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सूचना का अधिकार-सूचनाओं से असुरक्षा

हर साल देशभर में नागरिकों की ओर से तकरीबन साठ लाख आरटीआइ आवेदन दाखिल किए जाते हैं जिससे भारत का आरटीआइ कानून पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आने वाला पारदर्शिता कानून बन गया.

 सूचना का अधिकार सूचना का अधिकार

भारत के सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कानून को दुनियाभर में पारदर्शिता के सबसे ताकतवर कानून के रूप में माना जाता था, पर अब उसे पंगु बना दिया गया है. संसद ने 25 जुलाई को आरटीआइ संशोधन विधेयक पारित किया है, जो सूचना आयोगों को कमजोर बनाकर इस कानून के दिल पर चोट करता है. नागरिकों और कई विपक्षी दलों के कड़े विरोध के बावजूद सरकार ने इसे चोरी-छिपे पेश किया और संसद के दोनों सदनों में पारित करा लिया.

आरटीआइ कानून लोगों के सूचना पाने के उस अधिकार को सुनिश्चित करने की एक व्यावहारिक व्यवस्था थी जिसे कई बार विभिन्न फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने लोगों के बुनियादी अधिकार के रूप में स्वीकार किया और उसे संविधान के अनुच्छेद 19 तथा अनुच्छेद 21 से जोड़कर देखा है. आरटीआइ कानून के तहत सूचना आयोग उन स्थितियों में लोगों की शिकायतों और अपील पर फैसला करते हैं जब वे इसके विभिन्न प्रावधानों के तहत सूचनाएं हासिल करने में नाकाम रहते हैं.

आरटीआइ कानून, 2005 के तहत सूचना आयुक्तों को कार्यकाल की सुरक्षा और ऊंची हैसियत, दोनों हासिल थी और इससे उन्हें स्वायत्त रूप से कामकाज करने का अधिकार मिलता था. इसकी बदौलत वे देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन लोगों को भी सूचनाएं देने का निर्देश दे सकते हैं. आयुक्तों का पांच साल का निश्चित कार्यकाल था (सेवानिवृत्ति की उम्र 65 साल तय है) और केंद्रीय सूचना आयोग के आयुक्तों तथा राज्य सूचना आयोग के प्रमुखों का वेतन, भत्ते और बाकी सेवा शर्तें चुनाव आयुक्तों के समकक्ष थीं.

किसी चुनाव आयुक्त का वेतन सुप्रीम कोर्ट जज के बराबर होता है जिसे संसद तय करती थी. हाल में हुए संशोधनों में सभी सूचना आयुक्तों के कार्यकाल, वेतन, भत्ते और सेवाशर्तें तय करने का अधिकार केंद्र सरकार को मिल गया है. इससे आयोगों की स्वायत्तता का हनन हुआ है और वे उन्हीं संस्थानों की तरह हो जाएंगे जिन्हें 'पिंजरे में बंद तोतों' की संज्ञा दी जाती रही है.

हर साल देशभर में नागरिकों की ओर से तकरीबन साठ लाख आरटीआइ आवेदन दाखिल किए जाते हैं जिससे भारत का आरटीआइ कानून पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आने वाला पारदर्शिता कानून बन गया. लोगों ने इस कानून का सफलतापूर्वक प्रयोग करके अपने बुनियादी अधिकारों के बारे में जानकारी हासिल की, भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग को बेनकाब किया है. इस दलील का कोई साक्ष्य नहीं है कि कानून के मूल स्वरूप से इसके क्रियान्वयन में बाधा आ रही थी, लिहाजा इन संशोधनों की कोई वजह नहीं बनती.

सरकार ने इसके पीछे यह तर्क दिया है कि सूचना आयुक्तों को चुनाव आयुक्तों के समकक्ष मानना गलत है क्योंकि चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है जबकि सूचना आयोग विधिक निकाय हैं. पर संविधान या किसी कानून में ऐसा करने पर रोक नहीं है. हकीकत यह है कि संवैधानिक संस्थाओं के पदाधिकारियों के लिए निर्धारित कार्यकाल और सेवाशर्तों के समकक्ष वैधानिक रूप से कार्यकाल निश्चित करने और सेवाशर्तों को सुरक्षित रखने का सिद्धांत नियमित प्रक्रिया है.

वैधानिक निगरानी रखने वाले संस्थान, जैसे कि केंद्रीय सतर्कता आयोग और लोकपाल आदि के कामकाज की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए ऐसा किया जाता रहा है. आरटीआइ विधेयक, 2004 को पारित किए जाने से पहले उसका अध्ययन करने वाली संसदीय स्थायी समिति ने भी सिफारिश की थी कि सूचना आयुक्तों की हैसियत बढ़ाकर उसे चुनाव आयुक्तों के समकक्ष कर दिया जाए ताकि वे पूरी स्वतंत्रता और स्वायत्तता के साथ काम कर सकें.

साफ है, सरकार ने भरोसे लायक तर्क दिए बिना इस कानून को काफी कमजोर कर दिया है. इससे उसकी नीयत को लेकर कयास लगाए जाने लगे हैं. मोटे तौर पर माना जा रहा है कि हाल के कुछ फैसलों ने सरकार को नाराज कर दिया है. इनमें प्रमुख रूप से प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यताओं और उनकी विदेश यात्राओं से जुड़ी सूचनाओं, नोटबंदी से जुड़े आंकड़े और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के असंगत एनपीए के संबंध में धोखाधड़ी के हाइ-प्रोफाइल मामलों के द्ब्रयौरे जाहिर करने के निर्देश शामिल हैं.

संशोधन विधेयक जिस तरह पारित किए गए, इससे भी कई गंभीर चिंताएं खड़ी हुई हैं. लोकसभा में तो एनडीए ने सीधे-सीधे अपने भारी बहुमत के जरिये विपक्षी दलों की तमाम आपत्तियों को कुचल दिया. लेकिन राज्यसभा में इस बिल को प्रवर समिति को भेजे जाने के एक प्रस्ताव पर 15 विपक्षी दलों के दस्तखत करने के बावजूद, जब मतदान का वक्त आया तो कई विपक्षी दल इस मांग से पीछे हट गए. इससे इन आशंकाओं को बल मिला कि सत्तारूढ़ खेमे ने कई विपक्षी दलों पर दबाव कायम किया.

आरटीआइ कानून को गंभीर झटका लगा है, पर इन संशोधनों के वैधानिक औचित्य को चुनौती दी जा सकती है. सूचना के प्रवाह को बाधित करने की इन कोशिशों के बावजूद, ये संशोधन इस कानून के प्रभावी इस्तेमाल के जरिये सरकार को जवाबदेह बनाने वाले लाखों नागरिकों के हौसलों को तोड़ नहीं पाएंगे. सूचना हासिल करने के अपने बुनियादी अधिकार के लिए आम लोग पारदर्शिता के इस कानून का इस्तेमाल करते रहेंगे.

अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआइ) की सदस्य हैं

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