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कृषि कानूनः पंजाब ने बढ़ाया दबाव

राजकोषीय चुनौतियों के अलावा अमरिंदर के सामने यह भी सवाल है कि क्या वे अपने इन विधेयकों के फायदे को लेकर किसानों को संतुष्ट करने में सफल हुए हैं. किसान संगठन इनमें से कुछ संशोधनों को बेअसर मानते हैं

राजधानी में मोर्चा दिल्ली में 4 नवंबर को धरने में पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह राजधानी में मोर्चा दिल्ली में 4 नवंबर को धरने में पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह

पंजाब विधानसभा ने 20 अक्तूबर को चार विधेयक पारित किए, जिनमें तीन राज्य के किसानों को केंद्र के नए कृषि कानूनों—फारमर्स प्रोड्यूस ट्रेड ऐंड कॉमर्स (प्रमोशन ऐंड फैसिलिटेशन) ऐक्ट, 2020, फारमर्स (एंपावरमेंट ऐंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्युरेंस ऐंड फार्म सर्विसेज ऐक्ट,2020, और एसेंशियल कमोडिटीज एमेंडमेंट बिल, 2020—के प्रतिकूल प्रभाव से बचाने के लिए पेश किया गया. चौथा विधेयक कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर (सीपीसी) में संशोधन के लिए है ताकि अपनी शिकायतों के लिए किसान सिविल अदालतों का दरवाजा खटखटा सकें. इन कानूनी कदमों ने अमरिंदर सिंह सरकार और भाजपा शासित केंद्र सरकार को टकराव के रास्ते पर खड़ा कर दिया है.

इन विधेयकों को कानून का रूप लेने के लिए पंजाब के राज्यपाल वी.पी. बाडनोर की मंजूरी लेनी होगी लेकिन केंद्र और राज्य के कानूनों के बीच टकराव को देखते हुए संभावना यही है कि वे इन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पास भेज देंगे. बहरहाल, अमरिंदर के सामने केवल यही चुनौती नहीं है. केंद्रीय कानूनों के खिलाफ किसानों के बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के कारण पंजाब का जनजीवन ठप पड़ गया है. सितंबर के आखिरी दिनों से विरोध करने वाले किसानों ने राजमार्गों, मॉल, पेट्रोल पंपों और बिजली के संयंत्रों को अवरुद्ध कर रखा है.

सबसे ज्यादा रेलगाड़ियों की आवाजाही पर असर पड़ा है क्योंकि रेल की पटरियों और स्टेशनों पर किसानों का मोर्चा लगा है. रेलवे बोर्ड के सीईओ वी.के. यादव के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने दो पटरियों और 22 रेलवे स्टेशनों पर डेरा डाल रखा है. अमरिंदर सरकार जब तक किसानों से अपना आंदोलन वापस लेने के लिए राजी नहीं कर लेती है तब तक मालगाडिय़ों और यात्री गाडिय़ों का आवागमन शुरू नहीं हो सकता है. पंजाब एवं हरियाण हाइकोर्ट जिस तरह राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बहाल करने में राज्य सरकार की असमर्थता पर नाराजगी जाहिर कर रहा है, उसे देखते हुए अमरिंदर पर दबाव बढ़ता जा रहा है.

भाजपा का आरोप है कि अमरिंदर परोक्ष रूप से किसानों के विरोध को समर्थन दे रहे हैं, जबकि केंद्र ने खरीफ के मौसम में धान की खरीद के लिए ग्रामीण विकास कोष (आरडीएफ) के तौर पर पंजाब को 1,100 करोड़ रु. का भुगतान करने से इनकार कर दिया है. फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआइ) की ओर से गेहूं और धान की सरकारी खरीद पर 3 प्रतिशत का आरडीएफ प्रभार लगाया जाता है. पीयूष गोयल के अधीन केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य तथा सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने पिछले सीजन में जारी आरडीएफ के लिए पंजाब सरकार से 'उपयोग प्रमाण पत्र' की मांग की थी जिसे पेश न करने पर नया भुगतान रोक दिया था.

अमरिंदर की परेशानियों में इजाफा करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने एफईएमए (फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट ऐक्ट) के तहत उनके बेटे रणिंदर सिंह को समन भेजा है. उनके ऊपर 2016 में कथित रूप से कुछ रकम स्विट्जरलैंड भेजने और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड में जैकारांडा ट्रस्ट और उसकी कुछ सहायक कंपनियां बनाने का आरोप है. अमरिंदर ने न केवल समन भेजने के समय पर सवाल उठाया है, बल्कि यह भी खुलासा किया है कि उनकी पत्नी प्रणीत कौर और उनके पोते-पोतियों को भी आयकर विभाग की ओर से नोटिस भेजे गए हैं. अमरिंदर ने भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और गोयल को इस मुद्दे पर पत्र लिखे हैं. 4 नवंबर को उन्होंने दिल्ली में एक धरने में हिस्सा लिया था.

उसके अगले दिन प्रणीत कौर के नेतृत्व में पंजाब से आठ सांसदों ने रेलवे मंत्री गोयल से मुलाकात की, जिन्होंने प्रतिनिधियों को बताया कि रेल सेवाएं तभी शुरू की जाएंगी जब पंजाब सरकार रेलवे की संपत्ति, यात्रियों और कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी ले. किसानों के विरोध प्रदर्शनों का पंजाब की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ा है. रेलवे का अनुमान है कि उसे करीब 500 करोड़ रु. का नुक्सान हो चुका है तो राज्य में उद्योग समूहों का भी दावा है कि हर रोज करीब 1,500 करोड़ रु. का नुक्सान उठाना पड़ रहा है. रेल सेवाएं रुक जाने से पंजाब को कोयला और फर्टिलाइजर की आपूर्ति नहीं हो पा रही है. राज्य में ऊनी कपड़े, ऑटो पार्ट और हाथ के उपकरण तथा अन्य सामान, जिसका निर्यात होता है, फंसे पड़े हैं.

इसके अलावा पंजाब को बिजली के संकट का भी सामना करना पड़ रहा है. इसके पांच ताप बिजली संयंत्र—दो राज्य सरकार के और तीन निजी क्षेत्र के—की कुल क्षमता प्रति दिन 5,680 मेगावाट की है. इनमें से दो निजी संयंत्रों को कोयले की आपूर्ति नहीं हो पा रही है और वे 1 अक्तूबर से बंद पड़े हैं, दूसरे संयंत्रों का ईंधन भंडार नवंबर के पहले सप्ताह में ही खत्म हो चुका है. चालू सीजन में पंजाब को हर रोज 7,500 मेगावाट बिजली की जरूरत होती है. इसमें केवल 1,200 मेगावाट बिजली ही अक्षय ऊर्जा स्रोतों के जरिए मिल पा रही है.

राजकोषीय चुनौतियों के अलावा अमरिंदर के सामने यह भी सवाल है कि क्या वे अपने इन विधेयकों के फायदे को लेकर किसानों को संतुष्ट करने में सफल हुए हैं. किसान संगठन इनमें से कुछ संशोधनों को बेअसर मानते हैं. उदाहरण के लिए, सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम पर गेहूं और धान की बिक्री और खरीद पर कम से कम तीन साल की जेल और आर्थिक दंड का प्रावधान किया है. लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि इन दोनों फसलों को पहले ही एफसीआइ न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद रही है और इस तरह का कोई भी प्रावधान तभी फायदेमंद होगा जब राज्य में यह सभी फसलों पर लागू हो (देखें: कानूनी उलझन).

शुरू में पंजाब में सभी पार्टियों के 31 किसान संगठन विरोध प्रदर्शन करने के लिए ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी की छतरी के नीचे आ गए थे. कमेटी में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) और यहां तक कि आरएसएस से जुड़े भारतीय किसान संघ के आठ गुट शामिल थे. धीरे-धीरे यह आंदोलन दूसरे किसान संगठनों के हाथों में चला गया, जिनमें वामपंथी पार्टियों के समर्थन वाले बीकेयू के गुट और शिरोमणि अकाली दल तथा आम आदमी पार्टी के समर्थन वाले संगठन शामिल हैं.

इन संगठनों का कहना है कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में लाए गए विधेयक कहीं ज्यादा प्रभावी हैं क्योंकि उन्होंने पूरे राज्य को एक एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी) बाजार के रूप में संगठित कर दिया है. अकाली दल प्रमुख सुखबीर बादल कहते हैं, ''केंद्रीय कृषि कानूनों से सीधे टकराव की जगह पंजाब को छत्तीसगढ़ कृषि उपज मंडी (संशोधन) बिल की तर्ज पर बदलाव करना चाहिए था. इस बिल ने पूरे राज्य को कृषि उपज के एक संगठित बाजार के रूप में घोषित कर दिया है.''

पंजाब की भाजपा इकाई, जिसे किसानों का गुस्सा झेलना पड़ रहा है, इस विरोध के कारण व्यापारियों और कारखानों के मालिकों को हो रहे नुक्सान को देखते हुए उन्हें गोलबंद करने की कोशिश कर रही है और इस स्थिति का फायदा उठाने में लग गई है. अमरिंदर सिंह के सामने अब व्यापारी समुदाय को भी मनाने की चुनौती है. किसानों का दिल जीतने की कोशिश के साथ ही उन्हें इस आंदोलन से होने वाले आर्थिक नुक्सान पर भी नजर रखने की जरूरत है. आने वाले कुछ सप्ताह उनके और पंजाब दोनों के लिए बहुत नाजुक हैं. केंद्र का सौतेला रवैया भी उनके लिए मुसीबत का सबब बन सकता है. उम्मीद यही है कि कोई हल निकले.

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