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बीजेपी के सोशल इंजीनियर बने संजय पासवान

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अब तक इसी हुनर में माहिर थी कि जिन राष्ट्रीय नेताओं के दिवंगत होने के बाद उन्हें उनकी पार्टी या विचारधारा न पूछ रही हो, उन्हें चुपके से अपने पाले में दिखा दो. बीजेपी के मामले में सरदार पटेल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मामले में सरदार भगत सिंह इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं.

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अब तक इसी हुनर में माहिर थी कि जिन राष्ट्रीय नेताओं के दिवंगत होने के बाद उन्हें उनकी पार्टी या विचारधारा न पूछ रही हो, उन्हें चुपके से अपने पाले में दिखा दो. बीजेपी के मामले में सरदार पटेल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मामले में सरदार भगत सिंह इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं.

लेकिन अरसे बाद बीजेपी में वापस आकर पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चे के अध्यक्ष बने 52 वर्षीय संजय पासवान ने तो सीधे बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के संस्थापक मान्यवर कांशीराम की विरासत पर ही हाथ साफ कर दिया है. नई दिल्ली में 11, अशोक रोड स्थित बीजेपी मुख्यालय में पासवान की कुर्सी के ठीक ऊपर कांशीराम की तस्वीर पूरे सम्मान से टंगी है और पार्टी के दलितों को कांशीराम से प्रेरणा लेने में कोई संकोच नहीं है.

यह तस्वीर आपने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को बताकर टांगी थी या टांगने के बाद बताया था, इस सीधे सवाल पर पासवान का जवाब था, ‘मेरी पार्टी जानती है कि मेरा काम करने का तरीका अलग है. तस्वीर टांगने के बाद मैंने पार्टी अध्यक्ष को इसकी जानकारी दी और उन्होंने इसका स्वागत किया.’ हालांकि वे यह नहीं बता सके कि इस तस्वीर के राष्ट्रीय अध्यक्ष के कक्ष और पार्टी के मुख्य मंचों पर पहुंचने में कितना वक्त लगेगा. बिहार के दलित नेता अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में राज्य मंत्री रहे पासवान का चतुर जवाब सुनिए: ‘अभी पार्टी के एक कोने में तस्वीर आई है, आगे पूरा क्षितिज खुला है.’

बीजेपी को लग रहा है कि 2014 के चुनाव में उसके पास वाकई असली मौका हो सकता है. ऐसे में जो भी संभावित वोटर है, उसे अपने साथ जोडऩे के लिए कोई कोर-कसर न छोड़ी जाए. दलित वोटर अब तक बीजेपी की कमजोर कड़ी साबित होता रहा है. एक समय में बंगारू लक्ष्मण को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने अपने दलित एजेंडे को ऊंचाई पर पहुंचाया था, लेकिन बंगारू के पतन के साथ सिलसिला थम सा गया.

बीजेपी की निगाह एक ऐसी सोशल इंजीनियरिंग पर है, जहां दलित वोटर को हिंदुत्व के नाम पर ही अपने साथ लाया जाए. बीजेपी गाहे-बगाहे यह मुद्दा उठाती रहती है कि जो दलित हिंदू हैं उन्हें ही आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. ईसाई या मुसलमान हो गए दलितों को यह लाभ न मिले. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का विरोध करने का भी बीजेपी का यही आधार है. पासवान बेहिचक स्वीकार करते हैं कि कांशीराम के समर्थक दलितों का एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो मायावती से असंतुष्ट है. बीजेपी उसी तबके के लिए नया स्पेस तैयार कर रही है.

दरअसल पासवान नितिन गडकरी के अध्यक्षीय कार्यकाल में तय हुए उस एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसमें 16 फीसदी दलित वोटर को पार्टी के साथ जोडऩे का लक्ष्य तय किया गया था. जाहिर है, किसी वर्ग को अपने साथ जोडऩे के लिए उसके नायकों को अपना नायक घोषित करना भारतीय राजनीति की पुरानी अदा है.

पासवान के दफ्तर में कांग्रेस के दिग्गज नेता और मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के पिता बाबू जगजीवन राम का चित्र भी सुशोभित है. दलित मेधा के रूप में एक और कांग्रेसी, पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन का चित्र भी देख सकते हैं आप. यहां किसी ऐसे दलित महापुरुष का चित्र नहीं मिलेगा आपको, जिसकी जड़ें बीजेपी, उसकी साथी संस्थाओं या संघ परिवार में हों. ये चारों नेता आंबेडकर, कांशीराम, जगजीवन राम और नारायणन क्रमश: पश्चिम, उत्तर, पूर्व और दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका अपने आप में एक राजनीतिक निहितार्थ है.

पार्टी अगले चरण में दलित महिलाओं, दलित कर्मचारियों, दलित उद्यमियों और दलित संस्थानों के साथ संवाद कायम करेगी. इस काम के लिए कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जा रहा है. छोटे-छोटे सम्मेलनों की शृंखला पूरी करने के बाद पार्टी का अल्पसंख्यक मोर्चा दिल्ली में इन चारों वर्गों का बड़ा सम्मेलन आयोजित करेगा.

रणनीति तो अच्छी है और इस पर कांशीराम की छाप भी है, जिन्होंने अपने आंदोलन को दलित कर्मचारियों को साथ लाने पर फोकस किया था. लेकिन शहरी आधार वाली पार्टी गांव में रहने वाले 80 फीसदी दलितों तक कैसे पहुंचेगी. गांव की मिट्टी पर पंजे की छाप तो दिखती है, क्या नई सोशल इंजीनियरिंग से वहां के पोखर में कमल भी खिलेगा?

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