scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

बारूदी सुरंग पर सोरेन

झामुमो की अगुआई वाली हुकूमत को अभी तो विधानसभा में बहुमत हासिल है, पर हेमंत के हटने पर पार्टी में उथल-पुथल मच सकती है.

X
डगमग कुर्सी : रांची के गवर्नर हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री सोरेन डगमग कुर्सी : रांची के गवर्नर हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री सोरेन

अमिताभ श्रीवास्तव

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पद पर बने रहने के लिए आने वाले दिनों में कुछ खास कोशिशें करनी होंगी. फिलहाल तो सब कुछ गड़बड़ होता दिख रहा है. एक तरफ उनके ऊपर चुनाव आयोग के नोटिस की तलवार लटकी है, जिसमें पूछा गया है कि सरकार से खनन का पट्टा हासिल करने के लिए क्यों न उन्हें अयोग्य करार दे दिया जाए (पद का लाभ उठाने का आरोप). दूसरी तरफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 11 मई को राज्य की खनन सचिव पूजा सिंघल को गिरफ्तार कर लिया. यह वही अफसर हैं जिन्हें उन्होंने इस विभाग की अगुआई के लिए अगस्त 2021 में खास तौर पर चुना था. चुनाव आयोग ने सोरेन को—जो खनन महकमा भी संभाल रहे हैं—यह बताने के लिए 20 मई तक का वक्त दिया है कि जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 9ए का उल्लंघन करते हुए वे इस पट्टे के मालिक क्यों हैं.

जाहिरा संयोग यह है कि सोरेन को चुनाव आयोग के नोटिस के महज तीन दिन बाद 6 मई को ईडी ने सिंघल के ठिकानों पर छापे मारे, पर इससे राजधानी रांची में साजिश की थ्योरियां गढ़ी जाने लगीं कि केंद्रीय एजेंसियां विपक्ष की निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने में जुट गई हैं. सोरेन की अगुआई में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल की गठबंधन सरकार दिसंबर 2019 में राज्य विधानसभा के चुनाव में भाजपा को धूल चटाकर सत्ता में आई थी.

सोरेन ने छापों को 'गीदड़ भभकी' करार दिया और भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह सरकारी मशीनरी के जरिए राजनैतिक विरोधियों को डराने-धमकाने की कोशिश कर रही है. झारखंड भाजपा के अध्यक्ष दीपक प्रकाश ने यह कहकर जवाब दिया कि यह भ्रष्टाचारी का अजीबोगरीब बचाव है, खासकर तब जब ईडी ने कथित तौर पर सिंघल से जुड़े चार्टर्ड एकाउटेंट सुमन कुमार के घर से 18 करोड़ रुपए से ज्यादा नकदी बरामद की है.

साल 2000 के बैच की आइएएस अधिकारी सिंघल को सोरेन के मौजूदा संकट के संबंध में नहीं, बल्कि धनशोधन के एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया. मगर खनन सचिव होने के नाते सोरेन को दिया गया खनन का पट्टा उनकी जानकारी में रहा ही होगा. साथ ही, कई मौजूदा खनन अफसर (बरामद नकदी के संबंध में) शक के दायरे में हैं, इसलिए ईडी ने जांच का दायरा संभवत: बढ़ा दिया है.

उधर, साजिश की थ्योरी के रोज नए पंख उग आते हैं. ईडी ने सिंघल को हिरासत में लेकर चल रही पूछताछ के बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा, लेकिन भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे ने 'राजा को बरामद धन' से जोड़ने वाले व्हाट्सऐप चैट का जिक्र करते हुए ट्वीट के जरिए जो नई जानकारियां दीं, उनसे हर कोई लपेटे में आ गया. इन अफवाहों ने सोरेन खेमे को और सांसत में डाल दिया कि आइएएस अफसर और उनके पति सरकारी गवाह बनने जा रहे हैं. झामुमो के कार्यकर्ताओं ने रांची में राज्य भाजपा मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन भी किया और आरोप लगाया कि भगवा पार्टी मुख्यमंत्री को बदनाम करने की कोशिश कर रही है. ईडी ने 15 मई को कथित धनशोधन के लिए झामुमो के पूर्व कोषाध्यक्ष रवि जायसवाल से भी पूछताछ की.

चुनाव आयोग ने हेमंत सोरेन के अलावा उनके छोटे भाई तथा विधायक बसंत सोरेन को भी 4 मई को ऐसा ही नोटिस भेजा. वे दो कंपनियों चंद्रा स्टोन वर्क्स और ग्रैंड्स माइनिंग के डायरेक्टर हैं, जो खनन पट्टों की मालिक हैं. आयोग ने मंत्री मिथिलेश ठाकुर की व्यावसायिक गतिविधियों के बारे में भी जानकारी मांगी है. भाजपा के दुबे ने 14 मई को ट्वीट किया कि आयोग ठाकुर को भी नोटिस भेज सकता है.

कानूनी चुनौती
सोरेन के पास खनन और पर्यावरण महकमे हैं, फिर भी उन्होंने रांची के अंगारा ब्लॉक में 0.88 एकड़ के पट्टे का नवीनीकरण करवा लिया. रांची के जिला खनन कार्यालय ने जून 2021 में ग्रेनाइट-नाइस चट्टानों (निर्माण कार्य के पत्थर के तौर पर जाने जाने वाली) की खुदाई के लिए आशय पत्र जारी किया. पर्यावरण की मंजूरियां भी दे दी गईं.

सरकारी वकील राजीव रंजन ने 8 अप्रैल को झारखंड हाइकोर्ट को सूचित किया कि सोरेन ने ''फरवरी 2022 में पट्टा वापस देकर खुद को इससे अलग कर लिया.'' इसी महीने अदालत में पेश एक हलफनामे में सोरेन ने कहा है कि खनन का पट्टा हासिल करने के कृत्य से ''विधायक के रूप में उनका अयोग्य होना अनिवार्य नहीं हो जाता'' और दावा किया कि इस मुद्दे पर जनहित याचिका 'लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने' की कोशिश है. हलफनामे में यह भी कहा गया कि खनन का पट्टा 17 मई, 2008 को 10 साल की अवधि के लिए दिया गया था.

सोरेन का कहना है कि पट्टे के नवीनीकरण के लिए उन्होंने 2018 में आवेदन किया था और उसके खत्म होने पर 2021 में दोबारा आवेदन किया. मुख्यमंत्री ने अपने बचाव में मुख्य दलील यह दी कि उन्होंने खुदाई शुरू किए बिना ही पट्टा लौटा दिया है, लिहाजा कोई मुनाफा नहीं कमाया. झामुमो के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य 'साजिश' का आरोप लगाते हैं और दावा करते हैं कि मुख्यमंत्री ने ''पट्टे की जमीन की घोषणा अपने तमाम चुनाव हलफनामों में की है.''

मगर झामुमो के कट्टर समर्थक भी अकेले में स्वीकार करते हैं कि सोरेन बंधु अयोग्य ठहराए जाने की असल संभावना से घिरे हैं. अच्छी खबर यह है कि झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन को 82 सदस्यों की झारखंड विधानसभा में पूर्ण बहुमत (48 सदस्य) हासिल है, जिसमें एक नामजद सीट भी है. इनमें झामुमो के (सोरेन भाइयों सहित) 30 विधायक हैं, कांग्रेस के कागज पर 17 विधायक (झारखंड विकास मोर्चे के विधायक प्रदीप यादव सहित, जो फरवरी 2020 में पाला बदलकर पार्टी में आए) और राजद का एक विधायक है.

जेवीएम के संस्थापक बाबूलाल मरांडी के पिछली फरवरी में पार्टी में लौट आने के साथ भाजपा के पास 26 का प्रभावी संख्याबल है. मगर प्रदीप यादव और मरांडी के दलबदल को अभी विधानसभा के स्पीकर की मंजूरी नहीं मिली है. ऑल झारखंड स्टुडेंट्स यूनियन (आजसू) के दो सदस्यों के साथ एनडीए के 28 विधायक हैं, जो झारखंड के गद्दीनशीन गठबंधन को चुनौती देने के लिए काफी नहीं हैं.

छवि पर दाग
हेमंत सोरेन झामुमो के संस्थापक शिबू सोरेन के बेटे हैं, जिन्होंने 1970 के दशक में अपने आंदोलन के दिनों में गैर-आदिवासियों के हाथों दमन और अवैध खनन संचालकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. झारखंड के मुख्यमंत्री के पद पर यह उनका दूसरा कार्यकाल है. 46 वर्षीय मुख्यमंत्री अपने पहले कार्यकाल के मुकाबले, जो 18 महीने चला और दिसंबर 2014 में खत्म हुआ, इस बार ज्यादा सक्रिय और आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं, जो आदिवासी समर्थक राजनीति को अच्छे राजकाज के उपायों के साथ समझदारी से मिला रहे हैं. ऐसे में, जब हेमंत अपने पिता की छाया से बाहर आते दिख रहे थे, उन्हें खनन के इस विवाद ने घेर लिया. भट्टाचार्य कहते हैं कि बदतरीन (यानी अयोग्यता की) स्थिति के लिए पार्टी के पास प्लान बी है, पर इस पर विस्तार से उन्होंने कुछ नहीं बताया.

पार्टी के दूसरे सूत्रों का कहना है कि अयोग्य होने के बाद भी सोरेन के पास मुख्यमंत्री बने रहने और अदालतों के दरवाजे खटखटाने का विकल्प है, क्योंकि संविधान (विधानसभा के) गैर-सदस्य को छह महीने के लिए मंत्री बनने की इजाजत देता है. एक करीबी सहयोगी कहते हैं, ''अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो वह एवजी उत्तराधिकारी के तौर पर पिता सोरेन, मां रूपी या पत्नी कल्पना सरीखे परिवार के किसी व्यक्ति को ला सकते हैं.'' झामुमो की अगुआई वाली हुकूमत को अभी तो विधानसभा में बहुमत हासिल है, पर हेमंत के हटने पर पार्टी में उथल-पुथल मच सकती है.

विपक्ष में बैठी भाजपा हेमंत की भाभी और विधायक सीता सोरेन की तरफ भी इशारा करती है, जिन्होंने सरकार को पहले ही चुनौती दे दी है. हेमंत के दिवंगत भाई दुर्गा सोरेन की पत्नी सीता ने पिछले महीने राज्यपाल रमेश बैस को पत्र लिखकर 'भ्रष्टाचार और कुशासन' का आरोप लगाया. सीता खुद को अपने दिवंगत पति का असली वारिस मानती हैं. मई 2009 में पति की असमय मृत्यु के बाद उन्हें ही चुना गया था. लगता है, आने वाले दिन मुख्यमंत्री सोरेन के लिए कठिन हो सकते हैं.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें