scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

दीदी के गढ़ में दरकती भाजपा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बंगाल दौरा ऐसे वक्त पर हो रहा है जब वहां भाजपा का मनोबल काफी गिर चुका है

X
घटती एकजुटता : 'लोकतंत्र स्थापना' के लिए कोलकाता में रैली निकालते भाजपाई घटती एकजुटता : 'लोकतंत्र स्थापना' के लिए कोलकाता में रैली निकालते भाजपाई

अगर पश्चिम बंगाल में सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से भी ज्यादा परेशानी में कोई सियासी संगठन है तो वह है नई विपक्षी पार्टी—भारतीय जनता पार्टी (भाजपा). दोनों की ताकत, कमजोरी, संभावनाओं और चुनौतियों की तुलना कर लें. टीएमसी के पास मुसीबतों की कमी नहीं है: सीबीआइ जांच के कई मामले जिसमें उसके नेता और प्रशासन शामिल हैं, अराजकता की धारणा, उसके नेताओं के बीच खुलेआम आपसी लड़ाई. फिर भी नेतृत्व पकड़ बनाए हुए है और उत्साह हमेशा बरकरार रहता है. इसके विपरीत भाजपा की बंगाल इकाई संगठनात्मक सड़ांध से घिरी हुई लग रही है और इससे जिस तरह वह निपट रही है, उसकी दिशाहीनता का पता चलता है.

हालिया उपचुनावों में भाजपा ने अपने वोट प्रतिशत का करीब 25 फीसद गंवा दिया. आसनसोल जैसा उसका गढ़ भी आठ साल बाद उसके हाथ से फिसल गया. यह उपचुनाव भाजपा के लिए जरूरी हो गया था क्योंकि उसके स्टार-सांसद बाबुल सुप्रियो पार्टी छोड़कर टीएमसी में शामिल हो गए थे (और उन्होंने टीएमसी के लिए बालीगंज विधानसभा सीट जीत ली). असल में यह छोटा-सा झटका है: एक अन्य सांसद के भाजपा को छोड़कर जाने की अफवाह है, और कम-से-कम सात विधायक पहले ही जा चुके हैं. मार्च में नगर निकाय चुनावों में पार्टी के हाथ खाली रहे. ये सभी गहन संगठनात्मक परेशानी के ऊपरी लक्षण हैं: एक हतोत्साहित खेमे में नेतृत्व के खिलाफ गहरी नाराजगी है और खुलेआम अंदरूनी झगड़े के साथ शीर्ष स्तर पर भी व्यापक असंतोष है. क्या केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल भाजपा को छोड़ दिया है? पार्टी के बैरकपुर से सांसद अर्जुन सिंह ऐसा मानते हैं.

अर्जुन सिंह ने इंडिया टुडे से कहा, ''अगर भाजपा चाहे तो ऐसी कोई चीज नहीं है जो वह न कर सके. उन्हें महाराष्ट्र में देखिए, देखिए मध्य प्रदेश में क्या किया और राजस्थान में क्या करने की कोशिश कर रहे हैं. फिर वे बंगाल में बेकार क्यों बैठे हैं? तब आपने गौतम अडानी को बंगाल ग्लोबल समिट (20-21 अप्रैल को) में भाग लेते हुए देखा. आपको इन संकेतों को समझना होगा.'' उनका कहना है कि पार्टी आलस और लडऩे की इच्छाशक्ति की कमी से जूझ रही है. नई दिल्ली के नीतिगत रुख से भी कोई मदद नहीं मिली: अर्जुन सिंह ने केंद्र की जूट नीति और कच्चे जूट पर 6,500 रुपए प्रति क्विंटल की सीमा का विरोध किया है. उनके मुताबिक यह उद्योग को खत्म कर रहा है. उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर उनके हस्तक्षेप की मांग की है.

ऐसे निराशा के माहौल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बंगाल दौरा इस हफ्ते सामने आया है—यह 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद उनका पहला दौरा होगा. उनका मकसद स्थानीय इकाई को प्रोत्साहित करना है, लेकिन इसके लिए वास्तव में कुछ कर दिखाने की जरूरत है. उसकी सुस्ती को देखना होगा जिससे वह त्रस्त है. पिछले 11 महीनों में बंगाल में टीएमसी, उसके नेताओं और प्रशासन के खिलाफ कई तरह के आरोप सामने आए—चुनावों के बाद हिंसा, बलात्कार और हत्या के मामले, बोगतुई नरसंहार और शिक्षा विभाग में घोटाला. सभी मामलों में भाजपा ने बहुत ही कमजोर प्रतिक्रिया दी. भाजपा के एक नेता कहते हैं, ''एक महीने तक राज्य की कानून और व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी...फिर भी भाजपा कोई जन आंदोलन नहीं खड़ा कर पाई या देश का ध्यान इस ओर नहीं खींच पाई. ममता विपक्ष में होतीं तो अब तक पीडि़तों के शवों का प्रदर्शन कराकर जीवन ठप कर देतीं.'' असल में केंद्रीय नेताओं की अगुआई में फैक्ट-फाइंडिंग टीमों ने घटनास्थल का दौरा किया और स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए, लेकिन एकजुटता से ताकत का प्रदर्शन नहीं किया गया.

इस निष्क्रियता और जड़ता की एक बुनियादी वजह यह है कि बंगाल भाजपा विभिन्न खेमों में बंटी हुई है और इसके शीर्ष नेता एक-दूसरे को देखना पसंद नहीं करते. पार्टी के एक नेता बताते हैं, ''वे आपस में लड़ने में ही सारी ऊर्जा लगा रहे हैं. ऐसे में वे टीएमसी से कैसे लड़ पाएंगे?'' ममता ने जब भाजपा की जबरदस्त चुनावी घेराबंदी करके भाजपा को मई 2021 में पस्त कर दिया तो भाजपा की चुनौती देने वाली टुकड़ी में दरारें दिखने लगी थीं. खासकर, भाजपा के वरिष्ठ नेता तथागत राय और तत्कालीन राज्य भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष के बीच तीखे शब्दबाण चले थे. घोष की जगह फिर बालुरघाट के सांसद सुकांत मजूमदार को सितंबर, 2021 में राज्य इकाई का प्रमुख बनाया गया, लेकिन उससे पहले काडर के मनोबल को काफी नुक्सान पहुंच चुका था.

नए प्रमुख ने फिर से व्यवस्था कायम करने की कोशिश की: उन्होंने नई राज्य समिति बनाई, जिला इकाई अध्यक्षों की नई सूची का ऐलान किया और पार्टी के विविध प्रकोष्ठों में बदलाव किए. लेकिन कई वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज किया गया, नतीजतन उथल-पुथल देखने को मिली. घोष, रितेश तिवारी और सयांतन बसु सरीखे नेता इस पीढ़ीगत बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. 2019 से पहले भगवा खेमे में लाया गया मतुआ जाति समूह भी इन निकायों में अपने कम प्रतिनिधित्व और नागरिकता संशोधन अधिनियम को लागू करने में केंद्र की सुस्ती की वजह से नाराज है.

इसके अलावा विपक्ष के नेता और टीएमसी से भाजपा में आए सुवेंदु अधिकारी के बहुत ताकतवर होने से कई ऐसे नेता नाराज हैं जो वर्षों से पार्टी के साथ हैं. सुवेंदु का समर्थन करके केंद्रीय नेतृत्व ने अनजाने में एक नए विभाजन को बढ़ावा दे दिया है. सुवेंदु एक समानांतर सत्ता केंद्र चलाते हैं और उन नेताओं को अपने साथ रखते हैं जो 2021 के चुनावों के पहले भाजपा में शामिल हुए थे और विधानसभा में निशाना साधते हैं. विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के बाद ऐसे कई 'नए' भाजपा नेताओं के पलायन ने पुराने वरिष्ठ नेताओं को सही में सतर्क कर दिया है. कलकत्ता विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र विभाग के सेवानिवृत्त अध्यक्ष सोवोनलाल दत्ता कहते हैं, ''मूल भाजपा और तृणभूल से बनी भाजपा का मेल कभी भी जीवंत नहीं हो सकता. यह जरूरत का मेल था और इसको खत्म होना ही था. पलायन स्वाभाविक है. पलायन करने वाले अधिकतर करियर राजनेता हैं...यहां उनका कोई भविष्य नहीं है.''

अड़ियल और आपस में लड़ रहे नेताओं ने भ्रम फैला दिया है, लेकिन भाजपा काडर भी पार्टी छोड़ रहे हैं. खासकर वे जिन्होंने कथित रूप से टीएमसी की हिंसा का सामना किया था और 2021 के चुनाव के बाद खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं. उत्तर 24 परगना के एक किसान जिन्हें 30,000 रुपए का जुर्माना देना पड़ा था और अपने इलाके में प्रवेश के लिए जॉब कार्ड सरेंडर करना पड़ा था, कहते हैं, ''हमें टीएमसी के सामने सरेंडर करना पड़ा और छिपने की बजाए जुर्माना देना आसान और सुरक्षित था. हमें उम्मीद थी कि नेता हमारे साथ खड़े होंगे, लेकिन...कोई नहीं आया, यहां तक कि स्थानीय सांसद भी गायब रहे.''

इसके अलावा भाजपा का असल विकल्प—हिंदुत्व के आडंबरपूर्ण दावे से इतर—होने का दावा भी संकट में है. उत्तर बंगाल के एक वरिष्ठ भाजपा नेता कहते हैं, ''केंद्रीय एजेंसियां विभिन्न घोटालों के मामले में टीएमसी के कुछ कद्दावर नेताओं पर शिकंजा कसने के करीब थीं, लेकिन उन्हें रहस्यमय तरीके से छोड़ दिया गया. नारद घोटाले के आरोपी को विपक्ष का नेता बनाना भाजपा की सबसे बड़ी गलती थी.'' कुल मिलाकर, भाजपा ने कड़ी मेहनत से हासिल अपनी बढ़त को गंवा दिया है. अमित शाह को अब कड़ी मशक्कत करनी होगी.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें