधिक अंक लाए थे.

अब बचे सामान्य श्रेणी के 1,167 पद. पर अपना कोटा भर चुके आदिवासी बाकी बचे पदों को भी आदिवासी उम्मीदवारों से भरने और न्यूनतम योग्यता 60 से घटाकर 36 फीसद करने की मांग की. बीते साल सितंबर में हाइकोर्ट ने उनकी मांग खारिज करते हुए 60 फीसद न्यूनतम अंकों की योग्यता को बरकरार रखा था. आदिवासियों के बेकाबू होने की वजह यही है.


आदिवासी क्षेत्रों में कांग्रेस का मजबूत जनाधार है. भाजपा ने भी अपने अनुषांगिक संगठन वनवासी कल्याण परिषद के जरिये कुछ पैठ बनाई है. दिसंबर, 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के असंतुष्टों से बनी भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) ने मुख्यधारा की इन दोनों पार्टियों को चौंकाते हुए 2 सीटों पर जीत हासिल की और कुछ अन्य सीटों पर कड़ी टक्कर दी. फिलहाल बीटीपी गहलोत सरकार का समर्थन कर रही है. 

 
हिंसा कुछ अन्य क्षेत्रों जैसे-अस्पुर, सगवारा, ऋषभदेव और झडोल में फैल रही है. फिर गहलोत ने शीर्ष अधिकारियों को 26 सितंबर को प्रभावित क्षेत्रों में भेजा. 27 सितंबर को अफसरों ने जनप्रतिनिधियों के साथ उन क्षेत्रों का दौरा किया और उनसे आंदोलन खत्म करने की अपील की. हिंसा प्रभावित 55 क्षेत्रों में पंचायत समितियों के चुनाव टाल दिए गए हैं. डूंगरपुर में 28 सितंबर को हिंसा के खिलाफ बंद रखा गया. हाइवे पर ट्रैफिक खुल गया है पर प्रदर्शनकारी भी किनारे टिके हुए हैं. सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों ने सरकार से प्रदर्शनकारियों के आगे नहीं झुकने और अपनी श्रेणी के लिए योग्यता में कुछ छूट की मांग की है जिससे ये पद भरे जा सकें.

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