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राजस्थानः घर में ही दो-दो हाथ करती भाजपा

भाजपा के पास राजे को राज्य की राजनीति में लाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, लेकिन राजे को भी अपने साथ और नेताओं को जोड़ना होगा

असहमति कैलाशचंद्र मेघवाल असहमति कैलाशचंद्र मेघवाल

मजबूत नेता की कमी की वजह से राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पिछले कुछ समय से अंदरूनी असंतोष से जूझ रही है. हाल की एक घटना में राज्य में अनुसूचित जाति के शीर्ष नेता 87 वर्षीय कैलाशचंद्र मेघवाल ने विपक्ष के नेता और आरएसएस के पसंदीदा 76 वर्षीय गुलाब चंद कटारिया के खिलाफ धावा बोल दिया. मेघवाल विधानसभा अध्यक्ष और गृह मंत्री रह चुके हैं. कटारिया और मेघवाल दोनों उदयपुर से हैं और अपने राजनैतिक करियर के ज्यादातर वक्त उनमें असहमति रही है. लेकिन मेघवाल ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को पत्र लिखकर उनकी शिकायत की और उन्हें हटाने का भी सुझाव दे डाला. इस कारण आलाकमान को राजस्थान प्रभारी अरुण सिंह को मामला शांत कराने के लिए नियुक्त करना पड़ा.

हालांकि अरुण सिंह ने मेघवाल को शांत करा दिया पर मेघवाल के उठाए मुद्दे चर्चा का विषय बने हुए हैं. मेघवाल की मुख्य आपत्ति हाल में कटारिया के विवादित बयान देने और भाजपा के वोट बैंक को नुक्सान होने को लेकर थी. उनके मुताबिक, हाल में कटारिया ने कहा कि अगर भाजपा न होती तो भगवान राम समंदर में पड़े होते. इसे पहले उन्होंने कहा था कि भाजपा न होती तो बेचारा महाराणा प्रताप जंगलों में रोता फिरता. ऐसे कुछ बयानों से भाजपा को वाकई नुक्सान हुआ है. इस साल अप्रैल में राजसमंद विधानसभा उपचुनाव वह मुश्किल से जीत सकी जबकि यह सीट उसकी सबसे सुरक्षित सीटों में हुआ करती थी.

मेघवाल का पत्र विस्फोट 9 सितंबर को विधानसभा का सत्र शुरू होने से दो दिन पहले हुआ और इसने जयपुर जिला परिषद में क्रॉस वोटिंग के जरिए कांग्रेस की दलबदलू रमा देवी को जिला प्रमुख के तौर पर जिताने की खुशी को काफूर कर दिया. उससे कुछ रोज पहले एक अज्ञात-से समूह ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नाम पर दफ्तर खोल दिया.

अपनी बहू निहारिका की देखभाल में व्यस्त राजे राज्य की राजनीति से दूरी बनाए हुए हैं. इस साल के शुरू से ही निहारिका गंभीर रूप से बीमार हैं. हालांकि राजे के आलोचक मेघवाल के पत्र जैसे मामलों के लिए उन पर उंगली उठाते हैं लेकिन राज्य में उनकी अनुपस्थिति में अच्छा नेतृत्व प्रदान करने में नाकाम रहने के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं. इसके अलावा, राज्य का मौजूदा भाजपा नेतृत्व अपनी साफ छवि पेश करने में नाकाम रहा है. हाल में राजे विरोधी गुट और आरएसएस के प्रमुख नेता की पसंद दंपति राजाराम गुर्जर और उनकी पत्नी सौम्या का विवाद सामने आ गया. सौम्या को ज्यादातर प्रमुख नेताओं की मर्जी के खिलाफ जयपुर ग्रेटर का मेयर नियुक्त कर दिया गया. राजाराम कूड़ा जमा नहीं करने की वजह से लटके पैसे जारी करने के लिए कथित तौर पर 20 करोड़ रुपए रिश्वत मांगने के आरोप में जेल में बंद हैं जबकि उनकी पत्नी सौम्या को निलंबित कर दिया गया है.

ग्रामीण इलाकों में हुए हालिया चुनावों से पता चला कि कांग्रेस के वोट शेयर में भाजपा के मुकाबले दो फीसद इजाफा हुआ जबकि विधानसभा चुनाव के दौरान यह अंतर 0.5 फीसद था और राज्य में कांग्रेस को भाजपा से महज 1.5 लाख ज्यादा वोट मिले थे.

फिर भी लगता है‌ कि राजे उन्हें किनारे लगाने पर आमादा मौजूदा नेतृत्व और पार्टी के अपने पुराने समर्थकों के बीच खाई कम करने की कोशिश कर रही हैं. उनके वफादार, विधायक और पूर्व मंत्री कालीचरण सराफ समझौते के लिए मेघवाल के साथ भाजपा दफ्तर में अरुण सिंह से मिलने गए. उनके एक अन्य सहयोगी प्रताप सिंह सिंघवी ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया को अपने घर चाय पर बुलाया. पूनिया की छवि राजे विरोधी नेता के रूप में उभरी है.

पूनिया आरएसएस और पार्टी की पसंद हैं लेकिन उनके साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे सबको साथ लेकर नहीं चल पाते. गहलोत सरकार पर भाजपा के ज्यादातर हमलों का खास असर नहीं हो रहा है. न तो भाजपा अपने शासन के दौरान की उपलब्धियों को बता पा रही है क्योंकि वह राजे के शासन काल का गुणगान नहीं करना चाहती और न ही गहलोत सरकार के भ्रष्टाचार के मामलों को उठाना चाहती है क्योंकि बयान देने वाले नेताओं का सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के साथ करीब का रिश्ता है. भाजपा को लगता है कि चाहे जो हो, 2023 में विधानसभा चुनाव वही जीतेगी. जाहिर है, यह खामख्याली है. गहलोत सत्ता में वापसी के लिए अपने सहयोगियों और थिंक टैंक से गंभीर विचार विमर्श कर रहे हैं.

लिहाजा, भाजपा को अशोक गहलोत और सचिन पायलट से निबटने के लिए किसी मजबूत नेता की जरूरत है. भाजपा के पास राजे को राज्य की राजनीति में लाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. लेकिन राजे को भी अपने साथ और नेताओं को जोड़ना होगा, केवल उन्हीं के भरोसे नहीं बैठना होगा जो फिलहाल उनके साथ हैं. भाजपा में कलह से जाहिर है कि राज्य इकाई में सबको साथ लेकर चलने वाले मजबूत नेताओं की जरूरत है.

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