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राजे से राजस्थान बचाने की जुगत

मुफ्त के उपहारों से लैस राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बीजेपी की वसुंधरा राजे से मुकाबला करने के लिए तैयार है. उन्हें अपनी इस दरियादिली से फायदे की उम्मीद.

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल का ज्यादातर हिस्सा अपनी सरकार की खामियों और अपनी ही पार्टी के लोगों की ऊल-जुलूल हरकतों से निबटते हुए बीता. बाकी वक्त बीजेपी की मुख्यमंत्री पद की संभावित उम्मीदवार वसुंधरा राजे की परछाईं का पीछा करते हुए गुजरा. पर अब बहुत हुआ.

देर से ही सही, अपनी सरकार की गलतियों को दुरुस्त करने के लिए उन्होंने अभियान चला दिया. गहलोत ने एक लोकलुभावन बजट पेश किया और लगभग 5,000 करोड़ रु. की अनुमानित लागत के मुफ्त उपहार इस उम्मीद में लुटा दिए कि 1 दिसंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव में वोटों की फसल से यह पैसा वसूल हो जाएगा.

वे कहते हैं, ‘‘मैंने सब कुछ कर दिया. आप हमारे माई बाप हैं. हम और भी बहुत कुछ करेंगे.’’ उन्हें और कांग्रेस पार्टी को उनकी इस दरियादिली का फायदा मिल भी सकता है.

कांग्रेस किसी भी हालत में प्रदेश की सत्ता हाथ से जाने नहीं देना चाहती. पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी इस लिहाज से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं. दिल्ली के हरियाणा स्टेट गेस्ट हाउस में स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष अजय माकन और उनकी टीम जब बैठी तो टिकटार्थियों की 4,000 नामों से भी लंबी सूची में से संभावित उम्मीदवारों को छांटने में यही कोई 50 घंटे लग गए.

गहलोत का दावा है कि करीब 300 संभावित उम्मीदवारों की आखिरी सूची राहुल की आंखों से होकर गुजरेगी. स्क्रीनिंग कमेटी में राजस्थान के प्रभारी कांग्रेस महासचिव गुरुदास कामत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चंद्रभान सिंह भी शामिल थे.

सूची में जगह पाने वालों में ज्यादातर नाम वे होंगे, जिन्हें पार्टी की ब्लॉक और जिलास्तरीय समितियों ने चुना है. दो बार हार चुके और 2008 में भारी अंतर से हारे नामों को पहले ही छांट दिया गया. गहलोत ने 12 अक्तूबर को टिकट मांगने वालों से साफ कहा, ‘‘आप टिकट की उम्मीद तभी करिएगा, अगर राहुल की ओर से कराए गए सभी छह सर्वेक्षणों में आपका नाम आया होगा.’’

जाहिर है, राहुल ने इन चुनावों के नामों और चेहरे के लिए तगड़ी छानबीन की है. उन्होंने सितंबर में दो रैलियों को संबोधित किया था और अभी 23 अक्तूबर को वे दो और रैलियों को भी संबोधित करेंगे. इससे पहले कि मध्य नवंबर में पार्टी अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत करे, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी जयपुर में एक रैली करेंगी.

राहुल की राजस्थान की रणनीति दो पहलुओं पर केंद्रित है. पहली तो पार्टी के विधायकों से संबंधित है जिन पर वे व्यापक फीडबैक इकट्ठा करते रहे हैं. इसके चलते कांग्रेस को अपने उम्मीदवारों की अंतिम सूची का प्रकाशन 5 नवंबर तक के लिए टालने पर मजबूर होना पड़ा है. चुनाव की अधिसूचना उसी दिन जारी की जाएगी.

दूसरी रणनीति सरकार विरोधी तगड़ी लहर दिखा रहे सर्वेक्षणों से संबंधित है. सर्वेक्षणों का अनुमान यह है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस 2009 मंट जीती गई 20 सीटों में से 15 पर हार सकती है. राजस्थान में 25 लोकसभा सीटें हैं और यहां के मतदाताओं ने आम चुनावों में अकसर विधानसभा चुनाव की अपनी पसंद को ही दोहराया है.

पार्टी ने प्रदेश में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक आयोजित कर इस साल जनवरी में बचाव अभियान शुरू किया ताकि इस पर ध्यान केंद्रित किया जा सके. एक महीने बाद राहुल ने राजस्थान की सत्ता बचाने की योजना का खाका बनाना शुरू किया.

दिल्ली में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों की बैठक में उन्होंने चंद्रभान से राजस्थान में सामाजिक क्षेत्र में सरकार की उपलब्धियों का फायदा उठाने के लिए कहा. चंद्रभान कहते हैं, ‘‘सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला करने का यही एक रास्ता है.’’ यह वही चंद्रभान हैं, जिन्होंने पहले सार्वजनिक रूप से कहा था कि अगले चुनावों में उनकी पार्टी को नीचा देखना पड़ेगा.

गहलोत ने भी इशारा भांपकर वित्त मंत्री की दोहरी भूमिका निभाते हुए मार्च में जबरदस्त लोकलुभावन बजट पेश कर डाला. वृद्धावस्था पेंशन के मानदंडों को और उदार बनाते हुए उनकी योजना ने 36 लाख नए लाभार्थियों को अपने पाले में कर लिया, जिन्हें पेंशन के रूप में महीने में 500 रु. से लेकर 750 रु. तक अतिरिक्त मिला करेंगे. इस योजना से राजकीय खजाने को 1,500 करोड़ रु. की चपत लगी.

साड़ी और कंबल खरीदने के लिए 30 लाख निर्धनों को 1,500-1,500 रु. देने के लिए उन्होंने 550 करोड़ रु. आवंटित किए. सरकारी संस्थानों में पढ़ रहे मेधावी छात्रों को लैपटॉप और टैबलेट देने का वादा किया गया, महिलाओं को सरकारी बसों के किराए में 30 फीसदी रियायत देने पर 100 करोड़ रु. खर्च हुए और तीर्थयात्रियों को भी किराए में 50 करोड़ रु. तक की रियायत उपलब्ध करवाई गई. राष्ट्रीय स्तर पर इन योजनाओं के जोर-शोर से विज्ञापन पर भी 200 करोड़ रु. खर्च किए गए.

यह सफर इतना आसान भी नहीं रहा है. अभी तक 30 लाख मनीऑर्डरों में से लगभग आधे ही पेंशनरों तक पहुंच सके हैं. लगभग एक-चौथाई गरीबों को अभी तक 1,500 रु. का अपना हिस्सा नहीं मिला है. छात्र शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें खराब दर्जे के टैबलेट दिए गए, जबकि अधिकारियों का कहना यह है कि जहां नकद पैसे दिए गए, वहां बहुत-से लोगों ने उसे दूसरी जगह खर्च कर दिया.

मगर कांग्रेस को भरोसा है कि उसकी योजनाएं सत्ता-विरोधी लहर पर लगाम कस पाने में कामयाब होंगी. मई में प्रदेश के दौरे पर आए राहुल ने वरिष्ठ नेताओं में जोश का संचार करते हुए कहा था, ‘‘स्थिति बदल रही है, लोग खुश हो रहे हैं.’’

इसके बावजूद विधानसभा में साधारण बहुमत पाने के लिए 101 सीटें जीतने की कांग्रेस की उम्मीद अब भी दूर की कौड़ी लगती है क्योंकि 2008 में भी वह 96 सीटें ही जीत पाई थी (जो बाद में बढ़कर 102 हो गई थीं). इसमें वे 15 सीटें भी शामिल हैं, जिन्हें उसने मामूली अंतर से जीता था.

गहलोत और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोपों को देखते हुए 2008 की उनकी छवि एक बार फिर से चमकाने की जरूरत है. उन्हें किसी खास बुनियादी ढांचे का निर्माण न कर पाने वाले एक खराब प्रशासक के तौर पर देखा जाता है या उन पर सरकारी स्कूलों की शिक्षा को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया जाता है जिसके चलते बहुत से सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं. यह तथ्य भी उनके पक्ष में नहीं जाने वाला है.



वोट जीतने की मुफ्त दवा
गहलोत की सबसे बड़ी उम्मीदों में से एक सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाएं और बेहतर मातृत्व लाभ दिए जाने की पेशकश है. उनकी दूसरी योजनाओं के उलट इस योजना का यह दूसरा साल है और इस पर प्रति वर्ष प्रदेश को 160 करोड़ रु. और केंद्र को 140 करोड़ रु. खर्च करने पड़ रहे हैं. आइएएस अधिकारी समित शर्मा के दिमाग की उपज इस योजना में सस्ती जेनरिक दवाएं दी जाती हैं.

वितरण बढ़ाया जाता है और लागत में कटौती की जाती है. शर्मा कहते हैं कि इससे प्रदेश के मेडिकल बिल में 20 फीसदी की कमी आई है और इसकी वजह से सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों की संख्या भी बढ़ गई है.

सरकार का कहना है कि हर साल ढाई लाख मरीज नुस्खे में लिखी ज्यादातर दवाएं मुफ्त पाते हैं और अब तक इस योजना से लगभग 13.7 करोड़ लोग लाभान्वित हो चुके हैं जो प्रदेश की आबादी का दोगुना है. यानी सिद्धांत रूप में प्रदेश का हर निवासी इस योजना से लाभान्वित हो चुका है.

इसी तरह, उम्मीद है कि मुफ्त लैब जांच की शुरुआत करने वाला जयपुर का सवाई मान सिंह अस्पताल ओपीडी पेशेंट लोड के मामले में दिल्ली के एम्स को भी पीछे छोड़ देगा. यहां हर साल 25 लाख से ज्यादा मरीज आ रहे हैं. बीजेपी का दावा है कि आंकड़ों में हेर-फेर किया गया है, वहीं राजे का आरोप है कि दवाएं खराब गुणवत्ता की हैं. 10 अक्तूबर को उन्होंने कहा, ‘‘सरकार मुफ्त दवाओं के नाम पर जहर बांट रही है.’’

गहलोत को गरीबी रेखा के नीचे के उन पांच लाख परिवारों के वोटों का भी आसरा है, जिन्हें 550 करोड़ रु. की इंदिरा आवास और मुख्यमंत्री आवास योजनाओं के तहत एक कमरा बनाने के लिए मदद मिली है. यह मदद राज्य और केंद्र की  संयुक्त रूप से वित्त पोषित एक योजना के माध्यम से एकमुश्त सहायता के रूप में मिली है.

गहलोत ने अपनी फ्लैगशिप योजनाओं की दैनिक आधार पर निगरानी का नियम बना लिया है. हर दो महीने में एक बार वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से समीक्षा बैठक आयोजित करते हैं मगर उनके क्रियान्वयन के लिए काफी कुछ अपने मुख्य सचिव सी.के. मैथ्यू और दूसरे अधिकारियों पर निर्भर करते हैं.

ज्यादातर योजनाओं में कुछ न कुछ खामियां दिखती हैं. मसलन स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं में डॉक्टरों की अनुपलब्धता. गहलोत का इस मामले में जवाब है, ‘‘इतनी बड़ी कल्याणकारी योजना लागू किए जाने पर कोई न कोई कमी तो हमेशा लगी रहेगी. लेकिन जनता के पैसा जनता के पास जा रहा है.’’



लोकलुभावन वादों से फिक्रमंद बीजेपी
अपना झंडा ऊंचा रखने के लिए गहलोत को जयपुर मेट्रो रेल के लगभग पूरे हो चुके प्रथम चरण का भी सहारा है. एक अन्य शोपीस, बाड़मेर में 3,7000 करोड़ रु. की रिफाइनरी परियोजना आलोचना का शिकार हो रही है. इसकी आधारशिला सोनिया गांधी ने पिछले महीने सितंबर में रखी.

गहलोत सरकार ने परियोजना को वित्त पोषित किया और लगभग 200 करोड़ रु. कीमत की मुफ्त जमीन मुहैया करवाई मगर उसे मुनाफे का महज पांचवां हिस्सा ही मिलेगा. इससे प्रदेश के खजाने पर दबाव बढ़ गया और रिजर्व बैंक ने प्रदेश के ऊर्जा क्षेत्र की 70,000 करोड़ रु. की संचित हानि से पुनर्भुगतान संकट की चेतावनी दे डाली. बीजेपी गहलोत की योजनाओं का मजाक उड़ाती है.

बीजेपी प्रवक्ता ज्योति किरण जहां गहलोत पर भारी देनदारियां तैयार करने का आरोप लगाती हैं, वहीं राजे कहती हैं, ‘‘सरकार को पता ही नहीं है कि किन योजनाओं को कैसे लागू किया जाए, चलाया जाए या पूरा किया जाए. उसे दिल्ली से भी उतनी सहायता नहीं मिल पाई है जितनी कि मिलनी चाहिए थी.’’

मगर इन योजनाओं ने बीजेपी के लिए हालात मुश्किल तो बना ही दिए हैं. राजे की सुराज संकल्प यात्रा का जवाब देने के लिए राहुल ने मार्च में गहलोत से एक यात्रा शुरू करने को कहा था. राजे ने सुराज यात्रा के तहत छह महीने में 170 विधानसभा क्षेत्रों को नाप डाला. गहलोत चाहते थे कि उनकी यात्रा चुनाव के आसपास हो.

कांग्रेस अपने घोषणापत्र के जरिए एक फीलगुड फैक्टर भी उभारने की कोशिश करेगी. केंद्रीय शहरी विकास मंत्री शांति धारीवाल की अध्यक्षता वाली एक समिति घोषणापत्र तैयार कर रही है. इसमें मेधावी छात्रों के लिए लैपटॉप और नौकरियों के वादे, छात्राओं को नौकरी पाने में मदद के लिए ग्रेस मार्क, कृषि के लिए सस्ती बिजली, करमुक्त बीज और कृषि उपकरण और फ्लोराइड ट्रीटमेंट प्लांट्स वगैरह शामिल हैं.

लेकिन कांग्रेस के सामने प्रदेश के अलग-अलग समाजों को साधने की चुनौतियां भी हैं. विभिन्न जातीय और धार्मिक समूहों के बीच विद्वेष है जो और भी बढ़ सकता है. भंवरी देवी की हत्या में जाट नेता महिपाल मदेरणा और बिश्नोई नेता मलखान सिंह की गिरफ्तारी ने इन समुदायों को नाराज कर रखा है.

गुर्जर इसलिए नाराज हैं कि गहलोत ने उन्हें 5 फीसदी ओबीसी कोटा नहीं दिया. सितंबर 2011 में गोपालगढ़ प्रकरण को लेकर मुसलमानों में नाराजगी है. जिसकी जांच सीबीआइ कर रही है.

कई हिंदू बलात्कार मामले में आसाराम बापू की गिरफ्तारी से नाखुश हैं जबकि बलात्कार के एक दूसरे आरोपी, गहलोत के प्रिय पात्र पूर्व मंत्री बाबूलाल नागर खुलेआम घूम रहे हैं. उम्मीदवारों के ऐलान के बाद उपजने वाला असंतोष परेशानी का एक और मसला है. राहुल ने चेतावनी दे रखी है कि असंतुष्टों से कड़ाई से निबटा जाएगा.

जून, 2011 में प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने के बाद से चंद्रभान भी गहलोत से उलझने से बचते रहे हैं और आलाकमान ने गहलोत के प्रतिद्वंद्वियों सी.पी. जोशी, सचिन पायलट और जितेंद्र सिंह को चुनावों में कोई भूमिका न देकर उनके रास्ते में नहीं आने दिया है.

एक पेच और भी हैः कांग्रेस 1998 और 2008 में तब जीती थी जब गहलोत को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश नहीं किया गया था. अलबत्ता 2003 में जब उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया गया था, लेकिन कांग्रेस बुरी तरह से हार गई थी.

गहलोत अब कहते हैं कि जीतने की क्षमता ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के चयन को निश्चित करेगी. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, ‘‘गहलोत चतुर हैं. वे पार्टी की बैठकों में बहुत कम बोलते हैं. मगर उन्हें पता है कि कांग्रेस के जीतने पर वे फिर से मौके पर पहुंच जाएंगे.’’

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