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पंजाबः वापसी के लिए बिछती सुखबीर की शतरंज

अकाली दल के लिए बादल के प्रयासों का नतीजा क्या निकलेगा. 10 सितंबर को वे फतेहगढ़ साहिब जिले में कांग्रेस के गढ़ अमलोह से अपने 'गल पंजाब दी' दौरे को फिर से शुरू करने की योजना पर आगे नहीं बढ़ सके

पंथ की राह! सुखबीर बादल 30 अगस्त को माछीवाड़ा (लुधियाना) के गुरुद्वारा चरण कंवल साहिब में पंथ की राह! सुखबीर बादल 30 अगस्त को माछीवाड़ा (लुधियाना) के गुरुद्वारा चरण कंवल साहिब में

शिरोमणि अकाली दल (शिअद) अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने राज्य के 117 में से 100 विधानसभा क्षेत्रों का अपना राज्यव्यापी दौरा 'गल पंजाब दी' 3 सितंबर को रोक दिया. 18 अगस्त से शुरू हुए इस अभियान में केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन से बार-बार व्यवधान पड़ रहा था. बीते 2 सितंबर को मोगा में ऐसी ही एक घटना में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हो गई जिसमें कई लोग घायल हो गए. यात्रा को बीच में रोकते हुए बादल ने राज्यसभा सांसद बलविंदर सिंह भूंडर, पूर्व लोकसभा सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा और शिअद प्रवक्ता मनजिंदर सिंह सिरसा की तीन-सदस्यीय समिति की घोषणा कर दी जो पार्टी को लेकर किसानों के बीच 'गलतफहमियों' को दूर करेगी.

बत्तीस आंदोलनकारी किसान संघों के समन्वित मंच संयुक्त किसान मोर्चा ने 10 सितंबर को चेतावनी दी कि कृषि कानून रद्द होने तक वे राज्य में हर पार्टी की राजनैतिक गतिविधियों का विरोध करेंगे. 2022 के शुरू में होने वाले पंजाब विधानसभा के चुनावों में ये विवादास्पद कानून भावनात्मक मुद्दा होंगे. पिछले सितंबर में भाजपा का साथ छोड़ने के बाद से अकाली नेता बादल इस मुद्दे पर ग्रामीण किसानों के साथ खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं. ग्रामीण किसान अकाली दल से छिटक गए पंथिक मतदाताओं का वह बड़ा हिस्सा हैं जिनका रुख सिख धार्मिक संगठनों के संकेतों से तय होता है.

पंथिक मतदाताओं की अकाली दल से नाराजगी की कई वजहें हैं. मसलन, 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं की जांच में कथित गड़बड़ी और मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध रेत खनन और भ्रष्टाचार में अकाली नेताओं की कथित संलिप्तता. 2017 के विधानसभा चुनाव में शिअद के पंथिक वोटर आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस की ओर गए थे. उग्रवाद के दौर के बाद से विधानसभा में सिर्फ 15 सीटें (अभी 14) हासिल कर पाना पार्टी का सबसे खराब प्रदर्शन था.

पंजाब विधानसभा की स्थिति
पंजाब विधानसभा की स्थिति

पंथिक मतदाता लगभग 72 विधानसभा सीटों पर परिणाम तय करते हैं और बादल अपनी पार्टी के मुख्य पंथिक एजेंडे से भटक जाने की धारणा दूर करने को कड़ी मेहनत कर रहे हैं. इस क्रम में सबसे पहले शिअद ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने के बारे में अपना रुख पलटा. सन् 1973 में अकालियों के आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, जिसमें राज्यों को शक्तियों के हस्तांतरण का आह्वान किया गया था, के बावजूद पार्टी ने संसद में इसके पक्ष में मतदान किया था. इसके बाद शिअद ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) से दूरी बना ली और मुसलमानों को अपने दायरे में लाने की कोशिश की. अकाली परंपराओं की ओर लौटने का भी प्रयास किया गया है. मसलन, पार्टी की बैठकें पांच सितारा होटलों से गुरुद्वारों में स्थानांतरित हो गई हैं.

जब तक पंथिक वोट बैंक वापस नहीं मिल जाता, शिअद के सत्ता में लौटने की संभावना कम है. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के 170 सदस्यीय शासी निकाय के लिए अरसे से लंबित चुनावों का होना मतदाताओं के इस हिस्से पर पकड़ का एक अच्छा संकेत होता. फिर भी अगस्त में दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीएमसी) के चुनाव में मिली जीत ने उसमें कुछ उम्मीद जगाई है. पार्टी ने वहां 46 में से 27 सीटों पर जीत हासिल की.

तीन दशकों में पहली बार ऐसा होगा कि शिरोमणि अकाली दल सुखबीर के पिता और पांच बार मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल की नामौजूदगी में पंजाब का चुनाव लड़ेगी. 93 वर्षीय शिअद संरक्षक सक्रिय राजनीति से हट चुके हैं. सुखबीर ने यह नहीं बताया है कि सीनियर बादल चुनाव लड़ेंगे या नहीं अथवा मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी का चेहरा कौन होगा.

पंजाब विधानसभा की स्थिति
पंजाब विधानसभा की स्थिति

चुनाव से पहले शिअद को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी सुखबीर पर है, जिन्होंने 64 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा करते हुए इस काम की शुरुआत की है. इस पर पंजाब विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर आशुतोष कुमार का कहना है कि ''इससे शिअद उम्मीदवारों को अपने अभियान और संसाधनों की योजना बनाने का समय मिलेगा और बागियों को पार्टी के बाहर अवसर तलाशने का.''

दलित वोटों पर नजरें गड़ाए बादल ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठजोड़ किया है और उसे 20 सीटों की पेशकश की है. बसपा 2017 में लड़ी सभी 111 सीटों पर हार गई थी और कुल वोटों में उसका हिस्सा 1.6 प्रतिशत था. शिअद को उम्मीद है कि इस गठबंधन से उसे ग्रामीण दोआबा और माझा क्षेत्र के कुछ हिस्सों में रविदासी और रामदासी सिखों के बीच बसपा के आधार का लाभ मिलेगा. 2017 के विधानसभा और 2019 के आम चुनावों में दोनों दलित समुदायों ने कांग्रेस का समर्थन किया था. हालांकि, स्वतंत्र विश्लेषकों को इस पर संदेह है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के प्रोफेसर सुरिंदर सिंह जोधका कहते हैं, ''अतीत में बसपा पंजाब में सहयोगियों को अपना वोट हस्तांतरित करने में विफल रही है. 2022 के चुनाव इससे अलग नहीं होंगे.''

बादल ने ऐलान किया है कि शिअद सरकार में दो उपमुख्यमंत्री होंगे—एक दलित और एक हिंदू. पंजाब की तीन करोड़ आबादी में करीब 32 फीसद दलित हैं. इनमें मजहबी सिख (सिख धर्म अपनाने वाले दलित) शामिल हैं. पंजाब में अधिकांश कृषि भूमि पर नियंत्रण रखने वाले जाट सिखों के साथ तनाव के कारण शिअद के मजहबी सिख समर्थकों में असंतोष पैदा हो रहा है. यहां केवल 3.5 प्रतिशत निजी खेत दलितों के हैं.

1961 में पारित पंजाब विलेज कॉमन लैंड्स (रेगुलेशन) ऐक्ट ने गांवों में सामान्य कृषि भूमि का 33 प्रतिशत अनुसूचित जातियों को पट्टे पर देने के लिए आरक्षित किया था. लेकिन जाट सिख कथित तौर पर एवजी लोगों के जरिए ऐसी जमीन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लेते हैं. भाजपा ने कहा है कि वह सुनिश्चित करेगी कि गांवों की अतिरिक्त भूमि भूमिहीन दलित किसानों को मिले. पार्टी ने किसी दलित को मुख्यमंत्री चुनने की प्रतिबद्धता भी जताई है. इस तरह के आश्वासन शिअद की चुनौतियों को और बढ़ा रहे हैं.

सहयोगी के रूप में भाजपा की अनुपस्थिति शहरी इलाकों और हिंदू गढ़ों में शिअद को जरूर चुभेगी. पंजाब में 45 शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में उच्च जाति के हिंदू बड़े पैमाने पर कांग्रेस और भाजपा समर्थक हैं. गठबंधन में रहते हुए इन क्षेत्रों में भाजपा के वोटों के हस्तांतरण से शिअद उम्मीदवारों को फायदा होता था. अलगाव के बाद बादल धार्मिक हस्तियों और भाजपा के पूर्व नेताओं अनिल जोशी और आर.के. गुप्ता तथा कांग्रेस के हंसराज जोसन आदि से संपर्क करते हुए हिंदू समुदाय तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. मालवा इलाके में वे अपनी ही पार्टी के हिंदू नेताओं को भी आगे बढ़ा रहे हैं.

जोशी और गुप्ता के शिअद में शामिल होने से बसपा से मनमुटाव हो गया था. बादल ने एकतरफा रूप से दोनों को क्रमश: अमृतसर उत्तर और सुजानपुर से अकाली दल का उम्मीदवार घोषित किया था. जाहिरा तौर पर दोनों सीटों का वादा बसपा को किया गया था. बदले में बादल ने सहयोगी दल को शाम चौरासी और कपूरथला की सीटें दी हैं.

शहरी मतदाताओं को लुभाने के लिए बादल ने व्यापारियों और उद्योगपतियों के साथ बैठकें की हैं और उनके लिए अलग से घोषणापत्र जारी किया है. किसानों की हड़ताल का असर शहरी इलाकों पर भी पड़ा है. कुछ कॉर्पोरेट घराने कानून-व्यवस्था की समस्या का हवाला देते हुए बाहर निकल गए हैं. ऐसी बदहालियों के लिए बादल अमरिंदर सिंह सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे सत्तारूढ़ कांग्रेस पर घोटालों और राज्य को बिजली संकट में धकेलने का भी आरोप लगाते हैं.

कह नहीं सकते कि अकाली दल के लिए बादल के प्रयासों का नतीजा क्या निकलेगा. 10 सितंबर को वे फतेहगढ़ साहिब जिले में कांग्रेस के गढ़ अमलोह से अपने 'गल पंजाब दी' दौरे को फिर से शुरू करने की योजना पर आगे नहीं बढ़ सके. शिअद नेताओं को उम्मीद है कि देर-सबेर किसान संघ शांत हो जाएंगे और उनके कार्यक्रम रोकना बंद कर देंगे. फिलहाल, बादल का राज्य का 100 दिवसीय दौरा पूरा होना दूर की बात है. अगले साल चुनाव की राह भी कम कठिन नहीं.

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