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खुशीः रोप रहे एक अदद उम्मीद

असल काम: मात्र 12 साल की उम्र से जयराम मीणा खाली पड़ी सार्वजनिक जमीन पर पौधे लगा रहे हैं. अब तक वे 11 लाख से ज्यादा पौधे रोप चुके हैं और निकट भविष्य में भी यह काम रोकने की उनकी कोई योजना नहीं है.

बेहतरीन बागबान जयराम मीणा पौधा रोपते हुए बेहतरीन बागबान जयराम मीणा पौधा रोपते हुए

जयराम मीणा,
52 वर्ष,
किसान
गांव: बसोंद; जिला: शिवपुर, मध्य प्रदेश

जयराम मीणा को याद है कि 12 साल की उम्र में वे अपने दादा मथुरालाल मीणा के साथ अपने गांव बसोंद के आसपास जब भी और जहां भी जगह मिलती, वहां पौधे लगाने पहुंच जाते थे. बीते लगभग 40 साल से जयराम ने न केवल इस आदत को कायम रखा है, बल्कि इसे अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया है.

जयराम जब 16 साल के थे तब उनके दादा जी का देहावसान हो गया और बीते वर्षों में उनकी याद में जयराम ने अपने घर के परिसर में 11 पौधे लगाए. ये 11 पौधे रोपने के बाद जयराम के मन में 1,100 पौधे लगाने की बात आई. यह लक्ष्य पूरा हुआ तो उन्होंने 31,000 पौधे और लगाने का संकल्प लिया.

फिर इसके बाद 11 लाख पौधे लगाने का. इतना बड़ा लक्ष्य भी उन्होंने दो साल पहले हासिल कर लिया. जयराम के शब्दों में, ''मेरे दादाजी अक्सर कहा करते थे कि पौधे लगाना उतना ही पवित्र कार्य है जितना कि यज्ञ करना. सालों बाद मैंने ऋषिकेश में एक धर्माचार्य को यही शब्द दोहराते हुए सुना.’’

मुख्य सड़क से उनके गांव की ओर जाने वाली सड़क के दोनों किनारों पर नीम और बरगद के पेड़ लगे हैं जो अपने मकसद में उनके जी-जान से लगे होने का सबूत देते लगते हैं. बसोंद में नहरों के किनारे, सरकारी जमीन पर, पुलिस थाना परिसर, औषधालय, स्कूल और मंदिर परिसर में सब ओर पेड़ हैं—इन सभी को जयराम ने लगाया था. उनका वृक्षारोपण कार्य अब राज्य की सीमाओं से आगे बढ़ चला है. उन्होंने पड़ोसी राज्य राजस्थान और यहां तक कि सुदूर उत्तराखंड में भी वृक्षारोपण अभियान चलाया है.

जयराम यह काम अपने संसाधनों से करते हैं. कुल 11 बीघा जमीन वाले छोटे किसान जयराम के परिवार में चार लोग हैं और उन्हें अपने जुनून पर किए जा सकने वाले खर्च का ख्याल रखना पड़ता है. उनकी अपनी नर्सरी है, जहां वे बीजों से पौधे तैयार करते हैं. इस काम में वे स्थानीय बच्चों की मदद लेते हैं.

वे मुस्कुराते हुए बताते हैं कि मौसम आने पर जब नीम के पेड़ पर फल लगते हैं, तो मैं गांव के बच्चों से उन्हें इकट्ठा करके लाने के लिए कहता हूं. बदले में मैं उन्हें बिस्कुट देता हूं. अंकुरित पौधों को जयराम एकत्रित की गई पॉलीथीन की थैलियों और प्लास्टिक कंटेनरों में लगाते हैं. मीणा अपने तरीके के बारे में बताते हैं कि ''बहुत सारे उर्वरक, खरपतवारनाशी और कीटनाशक प्लास्टिक की बोतलों या पैकेट में आते हैं.

सामग्री का उपयोग करने के बाद किसान आमतौर पर इन्हें फेंक देते हैं. कुछेक साल पहले मैंने तय किया कि मैं चारों ओर जा-जाकर इन पैकेटों को इकट्ठा करूंगा और पौधों को रखने के लिए उनका इस्तेमाल करूंगा.’’

पौधे रोपने के लिए दूर तक जाने की यात्राएं उन्होंने अकेले शुरू की थीं. अपनी साइकिल पर बाल्टियों में पानी लेकर वे दूर-दूर तक जाकर पौधों को पानी देते थे. लेकिन अब उनके पास ऐसे लोगों का समुदाय है जो पौधों की देखभाल करने के काम में स्वैच्छिक सहयोग देते हैं. लगभग 20 साल पहले राज्य के वन विभाग ने भी उनका सहयोग करना शुरू किया और उन्हें एक साइकिल तथा कुछ पौधे और बीज देकर पौधे तैयार करने का काम सौंपा.

जयराम बताते हैं कि पानी की कमी और थोड़ी पथरीली मिट्टी को देखते हुए नीम इन क्षेत्रों में लगाने के लिए आदर्श पेड़ है. केवल कक्षा 4 तक पढ़े जयराम क्षेत्र में पाए जाने वाले पेड़ों की प्रजातियों और उनकी देखभाल करने के तौर-तरीकों के बारे में अच्छा-खासा ज्ञान रखते हैं.

जयराम के घर का अहाता मोर और दूसरे पक्षियों के लिए भरे-पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित हो गया है और मोर तथा तीतर उनके घर के आसपास खुले मैदान में घूमते दिख सकते हैं. वे बताते हैं कि पौधे लगाने के मेरे जुनून के कारण शुरुआती दिनों में मेरे परिजनों, दोस्तों और यहां तक कि मेरी पत्नी और बच्चों को भी लगता था कि मैं मानसिक रूप से बीमार हूं.

बाद में उन्हें महसूस हुआ कि यह कोई सनक भरा दौर नहीं था. पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के लिए 2006 में प्रतिष्ठित अमृता देवी बिश्नोई पुरस्कार मिलने के बाद से सभी का नजरिया बदल गया. वे कहते हैं, ''कुछ लोगों को शराब पीने से, तरह-तरह का भोजन करने या पैसा जोड़ने से खुशी मिलती है, मुझे मेरे लगाए पौधों को पेड़ बनते देखकर खुशी मिलती है.’’

तो, आपका अगला बड़ा लक्ष्य क्या है? पूछने पर जयराम कहते हैं कि मैं अपना शेष जीवन लोगों, विशेषकर बच्चों को पेड़ों, पक्षियों और जानवरों और हमारे जीवन में उनके महत्व के बारे में जानकारी देने में बिताना चाहता हूं. कृषि इस क्षेत्र का मुख्य आधार है. पिछले कुछ वर्षों में फसलों का पैटर्न बदल गया है और भूमिगत जल बहुत ज्यादा तेजी से खींचा जा रहा है. अगर यहां कृषि को कायम रखना है तो पेड़ों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी.

जुलाई में आई बाढ़ में जयराम की नर्सरी का एक बड़ा हिस्सा बह जाने के अलावा उनके घर का एक हिस्सा भी तबाह हो गया था. इन दिनों वे अपनी नर्सरी के पुनर्निर्माण में व्यस्त हैं और जो कुछ भी बच सकता है उसे बचाने की कोशिश में लगे हैं. बाढ़ से उनके उत्साह पर कोई फर्क नहीं पड़ा है. ठ्ठ
 
खुशी की तलाश: इंडिया टुडे तथा आरपीजी समूह का संयुक्त उद्यम है जो प्रसन्नता फैलाने वाली अनुकरणीय पहलकदमियों को रेखांकित करता है
जिससे मिलती है मुझे खुशी

भुवन बाम

यूट्यूबर और कॉमेडियन
''मुझे मेरा काम बिना किसी अड़ंगेबाजी के करने दिया जाए तो मुझे खुशी होती है क्योंकि दिमाग में ऑलरेडी बहुत कुछ चलता रहता है. भूख लगने पर अगर मैं कुछ खाना चाहता हूं तो खाता नहीं, रुक जाता हूं.

अगर मैं कुछ शूट करना या लिखना चाह रहा हूं और उस वक्त मुझे मेरा फोन नहीं मिल रहा है, तो मैं रुक जाता हूं. मैं हर पल को जीना चाहता हूं. आगे क्या होगा, इस बारे में सोचना मैंने छोड़ दिया है. पिछले कुछ महीनों के अनुभव ने बता दिया है कि कल का आपको कुछ भी नहीं पता.’’

खुशी का मंत्र

''आप अपना काम कीजिए. शुरू में लोग आप पर हंसेंगे. धीरे-धीरे जब उन्हें एहसास होगा कि आप कितनी लगन से इस काम में लगे हैं तो वे आपके साथ-साथ हंसेंगे’’

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