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उत्तराखंडः खटीमा का खेल

कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के आकांक्षी हरीश सिंह रावत भी आसपास ही हैं और वे पड़ोस के लालकुआं सीट से चुनाव मैदान में हैं.

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युवा जोश उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी युवा जोश उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

पड़ोसी देश नेपाल के साथ भारत की सीमा से थोड़ी दूरी पर, खटीमा में देखने-बताने लायक कोई उल्लेखनीय चीज नहीं है, सिवाय इसके कि यह छोटा-मोटा व्यापारिक केंद्र है. लेकिन, तराई के इस छोटे से शहर में इस विधानसभा चुनाव में गहमागहमी है, क्योंकि उत्तराखंड के युवा मुख्यमंत्री, 46 वर्षीय पुष्कर सिंह धामी इस चुनाव क्षेत्र से तीसरी जीत की तैयारी कर रहे हैं.

धामी के खिलाफ खम ठोकने वाले लोगों में जाने-पहचाने और पुराने प्रतिद्वंद्वी ही हैं: कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी—जिन्हें धामी ने 2017 के चुनाव में 2,709 वोटों के थोड़े ही अंतर से हराया था—और इसके साथ बहुजन समाज पार्टी के रमेश राणा हैं. कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के आकांक्षी हरीश सिंह रावत भी आसपास ही हैं और वे पड़ोस के लालकुआं सीट से चुनाव मैदान में हैं.

खटीमा, नैनीताल-उधम सिंह नगर लोकसभा सीट का हिस्सा है और यह 70 सदस्यीय विधानसभा में 29 सदस्य भेजने वाले कुमाऊं डिविजन के पहाड़ की तलहटी में स्थित है. यहां 14 फरवरी को चुनाव होने हैं और धामी भाजपा के नारे—अबकी बार, 60 पार—पर भरोसा कर रहे हैं. इससे उन्हें अपने अभियान और आत्मविश्वास दोनों को शक्ति मिल रही है.

ऐसा नहीं कि धामी को आत्मविश्वास बढ़ाने वाला बूस्टर डोज चाहिए. आखिर, उनकी पार्टी ने इस कुमाऊंनी युवा में तब भरोसा दिखाया जब उन्हें दो मुख्यमंत्री फटाफट बदलने पड़े थे. लेकिन नौकरियों, स्वास्थ्य के खराब बुनियादी ढांचे और अव्यवस्थित होते शिक्षा क्षेत्र को लेकर बढ़ती शिकायतें खटीमा में खेल खराब कर सकती हैं.

किसानों का रोष भी यहां असर दिखला सकता है खासकर जट सिखों के बीच, जिनकी उधम सिंह नगर में अच्छी-खासी संख्या है और खटीमा उसका हिस्सा है. पारंपरिक तौर पर, यह समुदाय भाजपा को वोट देता आया है लेकिन हाल की घटनाओं को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि इस बार निष्ठाएं बदल सकती हैं.

खटीमा के जट सिखों के मोटे तौर पर 10,000 वोट हैं और मुस्लिम वोटों की संख्या भी करीब 20,000 है—इन संख्याओं से धामी की टीम थोड़ी असहज है. दूसरी ओर, निवर्तमान मुख्यमंत्री होने और सिर पर आलाकमान का हाथ होना धामी के लिए राहत की बात है.

वहीं, आम आदमी पार्टी ने यहां से जट सिख, सविंदरजीत कालेर को खड़ा किया है और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने आसिफ मियां को उम्मीदवार बनाया है, ऐसे में टीम धामी को यकीन है कि अंकगणित उनके पक्ष में है.

दूसरी जगह भी फंस गए रावत

उत्तराखंड में भी कांग्रेस 'ओल्ड गार्ड’ बनाम 'न्यू गार्ड’ की लड़ाई की तरफ बढ़ती दिख रही है. हरीश रावत आलाकमान के भरोसे बैठे हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि टिकट वितरण में उनकी नहीं, बल्कि नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह की चली.

देहरादून में तो यह भी चर्चा है कि रावत की चुनौती खत्म करने के लिए उन्हें 2017 जैसी स्थिति में डाल दिया गया है. पिछले चुनाव में रावत हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा दोनों सीट से हार गए थे. इस बार वे पक्की जीत के वास्ते रामनगर सीट के लिए कांग्रेस आलाकमान के सामने अड़ गए थे.

मगर पार्टी के विरोधी खेमे ने उस सीट पर कभी उनके सिपहसालार रहे रणजीत रावत को आगे कर दिया. फिर रावत को समझाया गया कि वे लालकुआं से चुनाव लड़ लें. लेकिन यहां भी पहले कांग्रेस का टिकट पा चुकी प्रीतम खेमे की संध्या डालाकोटी ने पर्चा वापस नहीं लिया और वे निर्दलीय मैदान में हैं.

रावत उन्हें मनाने के लिए तीन दिन तक लालकुआं में डेरा डाले रहे और अब कह रहे हैं कि संध्या उनकी बेटी जैसी हैं, पता होता कि बेटी पर्चा वापस करने को राजी नहीं तो यहां कभी लड़ने नहीं आता.

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