scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 29/- रुपये में

कट्टरपंथ का खतरा

पंजाब सरकार ने हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन और गानों में बंदूकों के महिमामंडन पर पाबंदी लगाई है

X
भिंडरावाले 2.0? वारिस पंजाब दे के मुखिया अमृतपाल सिंह संधू 30 अक्तूबर को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में
भिंडरावाले 2.0? वारिस पंजाब दे के मुखिया अमृतपाल सिंह संधू 30 अक्तूबर को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में

पंजाब में सिख राजनीति में एक नया मंथन दिख रहा है. कट्टरपंथी तत्वों के उदय के बीच नरमपंथियों की समुदाय पर पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है. 13 नवंबर को राज्य की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार ने सभी हथियारों के लाइसेंसों की समीक्षा का आदेश दिया. साथ ही, हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन और बंदूक संस्कृति तथा हिंसा को महिमामंडित करने वाले गीतों पर प्रतिबंध लगा दिया. यह फैसला राज्य में एक सप्ताह के भीतर दिनदहाड़े हुई दो हत्याओं—अमृतसर में हिंदू दक्षिणपंथी नेता सुधीर सूरी और कोटकपुरा में डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी प्रदीप कटारिया—के बाद लिया गया है. हालांकि इन दो हत्याओं की जिम्मेदारी क्रमश: कनाडा निवासी गैंगस्टर लखबीर सिंह उर्फ लांडा हरिके और सतविंदर सिंह उर्फ गोल्डी बराड़ ने ली है लेकिन राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) को संदेह है कि ये अपराध सिख कट्टरपंथी समूहों के इशारे पर किए गए हैं.

फरीदकोट जिले के कोटकपुरा शहर का एक डेयरी मालिक कटारिया, 2015 में पंजाब को हिलाकर रख देने वाले बेअदबी के एक मामले में आरोपी था. तब से वह सिख कट्टरपंथियों की हिट लिस्ट में था और फिलहाल जमानत पर था. वह 10 नवंबर की सुबह अपनी दुकान खोल रहा था तभी आधा दर्जन हमलावरों ने गोलियां बरसाकर उसकी जान ले ली. रेडीमेड कपड़ों के विक्रेता सूरी, पंजाब की शिवसेना (टकसाली) के नेता थे. वे सिख कट्टरपंथियों और खालिस्तान आंदोलन को खुलकर चुनौती देते रहे थे. पुलिस ने उनके हमलावर संदीप सिंह उर्फ सनी को गिरफ्तार कर लिया है. उसने 4 नवंबर को अमृतसर में एक मंदिर के बाहर लाइसेंसी हथियार से उनकी हत्या की थी. ये हत्याएं 2016-17 में पंजाब में हुई हत्या की एक शृंखला की याद दिलाती हैं, जिसमें एक हिंदू दक्षिणपंथी नेता, डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी और एक ईसाई पादरी को मार दिया. सुरक्षा एजेंसियां इन हत्या को उसी कट्टरपंथी एजेंडे से जोड़कर देखती हैं.

सूरी की हत्या की जांच में अमृतपाल सिंह संधू का नाम भी सामने आया है, जिसने कुछ महीने पहले रहस्यमय तरीके से राज्य के धार्मिक-राजनीतिक परिदृश्य में प्रवेश किया था. ऑपरेशन ब्लूस्टार में मारे गए सिख उग्रवादी नेता से समानता के कारण उसे भिंडरावाले 2.0 कहा जा रहा है. पुलिस के मुताबिक एक वीडियो सामने आया है जिसमें सूरी के हत्यारे और संधू एक साथ दिखते है. हालांकि संधू ने हिंदू नेता की हत्या में अपनी भूमिका से इनकार किया है, लेकिन उसने हत्या को उचित ठहराया है. उसने कहा, ''सूरी लगातार सिखों के खिलाफ बोल रहे थे, तहिये सोढ़िया गया (इसीलिए उन्हें सजा दी गई थी).'' सजा के लिए पंजाबी शब्द सोढ़िया का इस्तेमाल राज्य में उग्रवाद के दौर में अक्सर किया जाता था.

उनत्तीस वर्षीय संधू एक दशक तक दुबई में रहने के बाद इसी अगस्त में पंजाब लौटा और 'वारिस पंजाब दे' संगठन की बागडोर संभाल ली. इसे दिवंगत अभिनेता और एक्टिविस्ट दीप सिद्धू ने 'लोगों की वैध मांगों के लिए लड़ने' के लिए शुरू किया था. अब निरस्त हो चुके कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन के दौरान सिद्धू सुर्खियों में आया था और इस साल फरवरी में एक कार दुर्घटना में उसकी मौत हो गई. 29 सितंबर को संगठन बनने की पहली वर्षगांठ पर मोगा जिले के रोडे गांव में आयोजित एक विशाल कार्यक्रम के दौरान, संधू को समूह का प्रमुख नियुक्त किया गया था. कार्यक्रम स्थल का चुनाव काफी रणनीतिक था, क्योंकि यह जरनैल सिंह भिंडरावाले का पैतृक गांव है. भिंडरावाले की तरह संधू भी नीली गोल पगड़ी पहनता है, अपने सफेद कपड़ों में एक छोटी कृपाण रखता है और भाषणों में आग उगलता है. इससे वह कट्टरपंथी सिख युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रहा है. वह धार्मिक सभाओं को संबोधित करता है, उसके वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए जाते रहे हैं. 

हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर प्रतिबंध संधू के सिख युवकों को कृपाण या अन्य लाइसेंस प्राप्त हथियार लेकर चलने के आह्वान का जवाब में लगाया गया मालूम होता है. खुले तौर पर युवाओं को ''गुलामी की बेड़ियां तोड़ने'' के लिए जान की बाजी लगाने का आह्वान करते हुए उसने बार-बार एक अलग सिख राष्ट्र-खालिस्तान के लिए 'रक्तपात' की चेतावनी दी है. यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि संधू हथियारों पर आप सरकार के फरमान का पालन करेगा या नहीं. उसके उदय को करीब से देखने वाले राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वह अब तक काफी बगावती तेवर दिखाता आया है और इस फरमान को वह सरकार के साथ सीधे भिड़ने और युवाओं के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है. जानकारों का मानना है कि उसने नरमपंथियों द्वारा खाली की गई जगह पर तेजी से कब्जा किया है. 

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के अध्यक्ष के चुनाव में सुखबीर बादल के पूरा जोर लगाने के बाद 9 नवंबर को बादल गुट के उम्मीदवार हरजिंदर सिंह धामी जीत सके लेकिन अकाली दल की विद्रोही उम्मीदवार बीबी जागीर कौर 42 वोट पाने में कामयाब रहीं, जो इतिहास में किसी बागी प्रत्याशी को मिला अधिकतम समर्थन है. 

धामी को कौम से जुड़े कई मुद्दों पर 'नरम' माना जाता है, जिसमें धर्मांतरण भी शामिल है. जागीर कौर और अमृतपाल सिंह संधू दोनों की राजनीति आक्रामक है. एक सिख उपदेशक का कहना है कि ये घटनाएं पंथिक राजनीति में मंथन का संकेत देती हैं. इसका परिणाम आने में समय लगेगा. इससे सांप्रदायिक तनाव भड़क सकता है, जिससे सरकार और सुरक्षा एजेंसियां परेशान हैं.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें