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बिहारः शराबबंदी को लेकर चलते सियासी तीर

एनएफएचएस 2015-16 के अनुसार, बिहार की लगभग 29 फीसद आबादी शराब की उपभोक्ता थी. वहीं, 2019-20 में यह संख्या घटकर 15.5 फीसद रह गई है

समीक्षा की बारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शराबबंदी के कार्यान्वयन की खामियों को दूर करने की तैयारी कर रहे समीक्षा की बारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शराबबंदी के कार्यान्वयन की खामियों को दूर करने की तैयारी कर रहे

अमिताभ श्रीवास्तव

नवंबर की 6 तारीख को बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने राज्य सरकार से अपनी शराबबंदी नीति की समीक्षा करने के लिए कहा. दरअसल, अलग-अलग घटनाओं में पश्चिम चंपारण, गोपालगंज और समस्तीपुर जिलों में दिवाली से पहले एक सप्ताह के भीतर जहरीली शराब की वजह से करीब 30 लोगों की मौत हो गई थी.

ऐसे में भाजपा अध्यक्ष की ओर से शराबबंदी को लेकर चिंता जताना अनायास नजर आ रहा था, लेकिन इसने उनकी असहजता को भी उजागर कर दिया. आखिरकार, जायसवाल एक ऐसी पार्टी का नेतृत्व करते हैं जो अपने 74 विधायकों के साथ नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का वरिष्ठ गठबंधन सहयोगी है. जद (यू) के एक नेता ने हैरानी जताते हुए कहा, ''मुख्यमंत्री बस एक फोन कॉल दूर हैं, फिर भी जायसवाल ने सरकार को निजी तौर पर अपनी आपत्ति जताने के बजाए सार्वजनिक रूप से सवाल उठाना पसंद किया.''

कई लोग प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की टिप्पणी के समय को लेकर और भी मतलब निकालना चाहते हैं. दरअसल, जायसवाल ने हालिया उपचुनाव में जद (यू) की दो सीटों पर जीत के तुरंत बाद यह बात कही है. उपचुनाव में जीत से नीतीश कुमार की पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ा है. वहीं, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी फिर से नीतीश के साथ जाने के विचार को खारिज कर दिया है. ऐसे में भाजपा पहले की तुलना में अधिक आश्वस्त हुई है.

अप्रैल 2022 में बिहार में शराबबंदी के छह साल पूरे हो जाएंगे. नीतीश कुमार ने 2015 का विधानसभा चुनाव भारी अंतर से जीतने के बाद  अपने इस चुनावी वादे को पूरा किया था. उन्होंने अप्रैल, 2016 से बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी थी. उनकी पहल पर बिहार ने आबकारी संशोधन अधिनियम पारित किया, जो राज्य में शराब के निर्माण, परिवहन, बिक्री और खपत पर रोक लगाता है.

वर्ष 2016 में नीतीश कुमार राजद के साथ गठबंधन में थे और विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव तब उपमुख्यमंत्री के रूप में उनके इस फैसले का हिस्सा थे. बिहार में शराबबंदी लागू होने के समय विपक्ष में रही भाजपा ने 2017 में नीतीश के साथ हाथ मिलाया और तब से उनके साथ सत्तारूढ़ गठबंधन साझा कर रही है.

नीतीश कुमार विभिन्न आलोचनाओं के बावजूद इस नीति के समर्थन में दृढ़ता के साथ खड़े हैं. वहीं, चाहे भाजपा नेता हों या राजद के नेता, जिन्होंने भी इस नीति की आलोचना की है, उन्होंने अपनी आपत्तियों को इसके कार्यान्वयन तक सीमित रखा है.

बिहार में शराबबंदी का असर मिला-जुला रहा है. पुलिस के लिए क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियां हैं, क्योंकि बिहार के 38 जिलों में से 21 जिले नेपाल के अलावा उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के साथ सीमा साझा करते हैं, जहां शराब पर कोई प्रतिबंध नहीं है.

वहीं, 800.4 किलोमीटर लंबी और खुली भारत-नेपाल सीमाओं के साथ बिहार के सात जिलों में स्थित 6,164 से ज्यादा गांव नेपाल के साथ सीमा साझा करते हैं. इनमें कई आवागमन के खुले क्षेत्र हैं और इनका प्रबंधन करना आसान नहीं है. हर महीने, लगभग दो लाख लोग बिहार और नेपाल के बीच पहचाने गए 49 आवागमन बिंदुओं को पार करते हैं. बिहार किसी को भी दूसरे राज्यों में या नेपाल में शराब पीने से नहीं रोक सकता.

अप्रैल 2016 से, बिहार पुलिस ने 2 लाख से अधिक प्राथमिकी दर्ज की हैं और लगभग 2.12 लाख लोगों को शराबबंदी कानूनों के उल्लंघन के लिए गिरफ्तार किया है (जिनमें से अधिकतर जमानत पर रिहा हो गए हैं). लेकिन एफआइआर कहानी का केवल एक हिस्सा हैं.

बिहार में शराबबंदी का सकारात्मक असर भी पड़ा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2015-16 के अनुसार, बिहार की लगभग 29 फीसद आबादी शराब की उपभोक्ता थी. एनएफएचएस सर्वे 2019-20 के मुताबिक, यह संख्या घटकर 15.5 फीसद रह गई है. 2021 में बिहार की अनुमानित आबादी 12.48 करोड़ है, ऐसे में शराब के उपभोक्ताओं की संख्या में गिरावट का मतलब है कि राज्य में लगभग एक करोड़ लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया है.

लेकिन शराबबंदी वाले बिहार में शराब पीने वालों की 15.5 फीसद की तादाद अब भी एक बड़ी संख्या है, जो बताती है कि राज्य में शराब की तस्करी अब भी एक आकर्षक व्यवसाय क्यों है.

इस बीच जायसवाल की टिप्पणी का जवाब मिल गया है. जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने नीति की समीक्षा के विचार को खारिज कर दिया. 8 नवंबर को नीतीश ने भी शराबबंदी के फैसले पर सवाल उठाने वालों को नहीं बख्शा. किसी का नाम लिए बगैर मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे भी इस फैसले (शराबबंदी) के पक्षकार थे.

वहीं, 8 नवंबर को इंडिया टुडे से बात करते हुए जायसवाल ने तर्क दिया कि वे शराबबंदी के खिलाफ नहीं हैं. उन्होंने कहा, ''कोई शराबबंदी की आलोचना कैसे कर सकता है? फैसले में सभी पक्ष शामिल थे. मेरी आपत्ति इस तथ्य तक सीमित है कि शराबबंदी को लागू करने में बड़ी कमियां हैं. ऐसी रिपोर्टें हैं जो बताती हैं कि कुछ जिलों में स्थानीय अधिकारी कम सतर्क हैं, जबकि इससे भी बदतर, कुछ जिलों में उन्हें अवैध शराब कारोबारियों के साथ जोड़ा जाता है. मैं चाहता हूं कि उनके खिलाफ कार्रवाई हो और नीति का बेहतर क्रियान्वयन हो.''

उसी दिन नीतीश ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि शराबबंदी नीति की व्यापक समीक्षा होने वाली है, लेकिन उसमें इस नीति पर पुनर्विचार नहीं किया जाएगा.

मुख्यमंत्री सचिवालय के एक अधिकारी ने बताया, ''इसके विपरीत, मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ बैठक कर यह पता लगाएंगे कि कार्यान्वयन प्रणाली में खामी को कैसे दूर किया जाए और इसे बेहतर तरीके से लागू करने के लिए नीति के किन घटकों को संबोधित करने की जरूरत है. यह भी चर्चा होगी कि जहरीली शराब से होने वाली मौत की घटनाओं को रोकने और लोगों को अवैध शराब का सेवन करने से रोकने के लिए नीति के किन हिस्सों में सुधार करने की आवश्यकता है.''

वर्ष 2016 में, जब नीतीश कुमार ने शराबबंदी लागू की, तो वह तब इसके कुल राजस्व का लगभग 16 फीसद छोडऩे के लिए सहमत हुए. 2015-16 में, बिहार के अपने कर राजस्व में आबकारी शुल्क का हिस्सा राज्य के कुल राजस्व 30,875 करोड़ रुपए का 12.95 फीसद आंका गया था, जबकि उस शुल्क में केवल देशी शराब की हिस्सेदारी 2,159 करोड़ रु. थी. इसमें बिक्री कर संग्रह के आंकड़े जोड़ें, जो 2014-15 में देशी शराब की 266 करोड़ रु. और आइएमएफएल की 780 करोड़ रु. थी—तो शराबबंदी की कीमत लगभग 5,027 करोड़ रु. गंवा कर चुकानी पड़ी, जो बिहार के कुल राजस्व का 16 फीसद से अधिक थी.

मुख्यमंत्री ने यह गिनाते हुए शराबबंदी का लगातार बचाव किया है कि पहले शराब का सेवन करने वालों के अब बचाए गए धन ने बिहार के परिवारों की समग्र भलाई में सुधार किया है. मुख्यमंत्री ने बताया कि शराबबंदी से बिहार में गरीबों के समग्र स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति में सुधार के अलावा सकारात्मक सामाजिक बदलाव आया है.

लेकिन, शराबबंदी और उसके कार्यान्वयन में खामियों ने अपराधियों और बिहार पुलिस के भ्रष्ट लोगों के लिए एक समानांतर अवसर भी पैदा किया है. राज्य पुलिस मुख्यालय ने शराबबंदी लागू में दोषी पाए जाने या लापरवाही बरतने के आरोप में अब तक 450 से अधिक पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया है और 70 से अधिक को बर्खास्त कर दिया है.

और, राजनेताओं के लिए भी इसने एक-दूसरे के साथ पुराने हिसाब चुकता करने के अवसर हैं. लेकिन नीतीश फिर से शराबबंदी की व्यापक समीक्षा के लिए तैयार हो गए हैं, तो वे फिर से बहुत व्यस्त हो जाएंगे.

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