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राजस्थान: विवादों के चार 'अभूतपूर्व' वर्ष

अशोक गहलोत का मुख्यमंत्री के तौर पर अनुभव नौ वर्षों का है. लेकिन वे राज्य को कुशल प्रशासन देने में विफल रहे.

अशोक गहलोत ने पिछले दिनों राजस्थान के मुख्यमंत्री के तौर पर चार साल पूरे किए. यह उनका दूसरा कार्यकाल है. उनका पहला कार्यकाल 1998 से 2003 के बीच रहा था, जिसके बाद वे भारतीय जनता पार्टी की वसुंधरा राजे से हार गए थे. 9 साल के अपने राजनीतिक अनुभव और सोनिया गांधी के लाडले मुख्यमंत्री होने के बावजूद उनके राज में प्रशासन कितना बदहाल है, इसका उदाहरण पिछले कुछ दिनों हुई घटनाएं हैं.

गहलोत को अब गांधी भी बोझ लगने लगे हैं. दो दशकों तक मीडिया के जरिए खुद को मारवाड़ का गांधी और शुद्घ गांधीवादी मुख्यमंत्री कहलाने वाले गहलोत अब कहने लगे हैं कि उन्होंने तो गांधी को पढ़ा ही नहीं, इसलिए उनकी तुलना गांधी से नहीं करनी चाहिए. वे स्वीकार करते हैं कि गांधी को बमुश्किल जानते हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि उन्हें मारवाड़ या राजस्थान का गांधी कहकर न बुलाया जाए.

आज गहलोत एक ऐसे नेता के रूप में प्रचारित हो चुके हैं जिन पर आरोप हैं कि वे अपने करीबी लोगों की कंपनियों को खूब पैसा बनाने देता है, जिन्हें जमीनें, झीलें, अपार्टमेंट बनाने के लिए कानूनों में रियायत, जल और सीवर की पाइपलाइनों और सौर ऊर्जा परियोजनाओं में मनमर्जी ठेके आदि थाल में सजा कर दे दिए जाते हैं और यह सब जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे और सरकारी जमीनों की कीमत पर किया जाता है.

राजस्थान में गहलोत के राज में भ्रष्टाचार ने नई ऊंचाइयों को छुआ है क्योंकि अफसरों में कायदे-कानून का भय खत्म हो गया है. गहलोत प्रशासन और पुलिस संबंधी एक भी कामयाबी गिनाने के लायक नहीं हैं. एक उदाहरण काफी होगा. राजस्थान के अतिरिक्त मुख्य सचिव वी.एस. सिंह की मौत सुबह की सैर के दौरान सड़क पार करते वक्ïत हुई, जब वे डिवाइडर पर खड़े थे. उन्हें एक आल्टो कार ने आकर कुचल दिया. जिस तरीके से मौत हुई, उसने सबको चौंका दिया लेकिन पुलिस के माथे पर शिकन तक नहीं आई.Rajasthan

पुलिस ने तुरंत इसे सड़क हादसा करार दे दिया वह भी दीनदयाल नाम के आल्टो चालक के इकलौते बयान के आधार पर, जिसने कहा कि एक व्यक्ति को बचाने के चक्कर में उसने सिंह और एक अन्य अधिकारी विजेंद्र को टक्कर मार दी. इसके बाद से इस घटना में कई विरोधाभास सामने आए हैं. यह घटना दिखाती है कि गहलोत प्रशासन में पुलिस कितनी अक्षम, और गैर-पेशेवर है.

गहलोत के पास गृह मंत्रालय भी है, पुलिस सीधे उनके नियंत्रण में आती है. 7 साल की बच्ची नैना की हत्या की जिम्मेदारी भी प्रशासन पर आती है जिसे उसके घर से अगवा कर लिया गया था. करौली जिले में पप्पू शर्मा के दोनों हाथ काटने की जवाबदेही भी गहलोत पर ही है जो सत्ता में चार साल पूरे होने का उत्सव मना रहे हैं.

जनवरी 2012 में प्रवासी दिवस सम्मेलन से ठीक पहले शहरी विकास मंत्री शांति धारीवाल ने गहलोत की अनुमति से जयपुर को सजाने में दो हफ्ते के भीतर 35 करोड़ रु. फूंक दिए थे. इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आना था. उस समय बनी सड़कें और किया गया चूना देखते-देखते झड़ गया और प्रवासियों को लुभाने के लिए बनाए गए शौचालय तब से काम में ही नहीं आए हैं. अब इंजीनियर भी इस बात को मान रहे हैं कि जल्दी में किया गया काम घटिया था, लेकिन यह बहाना दरअसल इसलिए दिया जा रहा है ताकि फिर से उसी काम के लिए और पैसे निकाले जा सकें.

शहरी विकास मंत्रालय ने दलालों और भू-माफियाओं की बड़ी मदद की है. पहले उसने नया जयपुर की घोषणा की, फिर चार साल बाद उसे रद्द कर दिया. ऐसे आरोप हैं कि धारीवाल और उनकी चुनी अफसरों की टीम—जिसमें गहलोत के लोग भी शामिल हैं—ने बिल्डरों को खुलेआम बाईलॉज और मास्टर प्लान का उल्लंघन करने की छूट दी.

अल्पसंख्यकों के उत्पीडऩ की कई घटनाएं सामने आई हैं. गोपालगढ़ गोलीबारी कांड इस मामले में सबसे बुरा था, जिसमें 10 मुसलमान मारे गए. गहलोत जिस तरीके से भंवरी देवी की सीडी दबाए बैठे रहे, उसी कारण भंवरी देवी की हत्या हुई और जिसके बाद उन्हीं के एक मंत्री महिपाल मदेरणा और विधायक मलखान सिंह हिरासत में लिए गए.

गहलोत के अपने जिले जोधपुर में समस्याओं का अंबार है. जच्चा-बच्चों की मौत और मिलावटी दवाओं के कई मामले सामने आए हैं. विकास दर तेजी से नीचे सरकी है, बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, महंगाई भी आसमान छू रही है. पर्यटन विनाशक रूप ले चुका है. राज्य के नेतृत्व की अदूरदर्शिता साफ दिखाई देती है.

गहलोत लंबे समय तक राज कर चुके हैं और उन्हें अब जीत की नहीं, बल्कि इस बात की चिंता है कि वे अपना रिटायरमेंट कैसे गुजारें? अब यह बीजेपी के हाथ में है कि वह अपनी जीत कैसे सुनिश्चित करती है.

हमारे शासन काल के चार वर्ष अभूतपूर्व और जनता के हित में लिए गए बेहतरीन फैसलों से भरे हुए हैं.''

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