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रेत खनन के लिए बदलाव

देखना होगा कि अवैध खनन की समस्या को सुलझाने के लिए चंबल अभयारण्य के कुछ हिस्सों को गैर-अधिसूचित करने का तर्क राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के गले उतरता है या नहीं

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नदी तट का नजारा
नदी तट का नजारा

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के संदर्भ में मध्य प्रदेश सरकार ने अर्थशास्त्र बनाम पारिस्थितिकी की बहस में एक विचित्र रुख अपनाया है. यह मानते हुए कि अभयारण्य में बहने वाली नदी के कुछ हिस्सों में अवैध रेत खनन हो रहा है, सरकार को लगता है कि अगर अभयारण्य के कुछ हिस्से को गैर-अधिसूचित करके वहां खनन की अनुमति दे दी जाए, तो इससे अभयारण्य के बाकी हिस्सों के संरक्षण में मदद मिलेगी. तीन राज्यों—मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश—के तिमुहाने पर स्थित 435 किलोमीटर लंबा अभयारण्य चंबल नदी के मध्य बिंदु से दोनों तरफ एक किमी तक के इलाके में फैला हुआ है और इसका कुल क्षेत्रफल 5,400 वर्ग किमी है. यह गंगा नदी की डॉल्फिन, गर्दन पर लाल धारी वाले कछुए और घड़ियाल जैसे विभिन्न प्रकार के दुर्लभ जलीय जीवों का घर है. अभयारण्य को पहली बार 1978 में मध्य प्रदेश ने अधिसूचित किया, बाद में यूपी और राजस्थान सरकारों ने भी इसे अधिसूचित किया.

दिसंबर 2021 में, मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य में पडऩे वाले अभयारण्य के 292 हेक्टेयर (2.92 वर्ग किमी) को पांच स्थानों—मुरैना और श्योपुर जिलों में दो-दो और भिंड में एक स्थान—पर गैर-अधिसूचित करने का प्रस्ताव दिया है. केंद्र को भेजे प्रस्ताव के जवाब में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थाई समिति, जिसमें भारतीय वन सेवा के पूर्व अधिकारी एच.एस. सिंह और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के सचिव एस.पी. यादव शामिल हैं, ने इस साल जून में उन क्षेत्रों का दौरा किया. एच.एस. सिंह कहते हैं, ''रिपोर्ट को अंतिम रूप दिए जाने तक मैं इस मुद्दे पर स्थाई समिति के फैसले के बारे में कुछ नहीं बोल सकता.'' 

ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी अभयारण्य के कुछ हिस्सों को गैर-अधिसूचित करने की बात उठी है, पर सरकार ने नवीनतम प्रस्ताव के अपने तर्क में अवैध रेत खनन की जमीनी हकीकत को स्वीकार किया है. प्रदेश के मुख्य वन्यजीव वार्डन जे.एस. चौहान कहते हैं, ''रेत की स्थानीय मांग को कहीं से तो पूरा करना ही होगा. कुछ क्षेत्रों में खनन को अनुमति देने के लिए गैर-अधिसूचित करना सही रहेगा, ताकि शेष अभयारण्य को प्रभावी ढंग से संरक्षित किया जा सके.'' सरकार का तर्क है कि अगर कुछ क्षेत्रों को खनन के लिए गैर-अधिसूचित किया जाएगा तो कोई भी बाकी संरक्षित जगहों पर खनन नहीं करना चाहेगा.

सरकार का यह तर्क सबको नहीं पच रहा. इनमें वन्यजीव बोर्ड की पूर्व सदस्य प्रेरणा बिंद्रा भी शामिल हैं. वे कहती हैं, ''अगर सरकार किसी अपराध को नियंत्रित करने में नाकाम है तो इसका उपाय यह नहीं कि उस अपराध को ही वैध बना दिया जाए. इसकी जगह सरकार को अवैध खनन रोकने के लिए ज्यादा मजबूत प्रयास करना चाहिए.'' इस बीच 3 जून को, सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने दोहराया कि किसी अभयारण्य या राष्ट्रीय उद्यान में किसी भी तरह के खनन कार्य की अनुमति नहीं है. इसने यह भी कहा कि अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास एक किलोमीटर के क्षेत्र में अनुमत और निषिद्ध गतिविधियों को लेकर फरवरी 2011 की अधिसूचना का पालन किया जाना चाहिए. 

चंबल अभयारण्य के कुछ हिस्सों के अलावा, मध्य प्रदेश सरकार ने सैलाना और सरदारपुर अभयारण्यों के कुछ हिस्सों को भी गैर-अधिसूचित करने का प्रस्ताव दिया है. शिवपुरी जिले का करेरा अभयारण्य जिसे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के लिए 1980 के दशक में अधिसूचित किया गया था, उसके गैर-अधिसूचित करने की प्रक्रिया पूरी हो गई है. यह देखना होगा कि अवैध खनन की समस्या को सुलझाने के लिए चंबल अभयारण्य के कुछ हिस्सों को गैर-अधिसूचित करने का तर्क राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के गले उतरता है या नहीं. 

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