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खौफ में सियासतदान

खतरा उस वक्त बहुत बढ़ गया जब 8 जुलाई को बांदीपोरा के जिला भाजपा अध्यक्ष वसीम बारी की उनकी दुकान के सामने आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी

एएनआइ एएनआइ

पिछले साल 3 अगस्त को पुलवामा के राजपोरा विधानसभा क्षेत्र के नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के पूर्व विधायक गुलाम मोहिउद्दीन मीर दक्षिण कश्मीर में पार्टी के जिला कार्यालय में शरण लेने को मजबूर हुए थे. उनकी सुरक्षा हटा ली गई थी, जिससे उन्हें उग्रवादियों से जान का खतरा पैदा हो गया था. उनका डर जायज है—वे पूर्व विधायक गुलाम कादिर मीर के बेटे हैं जिनकी अप्रैल 1994 में घर में हत्या कर दी गई थी. आज वे कहते हैं कि उन्हें राजनीति में आने का पछतावा है. ''मैं घर नहीं जा सकता. मेरी जिंदगी और मेरा परिवार, दोनों जोखिम में हैं.''

2016 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उस समय जम्मू-कश्मीर सुरक्षा समीक्षा समन्वय समिति ने 1,890 लोगों को सुरक्षा मुहैया कराई थी. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन तोड़ने और जून 2018 में राज्य में राज्यपाल शासन लागू होने के बाद से कम से कम 919 लोगों की सुरक्षा हटाई गई. एक और नेता जिनकी सुरक्षा वापस ली गई है, वे हैं पीडीपी के यूथ प्रेसिडेंट वहीद-उर-रहमान पर्रा. 2018 तक पर्रा को भाजपा-पीडीपी गठबंधन के समर्थकों में से एक के रूप में देखा जाता था.

गठबंधन के लिए उनकी अहमियत को इस बात से समझा जा सकता है कि जून 2018 में श्रीनगर में जमा 3,000 लोगों की भीड़ के सामने मौजूदा केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उनकी तारीफ की थी. उनके जीवन पर कितना खतरा है, वह इस तथ्य से समझा जा सकता है कि उसी साल अगस्त में उन पर एक जानलेवा हमला हुआ था जिसमें वे बाल-बाल बचे थे. वे कहते हैं, ''पिछले डेढ़ साल से सुरक्षा का इस्तेमाल सियासी हथकंडे के रूप में किया जा रहा है. कुछ लोगों की सरकार के साथ अच्छी बनती है तो उन्हें सुरक्षा मिली हुई है. सरकार के साथ जिनके ताल्लुकात अच्छे नहीं हैं उनकी जान की किसी को फिक्र नहीं.''

पर्रा का कहना है कि सरकार को जम्मू-कश्मीर के नेताओं की सुरक्षा पुख्ता करने के लिए सोचना चाहिए. 8 जुलाई से लोगों में दहशत है, जब स्थानीय पुलिस स्टेशन से कुछेक मीटर की दूरी पर बांदीपोरा के एक प्रमुख भाजपा नेता और जिला प्रमुख वसीम बारी की हत्या स्थानीय आतंकियों ने उनके घर के बाहर ही कर दी. हालांकि बारी को 10 पीएसओ (निजी सुरक्षा अधिकारी) मिले थे लेकिन जब हमला हुआ तो पीएसओ साथ थे ही नहीं. इस चूक के लिए बाद में उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था.

बारी की हत्या से जम्मू-कश्मीर का सियासी तबका खौफ और सदमे में है. दक्षिण कश्मीर के कोकेरनाग के पूर्व मंत्री सैयद अब्दुल रशीद लेफ्टिनेंट गवर्नर जी.सी. मुर्मू से मिलने श्रीनगर गए और उनसे अपनी सुरक्षा फिर से बहाल करने की गुजारिश की है. वे कहते हैं कि खतरा राजनेताओं को काम करने से रोकता है, ''मेरा निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के साथ संपर्क टूट गया है क्योंकि मैं पिछले साल से घर नहीं जा पा रहा हूं. हमारे लोग भी समस्याएं झेल रहे हैं—लेकिन अगर हम घर नहीं जाएंगे तो वे हमसे कैसे मिल पाएंगे?''

हालांकि उत्तरी कश्मीर के बारामूला, बांदीपोरा और कुपवाड़ा जिलों के भाजपा के प्रभारी मुदस्सर अहमद वानी का कहना है कि सरकार ने पार्टी कार्यकर्ताओं की सुरक्षा की मांग पर फौरन प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने 12 जुलाई को भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव के सामने यह मुद्दा उठाया था, जब बारी की हत्या के बाद वे शोक जताने घाटी आए थे. वानी कहते हैं, ''यहां तक कि जो लोग हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं, उन्हें सुरक्षित आवास और सुरक्षा दी गई है. सरकार ने हमारे पदाधिकारियों की एक सूची हमसे ली है और हमारे कार्यकर्ता अब खतरे में नहीं हैं.''

बेशक भाजपा कार्यकर्ता खुद को सुरक्षित महसूस कर सकते हों पर दूसरे राजनेताओं को ऐसा महसूस नहीं होता. सुरक्षा मुहैया कराने में इस भेदभाव पर सरकार के पास कोई जवाब नहीं है. एक शीर्ष पुलिस अधिकारी और सुरक्षा समीक्षा समन्वय समिति के सदस्य का कहना है कि सभी को सुरक्षा मुहैया करना असंभव है. वे कहते हैं, ''केवल उन लोगों को सुरक्षा दी जाएगी जिनके लिए वाकई खतरा हो.'' एक अन्य का कहना है, ''सुरक्षा से जुड़ा काम गृह विभाग के प्रमुख सचिव का दफ्तर संभालता है और एक समिति है जो यह तय करती है कि किसे किस स्तर की सुरक्षा दी जाएगी.'' इस पर प्रतिक्रिया के लिए गृह विभाग के प्रमुख सचिव शालीन काबरा से संपर्क करने के प्रयास किए गए पर उनकी तरफ से कोई जवाब न मिला.

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