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बातचीतः मैं लोकतांत्रिक तरीके से अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष बना हूं

महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रवींद्र पुरी ने इंडिया टुडे के एसोसिएट एडिटर आशीष मिश्र से बातचीत की.

महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रवींद्र पुरी महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रवींद्र पुरी

महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रवींद्र पुरी ने इंडिया टुडे के एसोसिएट एडिटर आशीष मिश्र से बातचीत की.

आरोप-प्रत्यारोप

अखाड़ा परिषद का चुनाव 25 अक्तूबर को प्रस्तावित था. तीन दिन पहले अचानक चुनाव कराने की जरूरत क्यों पड़ी?

अखाड़ा परिषद एक सामाजिक लोकतांत्रिक संगठन है. आम तौर पर सर्वसम्मति से अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष का चुनाव होता है लेकिन कई बार विचार नहीं मिलते हैं तो बहुमत के आधार पर अध्यक्ष चुना जाता है. पूर्व अध्यक्ष नरेंद्र गिरि की असामयिक मौत के बाद अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष का पद खाली था.

इस पद को भरने के लिए कुछ अखाड़ों की लोकतंत्र में सहमति थी, कुछ की नहीं थी. जिनकी लोकतंत्र में सहमति थी उन अखाड़ों ने 21 अक्तूबर के चुनाव में हिस्सा लिया. वर्ष 2015 में अखाड़ा परिषद के चुनाव में भी ऐसा ही हुआ था.

उस वक्त नौ अखाड़ों का समर्थन पाकर नरेंद्र गिरि अध्यक्ष बने थे. इसी प्रक्रिया का पालन करते हुए इस बार भी चुनाव हुआ है. इस चुनाव में चारों अखाड़ों, संन्यासी, वैष्णव, उदासीन और निर्मल संप्रदाय के अखाड़ों ने हिस्सा लिया है.

क्या अखाड़ा परिषद के दो फाड़ हो गए हैं?

प्रयागराज में तो केवल संन्यासी अखाड़ों ने चुनाव में हिस्सा लिया. निरंजनी अखाड़ा के रवींद्र पुरी को अध्यक्ष बना दिया. जूना अखाड़े के हरि गिरी महामंत्री बने जो 15 वर्षों से इसी पद पर हैं. इसी को तो लेकर विवाद है. इस अखाड़ा परिषद को सभी संप्रदायों का समर्थन नहीं है. यह केवल शैव (संन्यासी) अखाड़ों का चुनाव था.

नरेंद्र गिरि की मृत्यु के बाद अखाड़ा परिषद के तत्कालीन उपाध्यक्ष निर्मल अखाड़े के देवेंद्र सिंह शास्त्री को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था. इनकी अध्यक्षता में 21 अक्तूबर को हरिद्वार में बैठक हुई और मुझे अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुना गया. मुझे सात अखाड़ों का समर्थन है जबकि प्रयागराज में हुए चुनाव में रवींद्र पुरी को छह अखाड़ों ने चुना है.

हरिद्वार कुंभ के दौरान वैरागी अखाड़ों के समर्थन से आप संन्यासी अखाड़ों के विरोध में खड़े हो गए थे?

हरिद्वार कुंभ में वैरागी अखाड़ों ने जमीन की उपलब्धता और स्नान के समय को लेकर अखाड़ा परिषद पर उपेक्षा का आरोप लगाया था. इसलिए वैरागी अखाड़ों ने अपने आपको अलग कर लिया था. मेरी इसमें कोई भूमिका नहीं थी.

आप निर्मल अखाड़ा के समर्थन का दावा कर रहे हैं जबकि इसके कुछ लोग प्रयागराज में अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष के चुनाव में शामिल हुए थे?

पंजाब के निर्मल अखाड़े के स्थानीय महंतों का आपसी विवाद कोर्ट में है. उन्हीं में से किसी को प्रयागराज की बैठक में शामिल करा दिया गया है. ज्ञान देव सिंह कानूनी रूप से और सर्वसम्मत से निर्मल अखाड़े के महंत है. वे मेरा समर्थन करते हैं. 

अखाड़ों में परस्पर विवाद से समाज में एक गलत संदेश जा रहा है?

यह चिंता का विषय है. प्रयास किया जा रहा है कि सभी अखाड़े एक हो जाएं. लोकतंत्र में सबको अधिकार है अपना पक्ष रखने का. हम सब लोग एकता के लिए प्रयास करेंगे. हरि गिरी जी से भी बात की जाएगी.

वर्ष 2022 में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव है. इसमें आप अपने अखाड़ा परिषद की क्या भूमिका देखते हैं?

अखाड़ा पंथ निरपेक्ष हैं. अखाड़ा से जुड़े संत मंदिरों में रहते हैं, वहां सभी पार्टियों के लोग आते हैं. किसी संत का व्यक्तिगत रूप से किसी राजनीतिक नेता से संबंध हो सकता है. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जन्म उत्तराखंड के नीलकंठ में हुआ है. उनसे मेरे व्यक्तिगत संबध है.

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