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असमः बटेंगे बोडो वोट?

असम के बोडोलैंड क्षेत्रीय इलाके में बीपीएफ की मजबूत पकड़, मगर उसे अपने पूर्व सहयोगी और अब प्रतिद्वंद्वी भाजपा से इस बार कड़ी टक्कर मिलने की संभावना.

शांति की खातिर कोकराझाड़ में पिछले साल 27 जनवरी को तीसरे शांति समझौते पर दस्तखत के बाद आयोजन में बोडो नेता हगरामा मोहिलारी और राज्य भाजपा नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शांति की खातिर कोकराझाड़ में पिछले साल 27 जनवरी को तीसरे शांति समझौते पर दस्तखत के बाद आयोजन में बोडो नेता हगरामा मोहिलारी और राज्य भाजपा नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

असम में 2006 से ही बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) सूबे की हर गठबंधन सरकार में हिस्सेदार रही है. 2005 में गठित इस पार्टी ने 2006 से 2016 तक कांग्रेस के साथ सत्ता सुख भोगा. 2016 में विधानसभा चुनावों के ऐन पहले इसने अपने गठबंधन सहयोगी का साथ छोड़ा और भाजपा के साथ हाथ मिला लिए. इस साल फरवरी में, पार्टी ने फिर यू-टर्न लिया और आठ पार्टियों के कांग्रेसनीत गठजोड़ ‘महाजोत’ का हिस्सा बन गई.

हालांकि, बीपीएफ कांग्रेस के साथ है पर केंद्र और राज्य की राजनीति में सत्ता के साथ रहने की अघोषित नीति ने उसे असम की राजनीति का सबसे अप्रत्याशित किंगमेकर बना दिया है. पिछले तीन विधानसभा चुनावों में यह पार्टी बोडोलैंड भू-भागीय क्षेत्र (बीटीआर) में एकमुश्त सीटें जीतती रही है, और मुफीद सौदेबाजी मिलने पर पाला बदल सकती है. 

ऐसे में 2 मई को असम की 126 विधानसभा सीटों के नतीजों के बाद किसका पलड़ा भारी होगा, इस मामले में बीटीआर की 12 सीटें निर्णायक हो सकती हैं. आबादी के गणित के लिहाज से देखें तो महाजोत अजेय दिखता है. बीपीएफ की बोडो समुदाय में मजबूत पैठ है जिनकी बीटीआर की कुल आबादी में 30 फीसद की हिस्सेदारी है.

गैर-आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस इलाके में मुस्लिम आबादी 15 फीसद है, जिसका वोट परंपरा से कांग्रेस और एआइयूडीएफ को मिलता रहा है. इस बार, कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन ने इन 12 सीटों पर सिर्फ बीपीएफ के उक्वमीदवार उतारे हैं, ताकि तीनों पार्टियों के वोट एकमुश्त हासिल किए जा सकें.

पिछले दो विधानसभा चुनावों में बीपीएफ ने इन सीटों पर औसतन 45 फीसद वोट हासिल किया. बीटीआर में कांग्रेस, बीपीएफ और एआइयूडीएफ की वोट हिस्सेदारी करीब 70 फीसद है. यह बीपीएफ की आसान जीत का गणित दिखता है, लेकिन इस बार बोडो समुदाय के वोट में बंटवारे की संभावना से पार्टी को कठिन चुनौती का सामना है. इस बंटवारे को पार्टी के पूर्व गठबंधन सहयोगी भाजपा ने अंजाम दिया है जिसे बीटीआर में बीपीएफ के वर्चस्व की चिंता सता रही है.

दोनों पार्टियों में मतभेद पिछले साल फरवरी में शुरू हुआ, जब भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने तीसरे बोडो समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे बोडो समस्या का ‘आखिरी और संपूर्ण समाधान’ बताया. तकरीबन आधी सदी से असम के मैदान में बसे सबसे बड़ी जनजाति बोडो अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए अलग राज्य या देश की मांग करते रहे थे, जो राज्य की आबादी का 5 फीसद से ज्यादा हैं. 1993 में केंद्र, राज्य सरकार और ऑल बोडो स्टुडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) और बोडो पीपल्स ऐक्शन कमेटी के बीच पहले बोडो समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे.

लेकिन शांति क्षणिक साबित हुई क्योंकि बोडोलैंड लिबरेशन टाइगर्स (बीटीएल) और नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) जैसे उग्रवादी गुटों ने समझौते को नामंजूर कर दिया. 2003 में केंद्र और राज्य सरकार ने बीटीएल के साथ दूसरे बोडो समझौते पर दस्तखत किए. बोडो बहुल चार सटे हुए जिलों को बोडोलैंड क्षेत्रीय स्वायत्तशासी जिलों (बीटीएडी) के तौर पर मान्यता दी गई, यह स्वायत्तशासी निकाय संविधान के छठी अनुसूची के तहत गठित किया गया. इसके बाद, बीटीएल ने हथियारबंद संघर्ष का रास्ता छोड़ कर बीपीएफ का गठन किया और मुख्यधारा की राजनीति में आ गया.

इसके कुछ समय बाद ही एबीएसयू के अध्यक्ष प्रमोद बोरो 2015 में गठित बोडोबहुल सियासी पार्टी यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) में शामिल हो गए. बोरो के जाने से न सिर्फ यूपीपीएल पुनर्जीवित हो गया, बल्कि बीपीएफ के मुखिया हगरामा मोहिलारी की कद्दावर शख्सियत को भी चुनौती मिली. भाजपा ने इसे बीपीएफ के दबदबे पर चोट करने के मौके के तौर पर देखा और बोडो इलाके में आधार बढ़ाने की जुगत में लग गई.

क्या है बीटीआर
क्या है बीटीआर

दिसंबर में बीटीसी के चुनावों में भाजपा ने बीपीएफ से नाता तोड़कर यूपीपीएल के साथ हाथ मिला लिए. हालांकि, बीपीएफ परिषद की 40 में से 17 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी. यूपीपीएल को 12 और भाजपा को 9 सीटें मिलीं, और दोनों ने मिलकर परिषद में निकाय का गठन किया. इससे 2005 से ही सत्ता में रहे बीपीएफ पहली बार सत्ता से हटा. इस बार का विधानसभा चुनाव पहला मौका होगा, जब बीपीएफ बीटीसी सत्ता से बाहर है. यह पहला मौका है जब एनडीएफबी के चारों गुट मुख्यधारा की राजनीति में आ गए हैं. असल में, राज्य में यह पहला चुनाव होगा, जिस पर उग्रवाद का साया नहीं होगा.

भाजपा ने इस इलाके में शांति स्थापना का क्रेडिट लेने में देर नहीं की. सभाओं में शाह बीटीआर के लिए 5,000 करोड़ रुपए के विकास पैकेज का जिक्र जरूर करते हैं, जिसमें 750 करोड़ रुपए 65 योजनाओं के मद में पहले ही स्वीकृत किए जा चुके हैं.  

लेकिन, घटते असर और बढ़ती चुनौतियों के बीच भी इलाके में बीपीएफ की बढ़त है. बीटीसी चुनावों में भाजपा और यूपीपीएल की मिली-जुली ताकत बीपीएफ को पिछले 20 सीटों की बढ़त के मुकाबले तीन सीटों का नुक्सान पहुंचा सकी थी. दरअसल, मुस्लिम आबादी के एक बड़े हिस्से ने भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस या एआइयूडीएफ की बजाए बोडो पार्टी को वोट किया. इससे उत्साहित मोहिलारी दावा कर रहे हैं कि बीपीएफ सभी 12 सीटें जीत लेगी.यह अनोखा घटनाक्रम है, जहां बोडो और मुस्लिम आप्रवासियों के बीच दो दशकों में लगातार संघर्ष होते रहे हैं और 2012 में करीब 100 लोग मारे गए थे.

बोडो के वोटों का गणित
बोडो के वोटों का गणित

हालांकि, सरमा इस गणित को खारिज करते हैं. उनके मुताबिक, भाजपा-यूपीपीएल गठजोड़ चुनावों में जीत दर्ज करेगा. इस गठजोड़ की ताकत गण सुरक्षा पार्टी (जीएसपी) के जुडऩे से बढ़ गई है जिसकी अगुआई नब सरानिया कर रहे हैं जो बीटीआर की एकमात्र लोकसभा सीट कोकराझाड़ का प्रतिनिधित्व करते हैं. पिछले दो आम चुनावों से सरानिया ने बीपीएफ के उम्मीदवार को गैर-बोडो वोटों की वजह से हराया है. विधानसभा चुनाव में सरानिया बरामा सीट से लड़ रहे हैं. 

बोडो और मुस्लिम के अलावा, बीटीआर इलाके में असमिया, बंगाली, कूच राजबोंशी, आदिवासी, राभा और नेपाली शामिल हैं. ये समुदाय इस इलाके में बोडो वर्चस्व के खिलाफ भाजपा-यूपीपीएल गठजोड़ की तरफ मुड़ सकते हैं. जो भी हो, यह तो तय है कि इलाके का नतीजा 2 मई को दिसपुर में अगले दावेदार का भविष्य तय करेगा. ठ्ठ

क्या है बीटीआर?
बोडोलैंड भूभागीय क्षेत्र (बीटीआर) संविधान की छठी अनुसूची के तहत बनाया गया स्वायत्त क्षेत्र है, जो पश्चिमी असम के चार पड़ोसी जिलों—कोकराझाड़, चिरांग, बस्का और उदलगुड़ी—के बोडो लोगों को स्व-शासन का अधिकार देता है. छठी अनुसूची पूर्वोत्तर के कुछ निश्चित आदिवासी इलाकों को राजनैतिक स्वायत्तता और विकेंद्रीकृत राजकाज की अनुमति देती है. मैदानों में बसा आदिवासी बोडो समुदाय असम का सबसे बड़ा अनुसूचित जनजाति समुदाय है, जो राज्य की आबादी का 5 फीसद से ज्यादा है.

बोडो समुदाय के लिए अलग राज्य या देश की मांग करते हुए कई बोडो गुटों ने सशस्त्र संघर्ष किया. क्षेत्र में विद्रोह को समाप्त करने के लिए केंद्र, राज्य और बोडो गुटों के बीच 1993, 2003 और 2020 में तीन समझौतों पर दस्तखत हुए. 2003 के समझौते के बाद उस वक्त बोडोलैंड भूभागीय स्वायत्त जिलों के तौर पर चिन्हित इन चार जिलों में प्रशासन के लिए बोडोलैंड भूभागीय परिषद (बीटीसी) का गठन किया गया. ये चारों जिले 27,000 वर्ग किलोमीटर या असम के कुल क्षेत्र के 35 फीसद हिस्से में फैले हैं.

जनवरी 2020 में तमाम उग्रवादी गुट सशस्त्र संघर्ष छोड़कर मुक्चयधारा में आ मिले. बीटीएडी का नाम बदलकर बीटीआर कर दिया गया. एक समिति बीटीआर की सीमाओं को नए सिरे से तय करने की प्रक्रिया की जांच-पड़ताल कर रही है, क्योंकि कुछ गैर-बोडो इलाके इस क्षेत्र में शामिल कर लिए गए हैं जबकि कुछ बोडो-बहुल इलाके बाहर छोड़ दिए गए हैं. बीटीआर की आबादी में बोडो फिलहाल 27 फीसद हैं. क्षेत्र के दूसरे समुदायों में असमिया, बंगाली, कोच-राजबोंशी, राभा, गारो, आदिवासी, मुसलमान और नेपाली शामिल हैं.

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