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विधानसभा चुनाव 2022ः सरदारों का मुकाबला

चार मजबूत धुरंधरों के बीच जोरदार बहुध्रुवीय चुनावी मुकाबला. कौन जीतेगा यह चुनाव—और पंजाब?

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चार दलों की चुनावी जंग चमकौर साहिब विधानसभा क्षेत्र में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी चार दलों की चुनावी जंग चमकौर साहिब विधानसभा क्षेत्र में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी

वसंत के दिन हैं और पंजाब की उपजाऊ सरजमीं गेहूं के हरे झिलमिलाते खेतों और सरसों के धधकते पीले फूलों के लहलहाते नजारे पेश कर रही है. मगर लोगों के लिए असंतोष की सर्दियां जारी हैं. यह फलता-फूलता सरहदी राज्य हाल के सालों में कर्ज के दलदल में धंसता गया, ज्यादातर नौजवान बेरोजगार और हताश हैं. राजनीति बंट गई है. भारत का अन्न भंडार, पंजाब- भारत का 20 फीसद गेहूं और 12 फीसद चावल उगाता है-कराह रहा है. अगर आधुनिक सघन खेती के बजाए बारी-बारी से गेहूं और चावल की फसलें उगाने के मौजूदा सिलसिले में आमूलचूल बदलाव नहीं होता, तो राज्य में खुशहाली लाने वाली खेती ही मौत का फंदा साबित हो सकती है. भूमिगत जल घटकर अत्यंत निचले स्तर तक चला गया है और उसके साथ फसलों की उत्पादकता और आमदनी का स्तर भी. राज्य अस्तित्व के गंभीर संकट की यंत्रणा झेल रहा है और अपनी जादुई ताकत फिर खोजने के लिए कसमसा रहा है.

पंजाब के 2.1 करोड़ मतदाताओं को 20 फरवरी को बहुत सावधानी से अपना भविष्य चुनना होगा. उनके सामने सवाल यह है—उन्हें इस खतरनाक दलदल से निकालने की अगुआई कौन करे? पहली बार उनके सामने चुनने के लिए तरह-तरह की पार्टियां और प्रतियोगी हैं. बीते दो दशकों में उन्होंने हुकूमत करने के लिए राज्य की 117 सदस्यीय विधानसभा में किसी एक या दूसरी पार्टी को निर्णायक जनादेश दिया है. मगर इस बार राजनैतिक पंडित भी उलझन में हैं. विकास अर्थशास्त्री और राजनैतिक विश्लेषक प्रमोद कुमार कहते हैं, ''ये असल में छोटे-छोटे 117 चुनाव हैं, हर निर्वाचन क्षेत्र अपने आप में एक चुनाव है. किसी दल के पास मुफ्त रेवड़ियां बांटने के अलावा कोई निश्चित कार्यक्रम या अलग विचारधारा दिखाई नहीं देती.

विधानसभा चुनाव 2022ः सरदारों का मुकाबला
विधानसभा चुनाव 2022ः सरदारों का मुकाबला

वे खुद को अलग कहते हैं पर अलग दिखते नहीं. 50 साल में पहली बार मेरे लिए समझना मुश्किल हो रहा है कि पंजाब किस राह जा रहा है.'' पंजाब में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) तथा उसकी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच दोध्रुवीय मुकाबला हुआ करता था. फिर 2017 में आम आदमी पार्टी मैदान में आई. उस साल तिकोना मुकाबला हुआ, जिसमें पटियाला के नाममात्र के महाराजा कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुआई में कांग्रेस ने 77 सीटों के साथ जोरदार बहुमत हासिल किया.

पांच साल बाद कांग्रेस बुरी तरह बंट गई है और अच्छी टक्कर दे पाने की जद्दोजहद कर रही है. कार्यकाल पूरा करने से महज पांच महीने पहले कटु और अप्रिय ढंग से हटाए जाने के बाद अपमानित अमरिंदर ने अपनी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस (पीएलसी) बनाई और चुनाव में उतरने के लिए उसी भाजपा के साथ गठबंधन किया, जिसका वे लंबे वक्त से विरोध करते आए थे. कांग्रेस ने छोटा-मोटा तख्तापलट करते हुए चरणजीत सिंह चन्नी को राज्य का पहला दलित मुख्यमंत्री बना दिया—पंजाब की आबादी में दलितों का अनुपात भारत में सबसे ज्यादा है और विभिन्न धर्मों में बिखरे एक-तिहाई वोट इसी जाति समुदाय के हैं. मगर पार्टी क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू की खुन्नस और असंतोष से दोचार है जो भाजपा छोड़ कांग्रेस में आए और महज नौ महीने पहले उसके अध्यक्ष बने. 

मानो यही चक्कर में डालने के लिए काफी न हो, अब रद्द कर दिए गए केंद्रीय कृषि कानूनों की वजह से सुखबीर सिंह बादल की अगुआई वाले अकाली दल ने सितंबर 2020 में भाजपा से अपना पारंपरिक गठबंधन तोड़ दिया. उसकी बदौलत मिलने वाले वोटों के नुक्सान की भरपाई के लिए और चन्नी के दलित समर्थन में सेंध लगाने की गरज से उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से हाथ मिला लिया. उधर बदलाव का वादा करते हुए आप ने दो बार के लोकसभा सांसद भगवंत सिंह मान को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया, जिन्होंने अपनी मशहूर चुस्त और हाजिरजवाब टिप्पणियों से पार्टी के प्रचार अभियान को जगमगा दिया है.

विधानसभा चुनाव 2022ः सरदारों का मुकाबला
विधानसभा चुनाव 2022ः सरदारों का मुकाबला

चुनावी कुंभ में पंजाब के किसानों का एक नया राजनैतिक संगठन भी आ गया है, जिसकी अगुआई बलबीर सिंह राजेवाल कर रहे हैं, जो मोदी सरकार को कृषि कानून वापस लेने के लिए सफलतापूर्वक मजबूर कर देने वाले किसान आंदोलन की अगली कतार में थे. व्यापक रूप से माना जा रहा है कि 22 किसान यूनियनों का यह संगठन संयुक्त समाज मोर्चा (एसएसएम) आप के वोट काटेगा जबकि प्राथमिक तौर पर इसकी जाट-सिख रंगत के कारण दलित और व्यापारी सवर्ण हिंदू विरोध में लामबंद होने लगे हैं. लगातार बदलते मंजर ने चुनाव को मनोरंजक बना दिया है पर इसके नतीजे राज्य और देश पर दूरगामी असर डालेंगे.

चन्नी: छुपा रुस्तम

राहुल गांधी ने जब 58 वर्षीय चन्नी को बताया कि उनका मुख्यमंत्री के रूप में राजतिलक किया जा रहा है, तो वे खुलकर रो पड़े. उस राज्य में जहां नेतृत्व जाट-सिखों का विशेषाधिकार रहा है, दलित चन्नी की नामजदगी को पहले कांग्रेस के मास्टरस्ट्रोक के रूप में देखा गया—इससे उसे अमरिंदर की अप्रिय ढंग से हुई विदाई से पैदा खटास का नुक्सान कम करने में मदद जो मिली. मामूली साधन-संपन्न तंबू मालिक के बेटे चन्नी 2012 में कांग्रेस में आए—विडंबना यह कि तब अमरिंदर ने कांग्रेस के बागी पर तरजीह देकर उन्हें चुना था. फिर 2017 में जब कांग्रेस सत्ता में आई तो उन्होंने ही उन्हें तकनीकी शिक्षा का कैबिनेट मंत्री भी बनाया. किस्मत इस तरह पलटी कि निजी खुन्नस और गहरे मायनों वाली हाजिरजवाबी के निशान छोड़ गई.

अमरिंदर को लगता है कि चन्नी काबिल मंत्री थे पर उनके पास ''मुख्यमंत्री बनने की बैंडविड्थ नहीं है.'' अपने पूर्व बॉस के इस नीचा दिखाने वाले आकलन को चन्नी यह कहकर झटक देते हैं, ''मैं गरीब परिवार से हूं, वे अमीर परिवार से हैं. वे यह सच्चाई कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि गरीब आदमी का बेटा अब मुख्यमंत्री है?'' चन्नी मानते हैं कि भाजपा से हाथ मिलाकर अमरिंदर सत्ता विरोधी भावना का वह बोझ भी ले गए हैं, जो अन्यथा कांग्रेस को अपने कंधों पर ढोना पड़ता.

विधानसभा चुनाव 2022ः सरदारों का मुकाबला
विधानसभा चुनाव 2022ः सरदारों का मुकाबला

हालांकि शुरुआत में उन्हें सीधा-सादा कामचलाऊ मुख्यमंत्री माना गया, जिसे मुश्किल चुनाव से पहले अच्छा माहौल बनाने की मंशा का फायदा मिला. मगर नए मुख्यमंत्री अपने विरोधियों के अंदाज से कहीं ज्यादा चालाक साबित हुए. कमान संभालते ही उन्होंने खैरातों का पिटारा खोल दिया. बाकी चीजों के अलावा बिजली की दरें घटाईं और 50 लाख उपभोक्ताओं का बकाया माफ किया. फिर जिसे वे 'स्थापित माफिया' कहते हैं, उसे निशाने पर लेते हुए उन्होंने रेत की दरें करीब दो-तिहाई घटा दीं और सुखबीर बादल के साले बिक्रम सिंह मजीठिया के खिलाफ अवैध नशीले पदार्थों से जुड़े मामले में एफआइआर दर्ज कराई. इससे उनकी हैसियत बढ़ी. उन्होंने कार्यक्रमों में भांगड़ा करके, सड़क यात्राओं के दौरान राहगीरों से मिलकर और गपियाकर तथा जनता के लिए आम तौर पर सुलभ रहकर अपने को पंजाब के लोगों का और भी दुलारा बना लिया. यह अमरिंदर की एकांतप्रियता और कथित गुरूर के एकदम विपरीत था. अमरिंदर को लजीज खान-पान के लिए जाना जाता है, तो चन्नी आम आदमी का खाना, गर्म चाय के साथ पराठा और अचार, खाकर खुश हैं. वे पूरी कड़ाई से काम लेते हैं और उन्होंने सुबह तड़के जागकर देर रात तक काम करने की मिसाल कायम की.

फिर पिछले हफ्ते चन्नी ने नेतृत्व की लड़ाई में सिद्धू को पटखनी दे दी, जब उन्हें आने वाले चुनाव के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया. उससे पहले कांग्रेस रणनीतिक तौर पर तटस्थ बनी रही और कह रही थी कि चुनाव चन्नी (दलित), सिद्धू (जाट सिख) और सुनील जाखड़ (हिंदू) की मजबूत तिकड़ी के सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाएगा. मगर सिद्धू अपने बयानों से चन्नी की अगुआई पर तंज कसते रहे, जिनमें उनका यह बयान भी था, ''ऊपर के लोग कमजोर मुख्यमंत्री चाहते हैं जो उनकी धुन पर...ता ता थैया करे. क्या आप ऐसा मुख्यमंत्री चाहते हैं?'' इसी मौके पर चन्नी ने स्पष्टता की मांग की. आप की तरफ से मान को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से भी उन्हें मदद मिली.

विधानसभा चुनाव 2022ः सरदारों का मुकाबला
विधानसभा चुनाव 2022ः सरदारों का मुकाबला

हाल ही में राहुल, सिद्धू और एआइसीसी के महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल के साथ एक ही कार में सफर करते हुए चन्नी ने यह बात छेड़ी. उन्होंने कहा कि दोनों में से एक को साफ तौर पर चुनना अच्छा होगा और वे पार्टी के चुने गए शख्स के लिए रास्ता छोड़ने को तैयार हैं. सिद्धू जाल में फंस गए और उन्होंने भी यही पेशकश कर डाली, इस यकीन के साथ कि दोनों में वे ज्यादा लोकप्रिय हैं. राहुल ने फिर आंतरिक चुनाव करवाया, पर उससे पहले दोनों नेताओं से वादा करवा लिया कि वे फैसला मानेंगे. पता चला कि लड़ाई का यह दौर चन्नी जीत गए और सिद्धू सन्नाटे मं  आ गए, जो विरले ही होता है. मगर बयानबाजी से वे चन्नी की चमक को नुक्सान पहुंचा चुके हैं.

स्पष्ट जनादेश के साथ चन्नी इसी से उबरने की कोशिश में लगे हैं. चंडीगढ़ से करीब घंटे भर की ड्राइव पर अपने निर्वाचन क्षेत्र चमकौर साहिब की यात्रा के दौरान चन्नी एक गांव में पानी की टंकी और नई बनी सड़क की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि अपनी सत्ता के 111 दिनों में उन्होंने पूरे राज्य में तेजी से विकास किया है. उन्होंने कहा, ''आप केवल वादे करती है, हमने करके दिखा दिया. अगर लोगों ने मुझे पूरे पांच साल का कार्यकाल दिया तो मैं बहुत कुछ करके दिखा सकता हूं.'' एक गांव में लोग कांग्रेस का हाथ के निशान के झंडे लहराते हुए कहते हैं, ''साड्डा चन्नी, साड्डा सीएम (हमारा चन्नी, हमारा सीएम).'' तो भी कांग्रेस और चन्नी के सामने मुश्किल काम है. सत्ता विरोधी भावना अब भी एक कारक है. चन्नी जिस रामदसिया पंथ से आते हैं, वह कुल 32 फीसद दलित वोटों के महज एक-चौथाई ही है. अन्य दलित बिरादरों का विश्वास हासिल करने के लिए चन्नी को कड़ी मेहनत करनी होगी.

दूसरा पहलू यह है कि दलित एकता ताकतवर जाट सिखों को शायद रास न आए, क्योंकि वे अब भी उन्हें मालिक और गुलाम के पुराने रिश्ते के चश्मे से ही देखना चाहते हैं. लिहाजा वे अकाली दल के पीछे एकजुट हो सकते हैं. फिर चन्नी को पूरे मालवा इलाके के मूल बाशिंदे से कहीं ज्यादा दोआबा पट्टी के नेता के तौर पर देखा जाता है जबकि विधानसभा की अधिकतम सीटें (69) मालवा इलाके से आती हैं और ज्यादातर दलित यहीं रहते हैं. कांग्रेस ने चन्नी को मालवा में बरनाला जिले की भदौर सीट से चुनाव लड़ने की इजाजत दी ताकि दलितों के एक और तबके मजहबी सिखों /वाल्मीकियों के वोट बढ़ाए जा सकें, जो अक्सर रविदासिया पंथ के दबदबे का विरोध करता रहा है. एक और नकारात्मक कारक यह है कि आगे और बगावतों से सहमी कांग्रेस ने अपने ज्यादातर मौजूदा विधायकों को टिकट दे दिए, जिनमें काम न करने वाले भी कई हैं और इसकी कीमत उसे चुकानी पड़ सकती है. लेकिन अगर चन्नी कांग्रेस को जीत दिला पाते हैं, तो वे राष्ट्रीय नेता बन जाएंगे और कांशी राम के बाद ऐसा करने वाले पंजाब के दूसरे दलित होंगे.

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विधानसभा चुनाव 2022ः सरदारों का मुकाबला

मान: दूसरों से अलहदा नेता

व्यंगकार के साथ ऐसा होना विडंबना से कम नहीं जो मान के साथ हुआ—वे अपने राजनैतिक विरोधियों के लतीफों का निशाना बन गए हैं. दो प्रतिद्वंद्वियों पर एक ही पत्थर से वार करते हुए अमरिंदर ने मान को दूसरा सिद्धू करार दिया—''सिवाय इसके कि वे अपनी कुर्सी पर बैठकर नहीं हंसाते बल्कि खड़े-खड़े चुटकुले सुनाते हैं.'' चन्नी कहते हैं कि मान मुख्यमंत्री की कुर्सी के लायक नहीं, क्योंकि सरकार चलाने और मंच संभालने में भारी फर्क है. यह पंजाब की बहुध्रुवीय लड़ाई का ही संकेत है कि वे भी मजाक का सहारा लेते हैं और मान की बखिया उधेड़ते हुए लगे हाथ अपने पूर्व बॉस पर भी तंज कस देते हैं! वे कहते हैं, ''कैप्टन साब 4 बजे दुकान बंद कर देते हैं और घर पर पार्टी शुरू हो जाती है. मान 6 बजे से ऐसा करते हैं—दो ही घंटे का तो फर्क है.'' सुखबीर ज्यादा सीधी चोट करते हैं, ''वे लगातार पीने वाले शख्स हैं और मैं उस दिन का सोच कर ही कांप उठता हूं जब राज्य की बागडोर उनके जैसे लोगों के हाथ में होगी.''

तंज और कटाक्षों के इस जलजले से 48 वर्षीय मान जरा नहीं डगमगाते. तुर्शी-ब-तुर्शी जवाब देते हुए वे कहते हैं, ''मैं व्यंगकार और सामाजिक आलोचक हूं, कॉमेडियन नहीं. लोगों के जनादेश का मजाक तो कैप्टन साब ने बनाया था. साढ़े चार साल उन्होंने महल के दरवाजे लोगों के लिए नहीं खोले.'' सुखबीर की बात को वे यह कहकर झटक देते हैं, ''लोग अब उन पर भरोसा नहीं करते. वे सांसद हैं पर संसद नहीं जाते. सात साल से इसी तरह की बातें कहकर वे मुझे ठिकाने लगाने की कोशिश करते आ रहे हैं.'' जहां तक चन्नी की बात है, वे उनकी बुनियादी ताकत पर चोट करते हुए कहते हैं, ''वे खुद को आम आदमी कहते हैं पर 110 करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति घोषित की. वे नकली आम आदमी हैं.'' आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने जब उन्हें मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया, तो चन्नी की तरह मान भी रो पड़े थे.

यह फैसला उस संवेदनशील मुद्दे पर विपक्ष की आलोचना को भोथरा करने की गरज से लिया गया जिसने पिछली बार भी आप को नुक्सान पहुंचाया था कि अगर आप जीतती है तो केजरीवाल खुद पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की राह तैयार कर रहे हैं. मान को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने से सिख वोटरों को यह भरोसा मिलेगा कि पार्टी पर हिंदुओं का दबदबा नहीं होने जा रहा है. मगर इससे यह छींटाकशी नहीं रुकी कि मान तो केजरीवाल के रबड़ स्टांप भर होंगे और खुद केजरीवाल रिमोट से राज्य को चलाने का मंसूबा बना रहे हैं. शुरुआत में इस चर्चा को तब और विश्वसनीयता मिली जब पार्टी ने अपने चुनाव निशान झाड़ू और केजरीवाल की तस्वीर वाले झंडे बांटे, जिन पर 'एक मौका केजरीवाल नू (एक मौका केजरीवाल को)' नारा लिखा था. कठपुतली मात्र होने के आरोप का जवाब देते हुए मान कहते हैं, ''कैप्टन मुख्यमंत्री के नाते सोनिया गांधी से मिलने दिल्ली गए और उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया. शर्म पंजाब को झेलनी पड़ी. चन्नी को देखिए... उन्हें जब देखो तब दिल्ली बुलाया जाता है. इसके विपरीत मैं बीते चार साल में शायद एक बार दिल्ली गया. खुद केजरीवाल पंजाब आते हैं.''

इसमें कोई शक नहीं कि मुकाबले में उतरी चारों बड़ी पार्टियों में अकेली आप ही है जो बदलाव की नुमांइदगी कर रही है—यह उसके अभियान की बार-बार दोहराई जाने वाली टेक भी है. उसकी तरंगों की कुछ गूंज जमीन पर भी सुनाई दे रही है—आप के सिर पर कोई बोझ नहीं है, अभी तक बेदाग पार्टी है और मौका मिले तो अपनी काबिलियत साबित करके दिखाएगी. यह एहसास सभी उम्र के लोगों में है. मान को मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है, यह तब भी जाहिर हुआ जब उन्होंने वाहनों के लंबे काफिले के साथ रैली निकाली, जो आनंदपुर साहिब से शुरू हुई और दोआबा इलाके के बड़े शहरों और कस्बों से गुजरते हुए आगे बढ़ी. हर कस्बे और शहर में उत्साही कार्यकर्ता काफिले में शामिल होते गए और ऐसा उन्होंने पंजाब के परिचित अंदाज में किया—ट्रैक्टरों पर सवार, जिन पर डिस्को लाइटें चमक रही थीं और स्पीकरों पर भगत सिंह से जुड़े देशभक्ति के गाने जोर-शोर से बज रहे थे. आप के झंडे लहराती कारों और दोपहिया वाहनों की कतारें काफिले में जुड़ती गईं.

एक एसयूवी के ऊपर खड़े मान हाथ लहरा रहे थे और अपनी तरफ उछाली गई फूलमालाएं स्वीकार कर रहे थे. भगत सिंह को जोड़कर अच्छा पुट दिया गया, क्योंकि मान अक्सर कहते रहे हैं कि वे इस स्वतंत्रता सेनानी से प्रेरित हैं और 2014 में लोकसभा में शपथ लेने से पहले उन्होंने उनकी तस्वीर के आगे खड़े होकर सौगंध ली थी. उनके सम्मान में अब वे प्रतीकस्वरूप बसंती रंग का साफा बांधते हैं. वसंत, सरसों के खेत... सारे रूपक उनके मुआफिक बैठते दिखाई दे रहे हैं.

तिस पर भी मान को जीतने के लिए जोशीले प्रतीकवाद से कहीं ज्यादा की जरूरत होगी. उन्हें अपने विजन को उन खैरातों से कहीं ज्यादा अर्थपूर्ण बनाना होगा जिनका वादा आप कर रही है. आप 2017 में चुनाव जीतती दिखाई दे रही थी, पर फिर झूठी तारीफों के झांसे में आ गई. अंतत: उसे अच्छे-खासे 24 फीसद वोट मिले, पर सीटें महज 20 हाथ आईं. इस बार पार्टी दोहरी सावधानी बरत रही है. दिल्ली से आए कर्ताधर्ताओं का मान की गतिविधियों और इंटरव्यू पर पूरा नियंत्रण है ताकि वैसी गड़बड़ी न हो जैसी 2017 में केजरीवाल कर बैठे थे, जब उन्हें खालिस्तानी कड़ियों से जुड़े लोगों को रिझाते देखा गया था. हिंदू मतदाताओं ने तब कांग्रेस के इर्द-गिर्द एकजुट होकर जीत उसकी झोली में डाल दी थी. मान बेरोजगारी पर जोर दे रहे हैं, पर रोजगार पैदा करने का असल एजेंडा साफ दिखाई नहीं देता. कुमार कहते हैं, ''नीली पगड़ी को आप की सफेद टोपी से बदलने भर से बदलाव नहीं आ सकता. यह पार्टी अब दूसरी पार्टियों की खुरचनों से भरी पड़ी है—बदला क्या है?'' यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर मान और उनके साथियों को मतदान की तारीख 20 फरवरी से पहले देना होगा.

सुखबीर:सीएम यानी सीईओ

सुखबीर बादल आत्मविश्वास की मूरत हैं. कभी पंजाब की इस्पात नगरी रहे मंडी गोबिंदगढ़ की तरफ जाने वाले चार लेन के चकाचक स्टेट हाइवे पर तेज दौड़ती अपनी क्रीम रंग की टोयोटा लैंड क्रूजर की अगली सीट पर बैठे 59 वर्षीय सुखबीर गर्दन पीछे घुमाकर कहते हैं, ''जरा सड़कों की क्वालिटी देखिए—उन 10 साल में यह हमने किया जब हम सत्ता में थे. पंजाब को मेरे जैसे मजबूत, निर्णायक और जोशीले मुख्यमंत्री की जरूरत है—कॉमेडियनों की नहीं.'' अपने विशाल कारोबारी हितों को लेकर, जिनमें होटल, ट्रांसपोर्ट गाड़ियां और टीवी चैनल शामिल हैं, सुखबीर क्षमायाचना की मुद्रा में नहीं हैं और कहते हैं कि वे सीधे इन्हें नहीं चलाते, वे तो केवल प्रोमोटर हैं. वे कहते हैं, ''जो शख्स कामयाब कारोबार चलाता है, वह कामयाबी से राज्य भी चला सकता है. सीएम को राज्य का सीईओ होना चाहिए—उसके पास विजन होना चाहिए और उसे पता होना चाहिए कि लोगों से उस पर अमल कैसे करवाए.''

युवा बादल अपने बॉस खुद हैं और पहली बार विधानसभा चुनाव में शिअद पर उनका पूरा नियंत्रण है. वे पांच बार मुख्यमंत्री रह चुके और 94 बरस की उम्र में अब भी चुनाव लड़ रहे पिता प्रकाश सिंह बादल की छाया से उबर आए हैं. सुखबीर कहते हैं कि उनके पिता ने उन्हें जटिल समस्याओं को धैर्य से सुलझाना सिखाया, ''यह ऐसा अनुभव है जो आपको कहीं और नहीं मिल सकता.'' वंशवादी एकाधिकार में धंसती अकाली विरासत को लेकर की जा रही आलोचना को वे झटक देते हैं—उनकी पत्नी हरसिमरत कौर केंद्रीय मंत्री थीं, साले बिक्रम सिंह मजीठिया पार्टी के ताकतवर विधायक हैं. वे कहते हैं कि उन्होंने पार्टी का भरोसा जीतने और अपनी संगठन क्षमता साबित करने के लिए कड़ी मेहनत की. शिअद दशकों बाद ऐसा चुनाव लड़ रहा है जब सहयोगी दल के रूप में भाजपा साथ नहीं है—कृषि कानूनों से जुड़े होने की तोहमत से होने वाला नुक्सान कम से कम करने की गरज से पार्टी केंद्रीय मंत्रिमंडल से निकल आई थी. अमरिंदर मानते हैं कि केवल विरोध करके अकाली दल दोषमुक्त नहीं हो सकता और किसान अब भी उससे नाराज हैं. वे यह भी कहते हैं कि पवित्र सिख ग्रंथों के साथ बेअदबी और पंजाब के ड्रग माफिया सरीखे मुद्दे, जो 2017 में कांग्रेस के हाथों शिअद की हार के लिए कुछ हद तक जिम्मेदार थे, इस चुनाव में भी प्रासंगिक हैं.

जवाब में सुखबीर यह तथ्य सामने रखते हैं कि साढ़े चार साल सत्ता में रहने के बावजूद अमरिंदर कथित बेअदबी के पीछे कोई साजिश या मजीठिया के ड्रग तस्करी में शामिल होने के आरोप साबित करने में नाकाम रहे. वे भाजपा के साथ अमरिंदर की पीएलसी के गठबंधन के प्रति तिरस्कार जाहिर करते हुए कहते हैं, ''जीरो प्लस जीरो बराबर जीरो.'' भाजपा से शिअद के नाता तोड़ने का उन्हें कोई मलाल नहीं है. वे कहते हैं, ''2017 में हम 94 सीटों पर लड़े और भाजपा केवल 23 पर. हमारी 94 सीटों में करीब 60 पर उन्होंने हमें जीरो वोट का योगदान दिया.'' शिअद ने इस बार भाजपा के बजाए बसपा से हाथ मिलाया है—''मैंने मायावती को एक फोन किया और वे तैयार हो गईं''—और मानता है कि इसकी बदौलत उसे कुछ इलाकों में कम से कम 5,000 वोट और 'दोआबा में प्रति निर्वाचन क्षेत्र करीब 30,000 वोट' मिलेंगे.

पंजाब में दलित सिखों में भी बसपा का काडर है, जिनमें से कई पंथिक झुकाव वाले हैं. अकालियों के साथ जाने को वे सिख एकजुटता के रूप में देखते हैं, जो उनके लिए हिंदुत्व-उन्मुख भाजपा के साथ सत्ता साझा करने के बजाए बेहतर विकल्प है. सुखबीर बीते छह महीनों में अकाली दल से छिटके ज्यादातर छोटे-छोटे धड़ों को भी वापस पार्टी के पाले में लाने में कामयाब रहे, जिनमें रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, रत्तन सिंह अजनाला और उजागर सिंह वडाली की अगुआई वाले धड़े भी हैं. वे प्रेम सिंह चंदूमाजरा, तोता सिंह और सिकंदर सिंह मलूका सरीखे पंथिक नेताओं को भी, उनके बेटों को या तो टिकट देकर या पार्टी संगठन में पद देकर, अपने साथ ले आए. इन कदमों से अपने पारंपरिक पंथिक वोटों पर शिअद की पकड़ मजबूत हुई है.

सुखबीर मानते हैं कि शिअद जीत सकता है, क्योंकि 'किसी भी दूसरी पार्टी के मुकाबले हमारा संगठन सबसे अच्छा है' और शिअद 'अकेली सच्ची पंजाबी पार्टी है.' केजरीवाल पर वे कहते हैं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री फ्रेंचाइजी मॉडल थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जो पंजाब के मुनासिब नहीं है. वे हितों के संभावित टकराव पर भी जोर देते हैं—केजरीवाल सतलज-यमुना लिंक नहर का पानी दिल्ली ले जाना चाहते हैं जिससे पंजाब का नुक्सान होगा. वे विकास को अगली पायदान पर ले जाने और कारोबार करना आसान बनाने का वादा करते हैं. शहरी सीटों पर उसके सामने आप और किसान यूनियनों के अलावा एक नया चैलेंजर है—भाजपा और उसके सहयोगी दल. उसे बेअसर करने के लिए सुखबीर हिंदुओं को रिझा रहे हैं—उन्होंने 35 हिंदू उम्मीदवारों को टिकट दिए. सुखबीर के फायदे की एक बात यह है कि उन्होंने टिकट बंटवारे के बाद प्रचार दूसरी पार्टियों के मुकाबले काफी पहले शुरू किया. अच्छे सीईओ की तरह बताया जाता है कि सुखबीर हर नतीजे के अनुरूप तैयारी कर रहे हैं और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में चुनाव बाद के सहयोगियों पर नजर रखना भी शामिल है.   
  
अमरिंदर: आखिरी दांव

सियासत भी अजीब शै है. 1984 के बाद 14 साल तक अकाली सियासत से चक्कर लगाकर आए अमरिंदर कोई एकव्रत राजनैतिक नहीं रहे हैं, पर वे भी पिछले सितंबर में अपनी जिंदगी में आए मोड़ से हैरत में होंगे. पहले तो उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और फिर कांग्रेस पार्टी छोड़नी पड़ी. उनकी विदाई कड़वाहट भरी थी: चोटिल कैप्टन ने गांधी परिवार पर उन्हें धोखा देने और उन्हें फर्नीचर की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था. महीनों बाद, चंडीगढ़ के बाहरी हिस्से में उनकी भव्य हवेली में, फव्वारों से आहिस्ते से उछलती बूंदों, एक स्विमिंग पूल और बाल्कनी में सूर्यास्त के साथ चुस्कियां लेने के लिए मेज पर पड़े अतीत के समय के चीते के मॉडल की मौजूदगी से एक शाही समां बंधता है, अमरिंदर कहते हैं, ''अब मुझे धोखे का एहसास नहीं होता, लेकिन वे लोग मुझे ठीक से समझ नहीं पाए, यह खलता है. उन्हें यह समझ नहीं आया कि देश को देने के लिए मेरे पास अब भी बहुत कुछ है और अगर मैं ऐसा कर सकता हूं तो मैं पीछे क्यों हटूं.'' आहत होने के इस भाव ने ही उन्हें 79 साल की उम्र में अपनी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस बनाने की ओर अग्रसर कर भाजपा से गठजोड़ करने को प्रेरित किया.

तो वे सीधे भाजपा में क्यों शामिल नहीं हुए? अमरिंदर जवाब देते हैं, ''मुझे लगा कि धर्मनिरपेक्षता मेरे परिवार की पृष्ठभूमि रही है और मैंने अमित शाह जी को कहा कि मैं आपके संघर्ष में साथ आना चाहता हूं लेकिन आपकी पार्टी में शामिल नहीं होऊंगा. उन्होंने यह बात मान ली और अगले दिन मुझे कॉल करके प्रधानमंत्री से बात करने को कहा.'' जल्दी ही अमरिंदर को पता चल गया कि नरेंद्र मोदी कितनी सुबह से काम करना शुरू कर देते हैं, जब सुबह के 6.30 बजे शाह के एक कॉल से उनकी नींद खुली जिन्होंने उनको बताया कि प्रधानमंत्री लाइन पर हैं और उनसे बात करना चाहते हैं. प्रधानमंत्री ने इस घटनाक्रम पर प्रसन्नता जाहिर की और इससे पीएलसी और भाजपा के बीच गठजोड़ की शुरुआत हुई. भाजपा ने उन्हें 37 सीटों का प्रस्ताव दिया और अमरिंदर मान गए क्योंकि, बकौल अमरिंदर, ''यह उम्मीदवारों की उपलब्धता पर आधारित था. हो सकता है मैं 10 और सीटें मांग लेता, लेकिन हम हैसियत से अधिक की मांग नहीं रखना चाहते थे.''

भाजपा ने जल्दी ही यह समझ लिया कि पीएलसी के लिए कामकाज कितना मुश्किल होने वाला है. भाजपा के एक पदाधिकारी ने टिप्पणी की, ''उनके लिए संगठन के लगभग सारे काम हमें ही करने थे और उनके उम्मीदवारों के लिए पैसे भी जुटाने पड़े. यह काम दो पार्टियां चलाने जैसा था.'' असल में अमरिंदर के पांच उम्मीदवारों ने लड़ने के लिए भाजपा का चुनाव चिन्ह चुना. इसके साथ, पार्टी 73 सीटों पर चुनाव लड़ रही है—पंजाब में यह उनकी सबसे अधिक सीट संख्या पर लड़ा जाने वाला चुनाव है. पार्टी ने सुखदेव सिंह ढींढसा के शिअद (संयुक्त) के साथ भी गठजोड़ किया है और उन्हें 16 सीटें दी हैं. भाजपा की रणनीति है कि अमरिंदर और ढींढसा को पाले में लाने से उनके पास दो रसूखवाले जट सिख हैं जो उन्हें उस समुदाय में पहुंच बनाने में मददगार होंगे जबकि पार्टी खुद पंजाब में हिंदू वोटों को एकजुट करेगी, जो कि 38 फीसद हैं.

हिंदू पारंपरिक रूप से कांग्रेस को वोट देते रहे हैं क्योंकि उन्हें आतंकवाद के खिलाफ उसके कड़े रवैए की याद है. भाजपा समझ चुकी है कि अमरिंदर के साथ सत्ताविरोधी रुझान का बोझ भी आया है, लेकिन वे कांग्रेस में विभाजन कराने में भी मददगार हो सकते हैं. यह रणनीति कारगर होती दिखती है क्योंकि कांग्रेस अगले किसी विभाजन के डर से अपने अधिकतर विधायकों को टिकट दे रही है, भले ही उनका प्रदर्शन कैसा भी रहा हो. अमरिंदर ने भाजपा को सिख संस्थाओं तक पहुंच बनाने में भी मदद की है, जहां उदार सिख उपदेशक हैं और उनके साथ रिश्ता सहज बनाया है.

मिसाल के तौर पर, दमदमी टकसाल के चीफ हरनाम सिंह धुम्मा ने सार्वजनिक बयान जारी करके 26 दिसंबर को गुरु गोविंद सिंह के दो साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह की शहादत की यादगारी में 'वीर बाल दिवस' घोषित करने के लिए प्रधानमंत्री की तारीफ की है. माना जाता है कि अमरिंदर इसके काफी निकट हैं. उधर, डेरा सच्चा सौदा के मुखिया राम रहीम सिंह फरलो पर रिहा हैं और भाजपा के नेता अमरिंदर सिंह के नेटवर्क के जरिए उनसे राजनैतिक समर्थन की कोशिश में लगे हैं—उनके पास गैर-अभिजात्य वर्ग का बड़ा समर्थक वर्ग मौजूद है. भाजपा के नेता और अमरिंदर का मानना है कि इस चुनाव में कमोबेश त्रिशंकु विधानसभा के नतीजे आएंगे. ऐसे में उनके पास दो विकल्प हैं: एक बार फिर से शिअद के साथ गठजोड़ बनाकर सरकार गठित करना या अगर कोई अनुकूल संख्या का परिणाम नहीं आता तो राष्ट्रपति शासन लगा देना.

उत्तर भारत में सर्दियों में खिचड़ी लोकप्रिय व्यंजन है. लेकिन, 2022 के वसंत में भी कई लोगों की प्लेट में खिचड़ी ही आने वाली है—पंजाब में चुनावी फिजा में मौजूदा स्थिति को देखकर यही लग रहा है. लेकिन जायकेदार विडंबना यह है कि हर दल को अपने पक्ष में मौका आता लग रहा है. आप, जिसका समर्थन सड़कों पर स्पष्ट दिखता है, उम्मीद लगाए बैठी है कि इस बार उनका दांव चल जाएगा. चन्नी की अगुआई में कांग्रेस भी सोच रही है कि सूबे के वोटर पहले दलित मुख्यमंत्री को दूसरा मौका देंगे. सुखबीर को लग रहा है कि पिता की सरकार में बरसों तक नायब रहने के बाद इस बार वे मुख्यमंत्री पद के हकदार हैं. अगर वे संख्या के मामले में थोड़ा पिछड़ जाते हैं तो वे भाजपा के साथ पींगे बढ़ा सकते हैं. और हो सकता है कि कांग्रेस से हाथ मिला लें. कुछ भी हो सकता है. जिस तरह महाराष्ट्र विकास अघाड़ी ने कदम बढ़ाए हैं, वैसा सियासत में हर समय संभव है. क्या सरदारों में असरदार होने की कहानी में मोड़ आएंगे? इस पटकथा में क्लाइमेक्स तो 10 मार्च को ही दिखेगा. 

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