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चक्रवातों से जूझकर अब चोटी पर

इंडिया टुडे राज्यों की दशा-दिशा ओडिशा अवार्ड राज्य के बदलाव की दिशा में अनोखे सफर की करते हैं साफ-साफ तस्दीक

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(बाएं से बैठे हुए) इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, और ओडिशा सरकार के मुख्य सचिव सुरेश महापात्र के साथ इंडिया टुडे राज्यों की दशा-दिशा ओडिशा 2022 में श्रेष्ठ जिला अवार्ड विजेता (बाएं से बैठे हुए) इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, और ओडिशा सरकार के मुख्य सचिव सुरेश महापात्र के साथ इंडिया टुडे राज्यों की दशा-दिशा ओडिशा 2022 में श्रेष्ठ जिला अवार्ड विजेता

आखिर ओडिशा 1999 में महा चक्रवात से तबाही के दिनों से काफी आगे निकल आया है जब कटक के 25 वर्षीय जिला कलेक्टर प्रदीप जेना (अब 48 बरस के अतिरिक्त मुख्य सचिव, राजस्व और आपदा प्रबंधन) लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने और बिजली व्यवस्था बहाल करने के लिए इधर-उधर भागदौड़ कर रहे थे. आज, यह देश का पहला राज्य है, जहां अपना स्वतंत्र ओडिशा आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और उसकी अपनी फौरी कार्रवाई टीम है. वाकई, उसकी विशेषज्ञता ऐसी है कि वह दूसरे राज्यों को तूफान और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से निबटने में मदद करता है. ओडिशा अब गर्व से कह सकता है कि 2021-22 में उसकी जीएसडीपी 10.1 फीसद है जबकि राष्ट्रीय जीडीपी 8.8 फीसद है. यानी विकास की तेज रफ्तार पर बढ़ चला है. एक वक्त यह बीमारू राज्य कहलाया करता था, लेकिन उसने लंबी छलांग लगाई है. आज यह देश के दूसरे राज्यों के लिए खासकर आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, उद्योग और महिला सशक्तीकरण में रोल मॉडल बनकर उभरा है.

यह कामयाबी काफी पसीना बहाने, मेहनत और लगन से हासिल हुई है और इसीलिए यह ज्यादा मीठी है. मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने जब दो दशक पहले गद्दी संभाली थी, तब की अप्रिय यादों को वे पीछे छोड़ आए हैं. उन्होंने अपने चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ कहा, ''विकास रुक गया था और ओडिशा  बुरी वजहों से खबरों में छाया हुआ था.'' 

लेकिन मुख्यमंत्री लोगों की आकांक्षाओं पर खरे उतरने को प्रतिबद्ध थे, जिन्होंने उनमें अपना विश्वास जताया था. इसलिए उन्होंने पूरे फोकस और निश्चय के साथ भगीरथ कार्य शुरू किया. बाकी तो इतिहास है. दो दशकों बाद पटनायक की जीत की संभावनाएं बेहतर ही हुई हैं और राजनैतिक विरोधी धूल में मिल गए हैं. कामयाबी की वजहें साधारण-सी हैं, वे कहते हैं कि जन केंद्रित प्रशासन और पांच टी-ट्रांसपरेंसी, टीम वर्क, टाइमलीनेस, टेक्नोलॉजी और ट्रांसफॉर्मेशन—पर फोकस. इंडिया टुडे की ओडिशा राज्य की दशा-दिशा 2022 की रिपोर्ट बदलाव की इस कहानी की पुष्टि करती है, जो प्रमुख मार्केटिंग रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन मार्केटिंग ऐंड डेवलपमेंट रिसर्च एसोसिएट्स (एमडीआरए) के साथ तैयार की गई है.

भुवनेश्वर में 29 अप्रैल को आयोजित इंडिया टुडे राज्य की दशा-दिशा कॉन्क्लेव ओडिशा 2022 में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने पटनायक की ''अराजकता के बीच ब्रह्मांड को कायम रखने में मददगार शांत-चित्त'' शख्सियत कहकर सराहना की. वे नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों का हवाला दे रहे थे, जब बार-बार आ रही प्राकृतिक आपदाओं ने ओडिशा की वित्तीय हालत अराजक बना दी थी. चेंगप्पा ने कहा, ''ओडिशा की आपदा प्रबंधन की अनोखी व्यवस्था और समाज कल्याण तथा प्रशासन में 5-टी स्टाइल के प्रबंधन के साथ उद्देश्य प्रेरित रवैए ने बदलाव की पटकथा लिखने में मदद की.''
कॉन्क्लेव में बांटे गए श्रेष्ठ जिला अवार्ड ऐसे मुख्य पहलुओं पर आधारित थे जिनसे लोगों की जिंदगी और जिले के विकास में फर्क दिखता है.

जिलों के कामकाज को 12 मुख्य पैमाने पर नापा गया—सकल, अर्थव्यवस्था, इन्फ्रास्ट्रक्चर कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, स्त्री शिक्षा, आंत्रप्रेन्योरशिप, कौशल विकास, डिजिटल कवरेज, और स्वच्छता. एमडीआरए के डेटाबेस और भरोसेमंद डेटा के संभावित स्रोतों की व्यापक समीक्षा रिसर्चरों, समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों और सांख्यिकीविदों की एक टीम ने की. श्रेष्ठ प्रदर्शन वाले जिलों का आकलन करने के लिए कुल 112 संकेतक तय किए गए, जबकि सर्वाधिक सुधार वाले जिले के लिए 81 संकेतक तय हुए. ये संकेतक अकादमिक जगत, नीति-निर्माताओं और नीतियों पर असर डालने वालों की विशेषज्ञ राय के मुताबिक थे.

ओडिशा अब देश में सबसे तेज विकास वाला राज्य ही नहीं है, बल्कि निकट भविष्य में वह 60 खरब रुपए की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य की ओर भी बढ़ रहा है. यह संभव भी दिख रहा है क्योंकि राजनैतिक रूप से लगातार स्थिर सरकार, पुख्ता इन्फ्रास्ट्रक्चर, बाजार केंद्रित नीतियां और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है. कच्चे प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य संवर्धन से खनन राजस्व में 300 फीसद की बढ़ोतरी हुई है. हुनर विकास और लगातार अपग्रेड करने की योजनाओं के जरिए मानव संसाधन विकास पर जोर की वजह से युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ी है, जो राज्य की आबादी में 50 फीसद हैं.

मुकम्मल बदलाव के लिए हुनर में इजाफा ही ओडिशा कौशल विकास प्राधिकरण की कोशिश और लक्ष्य है. उसके पास रोजगारपरक कौशल विकास के लिए हाइटेक वर्ल्ड स्किल सेंटर भी है. आज ओडिशा देश में करीब 11 फीसद कुशल कार्यबल का योगदान कर रहा है. पिछड़े इलाकों में मॉडल डिग्री कॉलेज और हर ब्लॉक में सरकारी अंग्रेजी माध्यम स्कूल की स्थापना करके ओडिशा अब जनसंख्यागत खाई को भी पाटने का लक्ष्य बना रहा है, ताकि राज्य के हर क्षेत्र का विकास एक समान हो.

कानून-व्यवस्था और महिला सशक्तीकरण के मामले में ओडिशा को जूफ्रेस फूड्स की संस्थापक अंबिका सत्पथी से सराहना हासिल हुई है. कहने की जरूरत नहीं कि ओडिशा में कई स्टार्ट-अप की मुखिया महिलाएं हैं. मिशन शक्ति के जरिए महिलाओं पर पटनायक सरकार का फोकस बहुचर्चित है और अब उनके हुनर में अधिक से अधिक इजाफे की कोशिश हो रही है, ताकि वे राज्य के विकास की गाड़ी पर सवार हो सकें और अपनी विकास यात्रा से योगदान कर सकें.

बेशक, तमाम सकारात्मक बातों के बावजूद ओडिशा में अभी सब कुछ हरा-हरा नहीं है. नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 30 फीसद लोग अभी भी बीपीएल कैटेगरी (गरीबी रेखा के नीचे) में हैं, 60 फीसद अभी भी स्वच्छ ईंधन (रसोई गैस) से दूर हैं और कई जगहों पर साफ-सफाई और स्वच्छता का स्तर बुरा है. विडंबना यह है कि खनिज संपदा के मामले में राज्य का सबसे धनी जिला भी गरीबी के मामले में सबसे गरीब है. केंदुझर जिला देश के खनिज खाते में 21 फीसद का योगदान करता है लेकिन वहां गरीबी 62 फीसद जितनी ऊंची है.

शहरी गरीबों को सुरक्षित पेयजल देने के मामले में ओडिशा ने महात्वाकांक्षी योजना बनाई है. इसके तहत न सिर्फ हर घर को पाइपलाइन से पानी का कनेक्शन दिया जाएगा, बल्कि पाइपलाइन से सुरक्षित पेयजल को बुनियादी अधिकार में शामिल किया जाएगा. यानी सुरक्षित पेयजल पाने का अधिकार हर किसी को होगा. वाकई, पुरी हर घर को चौबीसों घंटे पाइपलाइन से पानी मुहैया कराने वाला देश का पहला शहर बन गया है.

कला और संस्कृति के मामले में भी ओडिशा को नई पेशकश करने की जरूरत है. नए सिरे से पैकेजिंग, नई ब्रांडिंग और अच्छी मार्केटिंग से राज्य की खोई विरासत को हासिल करने में मदद मिलेगी. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता नील माधव पांडा को अपनी मास्टरपीस फिल्म आइ एम कलाम की लागत की भरपाई में दस साल लग गए.

मिथकों, संस्कृति और मंदिर वास्तुकला की समृद्ध विरासत से भरापुरा ओडिशा कभी भी अपनी धार्मिक मान्यताओं या आदर्शों को लेकर उतवाला नहीं हुआ. बहुलतावाद, दूसरों के लिए सम्मान और सौहार्द ही ओडिशा को हजारों भावनाओं और विचारों की कलाभूमि बनाता है. राज्य की सामाजिक बनावट में धर्मनिरपेक्ष धागे गहरे पिरोए हुए हैं.

मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) के मुख्य सलाहकार आर. बालकृष्णन जैसा बताते हैं, ओडिशा उष्णकटिबंधीय आलंकारिक वर्षावन है, हरेभरे वनों, जानवरों, पक्षियों, मधुमक्खियों, कीट-पतंगों और मनुष्यों का खुशनुमा संगम है, ऐसा वातावरण जहां विचार और पहचान समृद्ध होती है, अतीत में खो नहीं जाती.

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